ये तार वाद्य यंत्र हैं। ध्वनि दो बिंदुओं के बीच फैले हुए तार या तारों के कंपन द्वारा उत्पन्न की जाती है। इन यंत्रों को ऐंठन, धनुर, नक्काशीदार गैर-नक्काशीदार वाले उपकरणों में वर्गीकृत किया गया है। इसी तरह के कुछ उपकरण वीणा, लायर, ज़िथर और ल्यूट हैं। ध्वनि की उत्पत्ति तनावयुक्त तार या तांत को खींचकर या झुकाकर कंपन उत्पन्न करने से होती है। तार की लंबाई और उसमें तनाव, ध्वनि की गतिविधि और अवधि को निर्धारित करती है। तार वाद्य यंत्रों को बजाने के तरीकों से वर्गीकृत किया जा सकता है:
- धनुर् के साथ घर्षण द्वारा जैसे कि सारंगी, दिलरुबा, एसराज आदि (रावणास्त्रं सबसे पहले ज्ञात धनुर्वादयों में से एक है);
- तार को खींचकर जैसे कि सरस्वती वीणा, रुद्र वीणा
- या एक हथौड़े या छड़ी-युग्म से मारकर जैसे कि गेट्टुवाद्यम, स्वरमंडल।
49-सुरसिंगार-
"सुरसिंगार हाथी दाँत और लकड़ी से बना एक तार वाद्य यंत्र है। यह पारंपरिक वाद्य यंत्र उत्तर भारत के अनेक हिस्सों में पाया जाता है। उत्तर भारतीय शास्त्रीय संगीतकारों द्वारा एकल प्रदर्शन के लिए संगीत समारोह वाद्य यंत्र के रूप में मुख्यत: उपयोग किया जाता है।"
“एक खींचकर बजाए जाने वाला वाद्य यंत्र। नाद पेटी और अंगुलिपटल (दाँडी) लकड़ी के एक कुंदे को खोखला करके बनाए जाते हैं। खूँटी धानी एक पक्षी आकृति में उकेरी जाती है। हाथी दाँत से बने चौड़े सपाट घुड़च पर छह मुख्य तार और दो ड्रोन तार लगे होते हैं। नाद पेटी एक पतले लकड़ी के तख्ते से ढकी होती है। चौड़े अंगुलिपटल (दाँडी) पर बिजली-मुलम्मा चढ़ी धातु की चादर रखी जाती है। तूमड़ी से बना एक अतिरिक्त अनुनादक होता है। मिजराव द्वारा बजाया जाता है। उत्तर भारतीय शास्त्रीय संगीतकारों द्वारा एकल प्रदर्शन के लिए संगीत समारोह वाद्य यंत्र के रूप में उपयोग किया जाता है।"
50-सुरबहार
"सुरबहार लकड़ी, तूमड़ी और रेशम से बना एक तार वाद्य यंत्र है। यह एक पारंपरिक वाद्य यंत्र है जो उत्तर भारत के विभिन्न क्षेत्रों में पाया जाता है। उत्तर भारतीय शास्त्रीय संगीत समारोहों में शास्त्रीय संगीतकारों द्वारा एकल वाद्य यंत्र के रूप में मुख्यत: उपयोग किया जाता है।"
"वीणा श्रेणी का सारिका युक्त खींचकर बजाए जाने वाला वाद्य यंत्र। इसमें एक सुंदर नक्काशीदार खूँटी धानी तथा आधी कटी हुई तूमड़ी से बना एक चौड़ा और उथला गोलाकार अनुनादक होता है और लकड़ी की तख्ती से ढका होता है। एक लंबे चौड़े अंगुलिपटल (दाँडी) पर उन्नीस सारिकाएँ उस पर रेशम के धागे से बँधी हुई होती हैं। चार मुख्य इस्पात के तार और तीन ड्रोन तार, निचले छोर पर हाथी दाँत की पिनों के साथ जुड़े होते हैं, जो कि अंगुलिपटल (दाँडी) पर फैले होते हैं और दूसरी तरफ खूँटी की धानी पर संबंधित खूँटी से बंधे होते हैं। ग्यारह इस्पात के अनुकंपी तार एक छोटे से घुड़च पर लगे होते हैं और अंगुलिपटल (दाँडी) के किनारे लगी संबंधित छोटी खूँटियों से बँधे होते हैं। उत्तर भारतीय शास्त्रीय संगीत समारोहों में शास्त्रीय संगीतकारों द्वारा एकल वाद्य के रूप में व्यापक रूप से उपयोग किया जाता है।"
