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पहाड़ का अस्तित्व - (पहाड़ की नारी) श्याम सिंह बिष्ट

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नारी के बिना पहाड़ अधूरा - या यहां यह कहना गलत नहीं होगा कि पहाड़ का अस्तित्व ही नारी के कारण टिका हुआ है यदि पहाड़ों से कुछ हद तक पलायन रुका है तो उसमें पहाड़ों की नारी की भूमिका हमेशा पुरुषों से आगे है और भविष्य में भी आगे ही रहेगी ।
हमारे पहाड़ों की नारी की दिनचर्या हमेशा सूर्य के प्रातः की लालिमा कै घर मैं दस्तक देने से पहले से ही प्रारंभ हो जाती है, सुबह-सुबह मौसम चाहे बरसात का हो या गर्मी या पहाड़ों की रूह और हाथों कौ कंपन करने वाली ठंड का हि क्यों नहीं हो,, घर के कार्य करने की दिनचर्या - सूर्य के घरों में आते हुए किरणों से पहले ही प्रारंभ हो जाती है ।

चाहे वह कार्य किसी भी प्रकार का क्यों ना हो सूर्योदय से पहले " नह " से पानी लाना अथवा गाय का दूध या गाय भैंस और अन्य जानवरों को चारा देने का ही कार्य क्यों न हो ।
उसके बाद घर के चूल्हा - चौकी या दूसरे ही काम क्यों ना हो यदि इस बीच में पहाड़ों की नारी को अपने लिए समय निकला तो सही वरना खेतों का कार्य प्रारंभ हो जाता है ।
"नारी और पुरुष का स्वभाव हमेशा एक दूसरे के विपरीत होता है" पुरुष प्रधान समाज अपने काम के साथ-साथ अपने लिए खेल व मनोरंजन का वक्त भी निकाल लेता है, वहीं इसके विपरीत "नारी " सिर्फ अपने कार्यों को ही पहली प्राथमिकता देती है ।
पहाड़ों की नारी की महत्वता का पूर्वालोकन इसी बात से लगाया जा सकता है कि मौसम चाहे कोई भी हो परंतु पहाड़ों की नारी का कार्य कभी भी समाप्त नहीं होता, चाहे वह "शरद ऋतु " में प्रात: उठने के बाद दूर -दूर शरीर व मन को थकान कर देने वाले घनघोर जंगलों से लकड़ी लाने का कार्य हो या, "जैठ की जमीन को तप - तपाति ग्रीष्म ऋतु " में खेतों में कभी बैठकर तो कभी - घंटों आधि कमर झुका कर खेतों में कृषि करनै का कोई भी कार्य क्यों ना हो ।

इसके विपरीत शहरों में मौसम से बचाव के लिए हर सुख सुविधा की सहूलियत होती है चाहे वह घर, ऑफिस मैं AC, कूलर, या मौसम के अनुरूप तरल पेय पदार्थ का सेवन ही क्यों ना हो ।
खेतों का कार्य पूर्ण करके व थकान से चकनाचूर होने के बावजूद भी घर को आते हुए पहाड़ों की नारी अपने साथ कुछ न कुछ सामान या अपने सर पर कुछ न कुछ समान लाते हुए हमेशा दिखाई देगी । जहां थकान से चकनाचूर होने के बावजूद "एक तिनका उठाना भी मनुष्य को लोहे का समान लगता है " वहीं इसके विपरीत पहाड़ों की नारी की दिनचर्या अपने आप में - एक अमूल्य योगदान को परिभाषित करने वाली होती है ।
यहां पर हमारे गाँव के शाही जी द्वारा कुछ लाइनें पहाड़ों की नारी के ऊपर एकदम सटीक बैठती है- "यू क्षि हमार पहाड़ां सैंणि शेर समाना"
पहाड़ों में रहने वाली पहाड़ों से भी मजबूत इरादों वाली पहाड़ों की नारी को मेरा शत-शत प्रणाम !!

कैसे सुनाऊं - पहाड़ों की नारी की यह व्यथा,
हाथ में दातुल, कमर मैं कुटव,
चेहरे पर थकान का ना कोई नामोनिशां !!

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