जई एक महत्तवपूर्ण अनाज और चारे की फसल है। जई की खेती गेहूं की खेती के बिल्कुल समान होती है। यह विशेष कर संयमी और उप उष्ण कटबंधी क्षेत्रों में उगाई जाती है। इसकी पैदावार ज्यादा ऊंचाई वाले तटी क्षेत्रों में भी बढ़िया होती है। यह अपने सेहत संबंधी फायदों के कारण काफी प्रसिद्ध है। जई वाला खाना मशहूर खानों में गिना जाता है। जई में प्रोटीन और रेशे की भरपूर मात्रा होती है। यह भार घटाने, ब्लड प्रैशर को कंटरोल करने और बीमारियों से लड़ने की शक्ति को बढ़ाने में भी मदद करता है। इसे पराली, चारा और आचार बनाने के लिए भी प्रयोग किया जाता है।
रबी मौसम में उगाई जाने वाली फसलों में जई का एक मुख्य स्थान है। हमारे देश में इसकी खेती अधिकतर सिंचित दशा में की जाती है, किंतु मध्य अक्टूबर तक भूमि पर्याप्त नमीं होने पर इसे असिंचित दशा में भी उगया जा सकता है। ऐसे सभी जलवायु क्षेत्रों में जहां गेहूं और जौ की खेती होती हो वहां इसकी खेती की जा सकती है| यह पाले एवं अधिक ठंड को सहन कर सकती है| जई पशुओं के खाने के लिए कोमल और सुपाच्य है।इसमें क्रूडप्रोटीन 10 से 12 प्रतिशत होता है| जई को भूसा या सूखे चारे के रूप में भी प्रयोग में लाया जाता है।
यह अपने सेहत संबंधी फायदों के कारण भी काफी प्रसिद्ध है| जई का खाना मशहूर खानों में गिना जाता है। जई में प्रोटीन और रेशे की भरपूर मात्रा होती है।यह भार घटाने, ब्लड प्रैशर को कंटरोल करने और बीमारियों से लड़ने की शक्ति को बढ़ाने में भी मदद करता है। यदि किसान बन्धु इसकी खेती वैज्ञानिक तकनीक से करें, तो जई की फसल से अच्छी उपज प्राप्त कर सकते है। इस लेख में जई की उन्नत खेती कैसे करें का उल्लेख किया गया है।
उपयुक्त जलवायु
जई की खेती के लिए ठंडी एवं शुष्क जलवायु उपयुक्त समझी जाती है, दक्षिण भारत में अधिक तापक्रम होने के कारण इसकी खेती अच्छी उपज नही देती है। इसलिए उत्तर भारत में कम तापक्रम के कारण इसकी खेती बड़े पैमाने पर की जाती है। इसकी खेती के लिए 15 से 25 डिग्री सेंटीग्रेट तापमान सर्वोतम माना जाता है।
भूमि का चयन
यह हर तरह की मिट्टी में उगाई जाती है। अच्छे जल निकास वाली चिकनी रेतली मिट्टी, जिस में जैविक तत्व हों, जई की खेती के लिए उचित मानी जाती है। जई की खेती के लिए 5-6.6 पी एच वाली मिट्टी बढ़िया होती है।
जई की खेती सभी प्रकार की जमीनों में की जा सकती है, किन्तु दोमट मिट्टी इसकी खेती के लिये सर्वोत्तम होती है। हल्की जमीनों में इस फसल को अपेक्षाकृत जमीनों से अधिक जल की आवश्यकता होती है।
प्रसिद्ध किस्में और पैदावार
Brunker-10: यह तेजी से बढ़ने वाली अच्छी, छोटे और तंग आकार के नर्म पत्तों वाली किस्म है। यह सोके की प्रतिरोधक है। यह पंजाब, दिल्ली, हरियाणा, और उत्तर प्रदेश के इलाकों में उगाई जाती है।
OS-6: यह भारत के सभी इलाकों में उगाई जा सकती है। इसकी चारे के तौर पर औसतन पैदावार 210 क्विंटल प्रति एकड़ है।
OL-9: यह पंजाब के सारे सिंचित इलाकों में उगाने योग्य किस्म है। इसके बीज दरमियाने आकार के होते हैं। इसके दानों की औसतन पैदावार 7 क्विंटल और चारे के तौर पर औसतन पैदावार 230 क्विंटल प्रति एकड़ है।
Kent: यह भारत के सभी इलाकों में उगाने योग्य किस्म है। इसके पौधे का औसतन कद 75-80 सैं.मी. होता है। यह किस्म कुंगी, गर्दन तोड़ और झुलस रोग की प्रतिरोधक है। इसकी चारे की औसतन पैदावार 150 क्विंटल प्रति एकड़ होती है। यह किस्म 180 दिनों में तैयार हो जाती है।
Bundel Jai 2001-3: इसकी हरे चारे की औसतन पैदावार 20 टन प्रति एकड़ और सूखे चारे की औसतन पैदावार 4 टन प्रति एकड़ होती है।