51-स्वरमंडल-
स्वरमंडल लकड़ी और धातु से बना एक तार वाद्य यंत्र है। यह एक पारंपरिक वाद्य यंत्र है जो उत्तर भारत के कई हिस्सों में पाया जाता है। यह मुख्य रूप से उत्तर भारतीय गायन कार्यक्रमों में संगत के लिए उपयोग किया जाता है।
“लकड़ी का एक उथला बक्सा होता है जिसमें तारों को पकड़ कर रखने वाले तार धारक स्तंभों और स्वरित्र खूँटियों (पिन) से पच्चीस तार बंधे होते हैं। अच्छी संस्वरण (ट्यूनिंग) के लिए तारों में मणिकाओं को डाला जाता है। तारों को दाहिने हाथ की अंगुलियों से झनझनाया जाता है। उत्तर भारतीय कंठ संगीत समारोहों में संगत के लिए उपयोग किया जाता है। वीणा श्रेणी का एक खुला तार वाद्य यंत्र है।“
52-सोडू बुर्रा-
"सोडू बुर्रा तूमड़ी और लकड़ी से बना एक तार वाद्य यंत्र है। यह ड्रोन वाद्य यंत्र है और आंध्र प्रदेश में पाया जाता है। महाराष्ट्र और पड़ोसी क्षेत्रों के 'ज्योतिषियों' द्वारा मुख्यत: उपयोग किया जाता है।"
"बाँस की नली के नीचे केंद्र में लगी हुई कटी हुई तूमड़ी लकड़ी की गोलाकार तख्ती से ढकी होती है। एक छोर पर इस्पात का एकल तार लकड़ी के संलग्नक से जुड़ा होता है और दूसरे छोर पर एक खूँटी लगी होती है। नंगी उंगलियों से बजाया जाता है। महाराष्ट्र और पड़ोसी क्षेत्रों के 'ज्योतिषियों' द्वारा ड्रोन वाद्य यंत्र के रूप में उपयोग किया जाता है।"
53-सितार-
"सितार लकड़ी, तून की लकड़ी, धातु, तूमड़ी और चिकरी से बना एक तार वाद्य यंत्र है। पूरे उत्तर भारत में शास्त्रीय संगीत समारोहों में एकल वाद्य यंत्र के रूप में मुख्यत: उपयोग किया जाता है।"
"उत्तर भारतीय शास्त्रीय संगीत की एक प्रमुख खींचकर बजाई जाने वाली वीणा। इसे दो भागों में विभाजित किया जा सकता है, तूमड़ी का अनुनादक एक पतली लकड़ी के तख्ते से ढका हुआ और शीर्ष पर एक आयताकार खूँटी धानी के साथ एक लंबी गर्दन सहित अंगुलिपटल (दाँडी) होता है। उच्च गुणवत्ता वाली ’तून’ की लकड़ी से बना अंगुलिपटल (दाँडी) तूमड़ी के साथ जुड़ा होता है। तूमड़ी के आख़िरी छोर पर लगे हाथी दाँत के साथ एक तार धारक बँधा होता है जिसमें अलग-अलग माप के इस्पात और पीतल के पाँच मुख्य वादन तार और दो चिकरी तार होते हैं। तारों के दूसरे छोर को विपरीत छोर पर समस्वरण खूँटी से बाँधा जाता है। उन्नीस धातु की कांतिवृत्त सारिकाओं को रेशमी धागे की मदद से अंगुलिपटल (दाँडी) पर बाँधा जाता है। सारिकाएँ चलायमान होती है और आवश्यकता के अनुसार समायोजित की जा सकती हैं। मुख्य घुड़च, अनुनाद पटल जिसे 'तबली' कहा जाता है, पर जड़ा होता है, जिस पर मुख्य वादन तार लगे होते हैं, खूँटी की धानी के ठीक नीचे द्वितीयक घुड़च या ऊपरी नट (लट्टू) होते हैं। मुख्य घुड़च के नीचे एक छोटे से घुड़च पर तेरह अनुकंपी इस्पात के तार होते हैं। तूमड़ी के ऊपर नाज़ुक लकड़ी की नक्काशी से सजावट की जाती है। बैठकर बजाया जाता है। मुख्य तार और चिकरी को दाहिने हाथ की तर्जनी उंगली में एक तार का मिजराव पहनकर खींचा जाता है। बाएं हाथ की उंगलियों को राग उत्पन्न करने के लिए तार को रोकने या खींचने के लिए उपयोग किया जाता है। पूरे उत्तर भारत में शास्त्रीय संगीत समारोहों में एकल वाद्य यंत्र के रूप में उपयोग किया जाता है।"
