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रक्षाबंधन का धार्मिक महत्व एवं इतिहास

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रक्षा बंधन क्यों मनाया जाता है? रक्षा बंधन आने वाला है। ये सुनकर ही बहुत सी बहनों के चेहरे में खुशी झलक जाती है। और हो भी क्यूँ न ये भाई बहन का रिश्ता ही कुछ ऐसा होता है किसे की शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता है। ये रिश्ता इतना ज्यादा पवित्र होता है की इसका सम्मान पूरी दुनिभर में किया जाता है। ऐसे में शायद ही कोई होगा जिसे की ये न पता हो की रक्षा बंधन का अर्थ क्या है और इसे कैसे मनाया जाता है ?

रक्षा बंधन क्या है ?
रक्षा बंधन का पर्व दो शब्दों के मिलने से बना हुआ है, “रक्षा” और “बंधन“. संस्कृत भाषा के अनुसार, इस पर्व का मतलब होता है की “एक ऐसा बंधन जो की रक्षा प्रदान करता हो”। यहाँ पर “रक्षा” का मतलब रक्षा प्रदान करना होता है उअर “बंधन” का मतलब होता है एक गांठ, एक डोर जो की रक्षा प्रदान करे. ये दोनों ही शब्द मिलकर एक भाई-बहन का प्रतिक होते हैं। यहाँ ये प्रतिक केवल खून के रिश्ते को ही नहीं समझाता बल्कि ये एक पवित्र रिश्ते को जताता है। यह त्यौहार खुशी प्रदान करने वाला होता है वहीँ ये भाइयों को ये याद दिलाता है की उन्हें अपने बहनों की हमेशा रक्षा करनी है।

रक्षाबंधन क्यों मनाते है?
ये सवाल की रक्षा बंधन हम क्यूँ मानते हैं आप में से बहुतों के मन में जरुर होगा। तो इसका जवाब है की यह त्यौहार असल में इसलिए मनाया जाता है क्यूंकि ये एक भाई का अपने बहन के प्रति कर्तव्य को जाहिर करता है। वहीँ इसे केवल सगे भाई बहन ही नहीं बल्कि कोई भी स्त्री और पुरुष जो की इस पर्व की मर्यादा को समझते है वो इसका पालन कर सकते हैं। इस मौके पर, एक बहन अपने भाई के कलाई में राखी बांधती है। वहीँ वो भगवान से ये मांगती है की उसका भाई हमेशा खुश रहे और स्वस्थ रहे। वहीँ भाई भी अपने बहन को बदले में कोई तौफा प्रदान करता है और ये प्रतिज्ञा करता है की कोई भी विपत्ति आ जाये वो अपने बहन की रक्षा हमेशा करेगा। साथ में वो भी भगवान से अपने बहन ही लम्बी उम्र और अच्छे स्वास्थ्य की मनोकामना करता है।  वहीँ इस त्यौहार का पालन कोई भी कर सकता है फिर चाहे वो सगे भाई बहन हो या न हो। अब शायद आपको समझ में आ ही गया होगा की रक्षा बंधन क्यूँ मनाया जाता है।

रक्षा बंधन का इतिहास-
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राखी का त्यौहार पुरे भारतवर्ष में काफी हर्ष एवं उल्लाश के साथ मनाया जाता है। यह एक ऐसा त्यौहार है जिसमें क्या धनी क्या गरीब सभी इसे मनाते हैं। लेकिन सभी त्योहारों के तरह ही राखी इन हिंदी के भी एक इतिहास है, ऐसे कहानियां जो की दंतकथाओं में काफी लोकप्रिय हैं। चलिए ऐसे ही कुछ रक्षा बंधन की कहानी इन हिंदी के विषय में जानते हैं।

1. सम्राट Alexander और सम्राट पुरु
राखी त्यौहार के सबसे पुरानी कहानी सन 300 BC में हुई थी. उस समय जब Alexander ने भारत जितने के लिए अपनी पूरी सेना के साथ यहाँ आया था। उस समय भारत में सम्राट पुरु का काफी बोलबाला था। जहाँ Alexander ने कभी किसी से भी नहीं हारा था उन्हें सम्राट पुरु के सेना से लढने में काफी दिक्कत हुई। जब Alexander की पत्नी को रक्षा बंधन के बारे में पता चला तब उन्होंने सम्राट पुरु के लिए एक राखी भेजी थी जिससे की वो Alexander को जान से न मार दें। वहीँ पुरु ने भी अपनी बहन का कहना माना और Alexander पर हमला नहीं किया था।