OS 403: यह किस्म CSSHAU, हरियाणा द्वारा विकसित की गई है। यह सिंचित हालातों में समय पर बोने के लिए उपयुक्त किस्म है। इसकी हरे चारे की औसतन पैदावार 183 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
Weston-11: यह किस्म 1978 में पंजाब में जारी की गई। इस किस्म के पौधों का कद 150 सैं.मी. होता है। इसके दाने लंबे और सुनहरी रंग के जैसे होते हैं।
OL-10: यह पंजाब के सारे सिंचित इलाकों में उगाने योग्य किस्म है। इसके बीज दरमियाने आकार के होते हैं। इसकी चारे के तौर पर औसतन पैदावार 270 क्विंटल प्रति एकड़ है।
दूसरे राज्यों की किस्में
Haryana Javi-114: यह अगेती बिजाई वाली किस्म है। यह किस्म 1974 में CCS HAU, हिसार द्वारा जारी की गई है। यह किस्म पूरे भारत में उगाने के लिए उपयुक्त है। यह किस्म गर्दन तोड़ के प्रतिरोधी है। यह ज्यादा कटाई के लिए उपयुक्त है। इसके हरे चारे की औसतन उपज 50-230 क्विंटल और बीजों की उपज 54-83 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
Bundel Jai 2004 (JHO-2000-4): यह किस्म 2002 में IGFRI, झांसी द्वारा जारी की गई है। यह उत्तर पूर्वी और उत्तर पश्चिमी क्षेत्रों में उगाने के लिए अनुकूल है। यह एक कटाई के लिए उपयुक्त किस्म है। इसके हरे चारे की औसतन पैदावार 200 क्विंटल और सूखे चारे की पैदावार 40 क्विंटल प्रति एकड़ होती है। यह किस्म तना गलन, कुंगी, पत्तों के ऊपरी धब्बा रोग, पत्तों के झुलस रोग और जड़ गलन को सहनेयोग्य है।
OL 125: यह 1995 में PAU, लुधियाणा द्वारा जारी की गई है। यह किस्म उत्तर पश्चिमी और केंद्रीय क्षेत्रों में खेती करने के लिए उपयुक्त है। यह एक कटाई और ज्यादा कटाई के लिए उपयुक्त किस्म है। इसकी औसतन पैदावार 240 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
(Bundel Jai 851) JHO 851 और OL 529 भी जई की उपयुक्त किस्में हैं।
OL-10: यह पंजाब के सारे सिंचित इलाकों में उगाने योग्य किस्म है। इसके बीज दरमियाने आकार के होते हैं। इसकी चारे के तौर पर औसतन पैदावार 270 क्विंटल प्रति एकड़ है।
HFO-114: यह जई उगाने वाले सारे इलाकों में उगाई जा सकती है। यह 1974 में हिसार एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी की तरफ से जारी की गई। यह किस्म लंबी और गर्दन तोड़ की रोधक है। इसके बीज मोटे होते हैं और इसके दानों की औसतन पैदावार 7-8 क्विंटल प्रति एकड़ है।
Algerian: यह किस्म सिंचित इलाकों में उगाने योग्य किस्म है। पौधे का औसतन कद 100-120 सैं.मी. होता है। इसका शुरूआती विकास मध्यम होता है और पत्ते हल्के हरे रंग के होते हैं।
Bundel Jai 851: यह भारत के सभी इलाकों में उगाई जा सकती है। इसकी हरे चारे के तौर पर औसतन पैदावार 188 क्विंटल प्रति एकड़ है।
खेत की तैयारी
एक नदीन मुक्त खेत के रूप में खेत को अच्छे तरीके से तैयार करना चाहिए। मिट्टी के भुरभुरा होने तक खेत की 6-8 बार जोताई करें। जई की फसल जौं और गेहूं से ज्यादा के पी एच स्तर को सहन कर सकती है। जई फसल का अच्छा अंकुरण प्राप्त करने के लिये खेत की अच्छे से तैयारी करना जरूरी है, इसके लिये खेत में देशी हल से दो-तीन जुताईयां या ट्रेक्टर चलित यंत्रों में एक बार कल्टीवेटर चलाने के बाद दो बार हैरो चलाये| तत्पश्चात् पाटा चलाकर खेत को समतल करना चाहिये| खेत में पानी निकासी की उचित व्यवस्था करें|
बिजाई
बिजाई का समय
शुरूआती अक्तूबर से अंत नवंबर तक बिजाई पूरी कर लें।
फासला
कम शाखाओं वाली किस्मों के लिए कतारों में 20-25 सैं.मी. जबकि अधिक शाखाओं वाली किस्मों के लिए कतारों में 30 सैं.मी. फासले का प्रयोग करें।
बीज की गहराई
बीज की गहराई 3-4 सैं.मी. होनी चाहिए।
बिजाई का ढंग
बिजाई के लिए सीड ड्रिल का प्रयोग करें। पोरा और केरा विधि का प्रयोग किया जा सकता है।
बीज
बीज की मात्रा