54-सितार-
सितार लकड़ी और इस्पात से बना एक तार वाद्य यंत्र है। यह लोक वाद्य यंत्र जम्मू और कश्मीर में पाया जाता है। यह मुख्य रूप से कश्मीर के लोक, पारंपरिक, तथा धार्मिक संगीत, जैसे सूफ़ीयाना क़लाम और अन्य संगीत में उपयोग होता है।
यह सारिकायुक्त तथा लंबाकार ढाँचे से युक्त वीणा का खींचकर बजाया जाने वाला रूप है। इसमें एक लंबा अंगुलिपटल (दाँडी), एक आयताकार खूँटी धानी, और एक नाशपाती के आकार का खोखला अनुनादक होता है, और ये सब लकड़ी से बना होता है। अनुनादक लकड़ी के पटल से ढका होता है। लंबे पतले अंगुलिपटल (दाँडी) पर आँत से बनी सात सारिकाएँ लगी होती हैं। इसमें इस्पात के सात तार होते हैं। यह कश्मीर के लोक, पारंपरिक, तथा धार्मिक संगीत, जैसे सूफ़ीयाना क़लाम और अन्य में उपयोग होता है।
55-सिंधी सारंगी-
“सारंगी लकड़ी से निर्मित एक तार वाद्य यंत्र है। यह लोक वाद्य यंत्र राजस्थान में पाया जाता है। पश्चिमी राजस्थान के 'लंगा' समुदाय द्वारा उनके गायन के साथ संगत के रूप में मुख्य रूप से उपयोग किया जाता है।“
“एक धनुर्वाद्य। लकड़ी के एकल कुंदे से बनाया गया अनुनादक, अंगुलिपटल (दाँडी)और खूँटी धानी। इसमें अर्धगोलाकार ध्वनि छिद्र के साथ ख़ुश्क अनुनादक होता है। इसमें चार आँत के बजाने वाले तार और बाईस इस्पात के अनुकंपी तार होते हैं। गज को दाहिने हाथ में पकड़ा जाता है और तारों को बाएँ हाथ की उँगलियों के नाखूनों से रोका जाता है। यह वाद्य यंत्र पश्चिम राजस्थान के 'लंगा' समुदाय द्वारा गायन के साथ संगत के रूप में उपयोग किया जाता है।"
56-साज़-ए-कश्मीर
साज़-ए-कश्मीर हाथी दाँत, नरम लकड़ी, चर्मपत्र और इस्पात से निर्मित एक तार वाद्य यंत्र है। यह पारंपरिक लोक वाद्य यंत्र जम्मू और कश्मीर में पाया जाता है। मुख्य रूप से जम्मू और कश्मीर की पारंपरिक विधाओं में उपयोग किया जाता है।
"हाथी दाँत के काम से सजाया हुआ एक धनुर्वाद्य। खाल से ढका हुआ नरम लकड़ी का गोल अनुनादक होता है। खराद से तैयार किया गया बेलनाकार अंगुलिपटल (दाँडी)। तीन मुख्य आँत के तार और चौदह इस्पात के अनुकंपी तार। इसे गज से बजाया जाता है। यह जम्मू और कश्मीर की पारंपरिक विधाओं में प्रयुक्त होता है।"
57-सारिंदा
सारिंदा इस्पात, लकड़ी, चर्मपत्र और घोड़े के बाल से निर्मित एक तार वाद्य यंत्र है। यह जनजातीय वाद्य यंत्र असम और त्रिपुरा में पाया जाता है। मुख्य रूप से असमिया गीतों में संगत के लिए और त्रिपुरा की जनजातियों द्वारा उपयोग किया जाता है।