2. रानी कर्णावती और सम्राट हुमायूँ
रानी कर्णावती और सम्राट हुमायूँ की कहानी का कुछ अलग ही महत्व है। ये उस समय की बात है जब राजपूतों को मुस्लमान राजाओं से युद्ध करना पड़ रहा था अपनी राज्य को बचाने के लिए. राखी उस समय भी प्रचलित थी जिसमें भाई अपने बहनों की रक्षा करता है। उस समय चितोर की रानी कर्णावती हुआ करती थी. वो एक विधवा रानी थी। और ऐसे में गुजरात के सुल्तान बहादुर साह ने उनपर हमला कर दिया। ऐसे में रानी अपने राज्य को बचा सकने में असमर्थ होने लगी। इसपर उन्होंने एक राखी सम्राट हुमायूँ को भेजा उनकी रक्षा करने के लिए।और हुमायूँ ने भी अपनी बहन की रक्षा के हेतु अपनी एक सेना की टुकड़ी चित्तोर भेज दिया। जिससे बाद में बहादुर साह के सेना को पीछे हटना पड़ा था।

3. इन्द्रदेव की कहानी
पुरानो या वर्णित है की जब असुरों के राजा बाली ने देवताओं के ऊपर आक्रमण किया था तब देवताओं के राजा इंद्र को काफी क्ष्यती पहुंची थी। इस अवस्था को देखकर इंद्र की पत्नी सची से रहा नहीं गया और वो विष्णु जी के करीब गयी इसका समाधान प्राप्त करने के लिए। तब प्रभु विष्णु ने एक धागा सची को प्रदान किया और कहा की वो इस धागे को जाकर अपने पति के कलाई पर बांध दें।और जब उन्होंने ऐसा किया तब इंद्र के हाथों राजा बलि की पराजय हुई। इसलिए पुराने समय में युद्ध में जाने से पूर्व राजा और उनके सैनिकों के हाथों में उनकी पत्नी और बहनें राखी बांधा करती थी जिससे वो सकुशल घर जीत कर लौट सकें।

4. माता लक्ष्मी और राजा बलि की कहानी
असुर सम्राट बलि एक बहुत ही बड़ा भक्त था भगवान विष्णु का. बलि की इतनी ज्यादा भक्ति से प्रसन्न होकर विष्णु जी ने बलि के राज्य की रक्षा स्वयं करनी शुरू कर दी। ऐसे में माता लक्ष्मी इस चीज़ से परेशान होने लगी।क्यूंकि विष्णु जी अब और वैकुंठ पर नहीं रहते थे। अब लक्ष्मी जी ने एक ब्राह्मण औरत का रूप लेकर बलि के महल में रहने लगी। वहीँ बाद में उन्होंने बलि के हाथों में राखी भी बांध दी और बदले में उनसे कुछ देने को कहा।अब बलि को ये नहीं पता था की वो औरत और कोई नहीं माता लक्ष्मी है इसलिए उन्होंने उसे कुछ भी मांगने का अवसर दिया। इसपर माता ने बलि से विष्णु जी को उनके साथ वापस वैकुंठ लौट जाने का आग्रह किया। इस पर चूँकि बलि से पहले ही देने का वादा कर दिया था इसलिए उन्हें भगवान विष्णु को वापस लौटना पड़ा। 

5. कृष्ण और द्रौपधी की कहानी
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लोगों की रक्षा करने के लिए श्री कृष्ण को दुष्ट राजा शिशुपाल को मारना पड़ा। इस युद्ध के दौरान कृष्ण जी की अंगूठी में गहरी चोट आई थी। जिसे देखकर द्रौपधी ने अपने वस्त्र का उपयोग कर उनकी खून बहने को रोक दिया था। भगवान कृष्ण को द्रौपधी की इस कार्य से काफी प्रसन्नता हुई और उन्होंने उनके साथ एक भाई बहन का रिश्ता निभाया। वहीं उन्होंने उनसे ये भी वादा किया की समय आने पर वो उनका जरुर से मदद करेंगे। बहुत वर्षों बाद जब द्रौपधी को कुरु सभा में जुए के खेल में हारना पड़ा तब कौरवों के राजकुमार दुहसासन ने द्रौपधी का चिर हरण करने लगा। इसपर कृष्ण ने द्रौपधी की रक्षा करी थी और उनकी लाज बचायी थी।

6. महाभारत में राखी
भगवान कृष्ण ने युधिष्ठिर  को ये सलाह दी की महाभारत के लढाई में खुदको और अपने सेना को बचाने के लिए उन्हें राखी का जरुर से उपयोग करना चाहिए युद्ध में जाने से पहले. इसपर माता कुंती ने अपने नाती के हाथों में राखी बांधी थी वहीँ द्रौपधी ने कृष्ण के हाथो पर राखी बांधा था।