एक एकड़ में बिजाई के लिए 24-28 किलो बीज की आवश्यकता होती है।
बीज का उपचार
कांगियारी रोग से बचाव के लिए विटावैक्स 2 ग्राम से प्रति किलो बीज का उपचार करना चाहिए।
खाद
खादें (किलोग्राम प्रति एकड़)
| UREA | SSP | MOP |
| 70 | 100 | - |
तत्व (किलोग्राम प्रति एकड़)
| NITROGEN | PHOSPORUS | POTASH |
| 32 | 16 | - |
रूड़ी की खाद या गाय का गला हुआ गोबर 8-10 टन खेत की तैयारी के समय प्रति एकड़ में डालना चाहिए। एक कटाई की किस्म के लिए नाइट्रोजन 32 किलो (यूरिया 70 किलो) और फासफोरस 16 किलो (एस एस पी 100 किलो) प्रति एकड़ में खेत की तैयारी के समय डालें।
दोहरी कटाई वाली किस्मों के लिए नाइट्रोजन 50 किलो (यूरिया 110 किलो) और फासफोरस 16 किलो (एस एस पी 100 किलो) प्रति एकड़ में डालें। नाइट्रोजन की एक तिहाई मात्रा टॉप ड्रेसिंग के तौर पर डालें। उसके बाद नाइट्रोजन को दो भागों में बांटे और पहली और दूसरे कटाई के समय बराबर मात्रा में डालें।
सिंचाई
जई की खेती मुख्यत: बारानी फसल के तौर पर की जाती है। लेकिन अगर इसे सिंचित फसल के तौर पर उगाया जाये, तो चार से पांच सिंचाइयों की आवश्यकता होती है। मिट्टी में नमी के आधार पर बिजाई से पहले सिंचाई करें। बाकी की सिंचाई महीने के अंतराल पर करें। प्रत्येक कटाई के बाद सिंचाई करें।
खरपतवार नियंत्रण
जई की फसल पर नदीनों का हमला कम होता है। 1-2 गोडाई की जा सकती है। यदि नदीन खड़ी फसल पर मौजूद हों तो 2,4-डी 250 ग्राम को प्रति एकड़ में डालें।
पौधे की देखभाल
हानिकारक कीट और रोकथाम
चेपा :
यह जई की फसल का मुख्य कीट है। यह पौधे के सैलों का रस चूस लेता है। इससे पत्ते मुड़ जाते हैं और इन पर धब्बे पड़ जाते हैं।
इन के हमले को रोकने के लिए डाइमैथोएट 30 ई सी 0.03 प्रतिशत का प्रयोग करें। स्प्रे करने के 10-15 दिनों के बाद जई की फसल को चारे के तौर पर पशुओं को ना डालें।
बीमारियां और रोकथाम
पत्तों पर काले धब्बे :
इससे फफूंदी सैलों में अपने आप पैदा हो जाती है। पौधों के शिखरों से कोंडिओफोरस स्टोमैटा के बीच में ही एक सिंगल राह बना लेते हैं। यह फंगस भूरे रंग से काले रंग की हो जाती है। शुरूआती बीमारी पत्तों के शिखरों से आती है और दूसरी बार यह बीमारी हवा द्वारा सुराखों में फैलती है। इस बीमारी की रोकथाम के लिए बीज का उपचार करना जरूरी है।
जड़ गलन :
यह जड़ों के विषाणुओं के कारण होता है। बिजाई से पहले बीजों को अच्छी तरह उपचार करने से इस बीमारी को रोका जा सकता है।
कटाई एवं उत्पादन
एक कटाई के लिये बोई गयी जई की फसल को 50 प्रतिशत फूल आने की अवस्था में (75 से 85 दिन) कटाई करना उपयुक्त रहता है। इससे लगभग 400 क्विटल हरा चारा प्राप्त होता है| दो कटाई के लिये ली जाने वाली फसल पहली कटाई 55 से 60 दिन में तथा दूसरी कटाई 50 प्रतिशत फूल आने पर करनी चाहिये| इससे लगभग 550 क्विंटल प्रति हेक्टेयर हरा चारा प्राप्त होता है। दो कटाई वाली फसल को काटते समय इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिये कि पौधों की पहली कटाई 4 से 5 सेंटीमीटर ऊंचाई पर करें जिससे उसकी पुर्नवृद्धि अच्छी हो सके।
बीज उत्पादन
बीज के लिये उगाई गई जई की फसल 50 से 55 दिन में एक बार हरा चारा के लिये कटाई करने के बाद बीज उत्पादन के लिये छोड़ देना चाहिये, ऐसा करने से लगभग 250 क्विंटल प्रति हेक्टेयर हरा चारा के साथ 15 से 25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर बीज प्राप्त होता है। बीज उत्पादन के लिये ली गई फसल में चारे के लिये कटाई करने से पुर्नवृद्धि के बाद पौधे गिरते नहीं है। इससे बीज की गुणवत्ता तथा उत्पादन अच्छा प्राप्त होता है। फसल की कटाई न करने पर फसल के गिरने के कारण बीज उत्पादन पर विपरीत असर पड़ता है।