असम में सारिंदा-“तीन मुख्य इस्पात के बजाने वाले तारों सहित एक धनुर्वाद्य। एकल लकड़ी के कुंदे को खोखला करके बनाया गया; अनुनादक का एक तिहाई भाग चर्मपत्र से ढका हुआ है जिसे लकड़ी की कीलों से स्तिथ किया जाता है; इसे घोड़े के बाल से बने गज से बजाया जाता है। इस वाद्य यंत्र को असमिया गीतों के साथ संगत के लिए उपयोग किया जाता है।”
त्रिपुरा में सारिंदा-यह तीन तार वाला एक धनुर्वाद्य है। इसमें खूँटी धानी से युक्त लकड़ी का एकीकृत ढांचा, एक छोटा अंगुलिपटल (दाँडी), तथा निचले सिरे पर चमड़े के द्वारा आंशिक रूप से ढका नाशपाती के आकार का अनुनादक होता है, तथा इसका चपटा ललाट होता है। इसके मुट्ठे में लकड़ी का नक्काशीदार पक्षी बना होता है। इसको 'त्रिपुरा' के आदिवासियों द्वारा उपयोग किया जाता है।
58-सारंगी-
सारंगी लकड़ी, इस्पात, साँप की खाल और घोड़े के बाल से निर्मित एक तार वाद्य यंत्र है। यह पारंपरिक वाद्य यंत्र उत्तर भारत के कई हिस्सों में पाया जाता है और यह बिहार में एक लोकप्रीय वाद्य यंत्र है। उत्तर भारतीय शास्त्रीय संगीत में गायकों के साथ एक प्रमुख संगत के रूप में और उत्तर भारत में एकल प्रदर्शन के लिए और बिहार में लोक और पारंपरिक संगीत में इसका उपयोग किया जाता है।
उत्तर भारत में सारंगी-एकल लकड़ी के कुंदे को खोखला करके बनाया गया एक धनुर्वाद्य। मोटाई में भिन्नता लिए तीन आँत के बजाने वाले तार। सैंतीस इस्पात के अनुकंपी तार। इसे घोड़े के बाल से बने गज से बजाया जाता है। तारों को उँगलियों के पोरों से नहीं बल्कि नाखूनों के आधार से रोका जाता है। उत्तर भारतीय शास्त्रीय संगीत में गायकों के साथ एक प्रमुख संगत के रूप में और एकल प्रदर्शन के लिए भी इस वाद्य यंत्र का उपयोग किया जाता है।
बिहार में सारंगी-खूँटी धानी से युक्त लकड़ी का ढाँचा, छोटा अंगुलिपटल (दाँडी), और नाशपाती के आकार का अनुनादक। नीचे का खुला हुआ सिरा सांप की खाल से ढका होता है। इसमें आँत के दो मुख्य तार और इस्पात से बने चार अनुकंपी तार होते हैं। इसे गज के द्वारा बजाया जाता है और लोक तथा पारंपरिक संगीत में इसका उपयोग किया जाता है।
59-सारंगा-
“सारंगा लकड़ी, इस्पात, घोड़े के बाल और आँत से निर्मित एक तार वाद्य यंत्र है। यह लोक वाद्य यंत्र जम्मू और कश्मीर में पाया जाता है। मुख्य रूप से जम्मू और कश्मीर के 'जोगी' और 'हरदी' समुदाय द्वारा उपयोग किया जाता है।“
“ख़ुश्क अनुनादक के साथ लकड़ी से निर्मित एक आयताकार ढाँचे वाला धनुर्वाद्य। इसमें तीन बजाने वाले तार होते हैं जिसमें से इस्पात का एक मुड़ा हुआ तार और दो आँत से निर्मित तार होते हैं, तेरह अनुकंपी तार होते हैं। वाद्य यंत्र को बजाते वक़्त सीधा रखा जाता है, अनुनादक को गोद में और नली को वाद्य यंत्र वादक के बाएँ कंधे पर रखा जाता है। इस वाद्य यंत्र को घोड़े के बाल से बने गज से बजाया जाता है। यह जम्मू और कश्मीर के 'जोगी' और 'हरदी' समुदाय द्वारा उपयोग में लाया जाता है।“
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