7. संतोषी  माँ की कहानी
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भगवान गणेश के दोनों पुत्र सुभ और लाभ इस बात को लेकर परेशान थे की उनकी कोई बहन नहीं है। इसलिए उन्होंने अपने पिता को एक बहन लाने के लिए जिद की। इसपर नारद जी के हस्तक्ष्येप करने पर बाध्य होकर भगवान् गणेश को संतोषी माता को उत्पन्न करना पड़ा अपने शक्ति का उपयोग कर। वहीँ ये मौका रक्षा बंधन ही था जब दोनों भाईओं को उनकी बहन प्राप्त हुई।

8. यम और यमुना की कहानी
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एक लोककथा के अनुसार मृत्यु के देवता यम ने करीब 12 वर्षों तक अपने बहन यमुना के पास नहीं गए, इसपर यमुना को काफी दुःख पहुंची। बाद में गंगा माता के परामर्श पर यम जी ने अपने बहन के पास जाने का निश्चय किया। अपने भाई के आने से यमुना को काफी खुशी प्राप्त हुई और उन्होंने यम भाई का काफी ख्याल रखा। इस पर यम काफी प्रसन्न हो गए और कहा की यमुना तुम्हे क्या चाहिए। जिसपर उन्होंने कहा की मुझे आपसे बार बार मिलना है। जिसपर यम ने उनकी इच्छा को पूर्ण भी कर दिया. इससे यमुना हमेशा के लिए अमर हो गयी।

रक्षाबंधन कैसे मनाया जाता है?
सभी त्योहारों के तरह ही रक्षा बंधन को मनाने की एक विधि होती है जिसका पालन करना बहुत ही आवश्यक होता है। चलिए इस विषय में विस्तार में जानते हैं।

रक्षाबंधन के दिन सुबह जल्दी उठकर नहा लेना होता है। इससे मन और शरीर दोनों ही पवित्र हो जाता है। फिर सबसे पहले भगवान की पूजा की जाती है। पुरे घर को साफ कर चरों तरफ गंगा जल का छिडकाव किया जाता है।

अब बात आती है राखी बांधने की। इसमें पहले राखी की थाली को सजाया जाता है। रक्षाबधंन के प्रवित्र त्योहार के दिन पितल की थाली मे ऱाखी ,चंदन ,दीपक ,कुमकुम, हल्दी,चावल के दाने नारियेल ओर मिठाई रखी जाती है।

अब भाई को बुलाया जाता है और उन्हें एक साफ़ स्थान में नीचे बिठाया जाता है। फिर शुरू होता है राखी बांधने की विधि। सबसे पहले थाली के दीये को जलाती है, फिर बहन भाई के माथे पर तिलक चन्दन लगाती है। वहीँ फिर भाई की आरती करती है।  उसके बाद वो अक्षत फेंकती हुई मन्त्रों का उच्चारण करती है। और फिर भाई के कलाई में राखी बांधती है। वहीँ फिर उसे मिठाई भी खिलाती है। यदि भाई बड़ा हुआ तब बहन उसके चरण स्पर्श करती है वहीँ छोटा हुआ तब भाई करता है। 

अब भाई अपने बहन को भेंट प्रदान करता है। जिसे की बहन खुशी खुशी लेती है। एक बात की जब तक राखी की विधि पूरी न हो जाये तब तक दोनों को व्रत  ही रहना पड़ता है।  इसके पश्चात राखी का रस्म पूरा होता है।

भारत के दुसरे प्रान्तों में रक्षा बंधन कैसे मनाया जाता है?
चूँकि भारत एक बहुत ही बड़ा देश है इसलिए यहाँ पर दुसरे दुसरे प्रान्तों में अलग अलग ढंग से त्योहारों को मनाया जाता है। चलिए अब जानते हैं की रक्षाबंधन को कैसे दुसरे प्रान्तों में मनाया जाता है।

1. पश्चिमी घाट में रक्षाबंधन कैसे मानते है
पश्चिमी घाट की बात करें तब वहां पर राखी को एक देय माना जाता है भगवान वरुण को। जो की समुद्र के देवता है। इस दिन वरुण जी को नारियल प्रदान किये जाते हैं। इस दिन नारियल को समुद्र में फेंका जाता है।इसलिए इस राखी पूर्णिमा को नारियल पूर्णिमा भी कहा जाता है।

2. दक्षिण भारत में रक्षाबंधन कैसे मानते है
दक्षिण भारत में, रक्षा बंधन को अवनी अबित्तम भी कहा जाता है। ये पर्व ब्राह्मणों के लिए ज्यादा महत्व रखता है। क्यूंकि इस दिन वो स्नान करने के बाद अपने पवित्र धागे (जनेयु) को भी बदलते हैं मन्त्रों के उच्चारण करने के साथ। इस पूजा को श्रावणी या ऋषि तर्पण भी कहा जाता है। सभी ब्राह्मण इस चीज़ का पालन करते हैं।

