तो गोमती की जिन्दगी यह है। वो सब्ज़ी बेचती है। बंगाल केमिकल के पास वर्ली में। उसका आदमी सुबह दुकान लगाने में उसकी मदद करता है फिर चिलिया की चाय पीकर काम पर चला जाता है। चढ़ती-खिलती उम्र है गोमती की। पता चला कि उसके पास दुकान थी, पर वह पटरी पर आ गई। -तुम्हें दुकान छोड़कर पटरी पर क्यों आना पड़ा गोमती?
-यहाँ का सब ग्राहक गुजराती है। मांस-मच्छी नहीं खाता। हमेरा दुकान मच्छीवाले के बगल में होता। वह पानी छिड़कता तो हमेरे साग-सब्ज़ी पर पड़ता। इस खातिर हमेरा दुकान चलता नहीं था। तबी हमेरे के पाण्डू, पाण्डू समझता साहेब? वही पुलिस का आदमी। वो हमेरे को बोला-तू इतना बूटीफुल है...मधुबाला का माफ़िक। तेरा दुकान तो महल पिक्चर की तरह चलेगा। तू पटरी पर उतर आ। उदर बैठ। हम बोला-उदर कइसे बैठेगा...मुन्सीपालटी वाला आएँगा, तुमेरा भाई-बन्द आएँगा, लफड़ा करेगा, तबी हम क्या करेगा। वो बोला-निस्फिकर रह। मैं हूँ न! -तबी से हम पटरी पर आ गया।
-तो कोई झगड़ा-टंटा नहीं हुआ?
-नहीं साहेब! उसका छतरी हमारे सिर पर है।
-वो कभी आता है?
-हाँ, जब हमारा घरवाला चिलिया का चाय पी के चला जाता है, तबी कबी-कबी वो आता है। कबी दिन में उसल-पाव लेके आता है। कभी बटाटा-बड़ा खिलाता है। उसकी खातिर बाकी लोग हमेरे को बड़ी इज्जत देता।
-तुम बम्बई कब आईं?
-तीन बरस हुआ साहेब।
-क्यों बम्बई आना पड़ा तुम्हें?
-मालेगाँव का है हम। उदर मारकाट हुआ। हमेरा बापू मारा गया। वो ख़ुद मारकाट करता था साहेब...
-वो खुद मारकाट करता था? लेकिन क्यों?
-अब ये तो मालूम नहीं साहेब...पन उन-दिन बापू की जेब में दारु का पौव्वा जरूर होता था। वो दारूबाज था।
-उधर मालेगाँव में तुम्हारा बापू क्या करता था? तुम्हारा घर कैसे चलता था?
-बित्ताभर जमीन था। उसी पर जवार उगाता था। हमेरा आई खुश रहता था। पेट भरता था। लेकिन तबी बापू मारकाट का धन्धा पकड़ लिया। घर में अकड़ के आने लगा! दारू के नशे में ताल ठोंकता...आई को गाली बकता। बोलता :
-तू तुरक है!....ये तुरक क्या होता है साहेब?
-तुरक हमलावर थे। पर बाद में वो यहीं बस गए। उन्होंने इस देश को अपना देश बना लिया....तो क्या तुम्हारी आई मुसलमान थी?
-मालूम नहीं साहेब...वो तुरक होती, मुसलमान होती तो मैं उसके पेट से हिंदू कैसे पैदा होती साहेब? दाड़िम के बीज से दाड़िम पैदा होता है। आम के बीज से आम पैदा होता है...मैं तो हिंदू हूँ साहेब... बापू शिव सैनिक था तो मैं भी शिव सैनिक हूँ। पन बापू को आई बहुत समझाती थी-तू किसान का बेटा है...अकड़ के मत चल...मार काट में मत पड़...अपने खेतों की तरफ देख। दाना आते ही हर खेत झुक जाता है...आबदाने का कोई खेत तेरी कमर से ऊपर नहीं जाता...उसी की तरह झुक के रह...मगर हमेरा बापू नहीं समझा, मारकाट में मारा गया।
-यह तो बहुत अफसोस की बात है... तो फिर...उसके बाद?
-उसके बाद हम भिवण्डी चला गया। वहाँ हमेरा मामा होता। उधर फिर मारकाट हुआ, उसी में हमेरा आई मारा गया।
-ओहो, यह तो बड़ी दर्दनाक दास्तान है...तुमने यह सब कैसे सँभाला? कैसे बर्दाश्त किया? तुम्हारी आई...
-वो उदर एक जच्चा-बच्चा घर में आया का काम करता। मारकाट वाला आया तो चार-चार दिन के बच्चा को भी नहीं छोड़ा। वो चीखता था-ये तुरक का बच्चा नहीं, कोबरा का बच्चा है...उसी मारकाट में हमेरा आई मारा गया। तबी हम क्या करता साहेब...हम मुम्बादेवी के शरण में भागा।
-तो बम्बई आकर कैसे जिन्दगी शुरू की तुमने? यह तो बड़ी मुश्किलों-परेशानियों के दिन रहे होंगे?
-अब ये तो हमेरा नसीब है साहेब...मुम्बादेवी की शरण में आते ही नरेश मिल गया।
-नरेश! कौन नरेश?
-हमेरा घरवाला। सिद्धि विनायक मंदिर में हम अपना नसीब माँगने गया। उदर ही नरेश फूल माला बेचने का काम करता। उसने हमेरे गले में माला डाला, तबी से हम मियाँ-बीवी हो गया। -तो नरेश क्या अभी भी सिद्धि विनायक मन्दिर में मालाएँ बेचने का काम करता है?
-नहीं साहेब...वो एक जूता फैक्ट्री में काम करता है और जूता खाता है...तबी तो हम सब्जी का दूकान लगाया। हमेरे को पइसे से जास्ती (ज्यादा) इज्जत का जरूरत है।
-तुम्हारे बापू और आई नहीं रहे, तो अब घर में कोई और नहीं है क्या?
-है न, हमारी सास! नरेश की माँ!
-तुम्हारी सास तुम्हारे साथ रहती हैं?
-नहीं, वो पुणे में रहती है।
-पुणे में क्या करती है?
-करेगी क्या, वो तो अन्धी है।
-अन्धी है....तो कैसे रहती है? आप उसकी देखभाल करती हैं?
-हाँ, करते हैं न!
-आप उसे कूछ पैसे भेजती हैं?
-पइसा किधर से भेजेंगे साहेब! हमेरे के पास पइसा कहाँ है?
-तो आप अपनी सास की देखभाल कैसे करती हैं?
-हम गणपति त्यौहार पर उसे एक धोती हर साल भेजते हैं...
-लेकिन आपकी सास अन्धी है। कोई काम कर नहीं सकती। वह भूखी मरती होगी...धोती से वह कैसे गुजारा करेगी?
-तो क्या करेंगे साहेब? सास को भूखा तो रखा जा सकता है. ..नंगा तो नहीं रखा जा सकता!
(‘महफ़िल’ से)


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