3. उत्तरी भारत में रक्षाबंधन कैसे मानते है
उत्तरी भारत में रक्षा बंधन को कजरी पूर्णिमा के नाम से जाना जाता है। इस पर्व के दौरान खेत में गेहूं औरदूसरे अनाज को बिछाया जाता है। वहीं ऐसे मौके में माता भगवती की पूजा की जाती है। और माता से अच्छी फसल की कामना की जाती है।

4. गुजरात में रक्षाबंधन कैसे मानते है
गुजरात के लोग इस पुरे महीने के प्रत्येक सोमवार को शिवलिंग के ऊपर पानी चढाते हैं। इस पवित्र मौके पर लोग रुई को पंच्कव्य में भिगोकर उसे शिव लिंग के चारों और बांध देते हैं।इस पूजा को पवित्रोपन्ना भी कहा जाता है।

5. ग्रंथो में रक्षाबंधन
यदि आप ग्रंथो में देखें तब आप पाएंगे की रक्षाबंधन को ‘पुन्य प्रदायक ‘ माना गया है। इसका मतलब की इस दिन अच्छे कार्य करने वालों को काफी सारा पुन्य प्राप्त होता है।

रक्षाभंदन को ‘विष तारक‘ या विष नासक भी माना जाता है। वहीँ इसे ‘पाप नाशक’ भी कहा जाता है जो की ख़राब कर्मों को नाश करता है।

रक्षा बंधन का महत्व
रक्षाबंधन का महत्व सच में सबसे अलग होता है। ऐसा भाई बहन का प्यार शायद ही आपको कहीं और देखने को मिले किसी दुसरे त्यौहार में। ये परंपरा भारत में काफी प्रचलित है और इसे श्रावन पूर्णिमा के लिए मनाया जाता है। यह एकमात्र ऐसा पर्व है जिसमें की बहन भाई के हाथों में राखी बांधकर उससे अपने रक्षा की कसम लेती है। वहीँ भाई का भी ये कर्तव्य होता है की वो किसी भी परिस्थिति में अपने बहन की रक्षा करे। सच में ऐसा पवित्र पर्व आपको दुनिया में कहीं और देखने को न मिले।

राखी का त्यौहार श्रावन के महीने में पड़ता है, इस महीने में गर्मी के बाद बारिस हो रही होती है, समुद्र भी शांत होता है और पुर वातावरण भी काफी मनमोहक होता है।

ये महिना सभी किशानों, मछवारे और सामुद्रिक यात्रा करने वाले व्यवसायों के लिए भी काफी महत्व रखता है। रक्षाबंधन को नारियली पूर्णिमा भी कहा जाता है भारत के सामुद्रिक तट इलाकों में। इस दिन वर्षा के देवता इंद्र और सुमद्र के देवता वरुण की पूजा की जाती है। वहीँ देवताओं को नारियल अर्पण किये जाते हैं और खुशहाली की कामना की जाती है।

इसमें नारियल को समुद्र में फेंका जाता है या कोई दुसरे पानी के जगह में। लोगों का मानना है की प्रभु श्रीराम भी माता सीता को छुड़ाने के लिए इसी दिन अपनी यात्रा प्रारंभ की थी। उन्होंने समुद्र को पत्थरों से निर्मित पुल के माध्यम से पार किया था जिसे की वानर सेना ने बनाया था। नारियल के उपरी भाग में जो तीन छोटे छोटे गड्ढे होते हैं उसे प्रभु शिवजी का माना जाता है।

मछवारे भी अपने मछली पकड़ने की शुरुवात इसी दिन से करते हैं क्यूंकि इस समय समुद्र शांत होता है और उन्हें पानी में जाने में कोई खतरा नहीं होता है।

किशानों के लिए ये दिन कजरी पूर्णिमा होता है। किसान इसी दिन से ही अपने खेतों में गेहूं की बीज बोते हैं और अच्छी फसल की कामना करते हैं भगवान से।

ये दिन ब्राह्मणों के लिए भी काफी महत्वपूर्ण होता है। क्यूंकि इस दिन वो अपने जनेयु को बदलते हैं मन्त्रों के उचार्रण के साथ। वहीँ वो इस पूर्णिमा को ऋषि तर्पण भी कहते हैं। वहीँ विधि के ख़त्म हो जाने के बाद ये आपस में नारियल से निर्मित मिठाई खाते हैं।

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