सदाफूली या सदाबहार बारहों महीने खिलने वाले फूलों का एक पौधा है। इसकी आठ जातियां हैं। इनमें से सात मेडागास्कर में तथा आठवीं भारतीय उपमहाद्वीप में पायी जाती है। इसका वैज्ञानिक नाम केथारेन्थस है। भारत में पायी जाने वाली प्रजाति का वैज्ञानिक नाम केथारेन्थस रोजस है। इसे पश्चिमी भारत के लोग सदाफूली के नाम से बुलाते है। मेडागास्कर मूल की यह फूलदार झाड़ी भारत में कितनी लोकप्रिय है इसका पता इसी बात से चल जाता है कि लगभग हर भारतीय भाषा में इसको अलग नाम दिया गया है- उड़िया में अपंस्कांति, तमिल में सदाकाडु मल्लिकइ, तेलुगु में बिल्लागैन्नेस्र्, पंजाबी में रतनजोत, बांग्ला में नयनतारा या गुलफिरंगी, मराठी में सदाफूली और मलयालम में उषामालारि। इसके श्वेत तथा बैंगनी आभावाले छोटे गुच्छों से सजे सुंदर लघुवृक्ष भारत की किसी भी उष्ण जगह की शोभा बढ़ाते हुए सालों साल बारह महीने देखे जा सकते हैं। इसके अंडाकार पत्ते डालियों पर एक-दूसरे के विपरीत लगते हैं और झाड़ी की बढ़वार इतनी साफ़ सुथरी और सलीकेदार होती है कि झाड़ियों की काँट छाँट की कभी ज़रूरत नहीं पड़ती।
वानस्पतिक संरचना-
वैसे तो यह झाड़ी इतनी जानदार है कि बिना देखभाल के भी फलती-फूलती रहती है, किंतु रेशेदार दोमट मिट्टी में थोड़ी-सी कंपोस्ट खाद मिलने पर आकर्षक फूलों से लदी-फदी सदाबहार का सौंदर्य किसी के भी हृदय को प्रफुल्लित कर सकता है। इसके फल बहुत से बीजों से भरे हुए गोलाकार होते हैं। इसकी पत्तियों, जड़ तथा डंठलों से निकलनेवाला दूध विषैला होता है। पौधों के सामने भी समस्याएँ होती हैं। पेड़-पौधे चाहते हैं कि उनके फल तो जानवर खाएँ, ताकि उनके बीज दूर-दूर तक जा सकें, किंतु यथासंभव उनकी पत्तियाँ तथा जड़ न खाएँ। इसलिए अनेक वृक्षों के फल तो खाद्य होते हैं, किंतु पत्तियाँ, जड़ आदि कड़वे या ज़हरीले। सदाबहार ने इस समस्या का समाधान अपने फलों को खाद्य बनाकर तथा पत्तियों व जड़ों को कडुवा तथा विषाक्त बनाकर किया है। ऐसे विशेष गुण पौधों में विशेष क्षारीय (एल्कैलायड) रसायनों द्वारा आते हैं।
औषधीय गुण-
विकसित देशों में रक्तचाप शमन की खोज से पता चला कि 'सदाबहार' झाड़ी में यह क्षार अच्छी मात्रा में होता है। इसलिए अब यूरोप भारत चीन और अमेरिका के अनेक देशों में इस पौधे की खेती होने लगी है। अनेक देशों में इसे खाँसी, गले की ख़राश और फेफड़ों के संक्रमण की चिकित्सा में इस्तेमाल किया जाता है। सबसे रोचक बात यह है कि इसे मधुमेह के उपचार में भी उपयोगी पाया गया है। वैज्ञानिकों का कहना है कि सदाबहार में दर्जनों क्षार ऐसे हैं जो रक्त में शकर की मात्रा को नियंत्रित रखते है। जब शोध हुआ तो 'सदाबहार' के अनेक गुणों का पता चला - सदाबहार पौधा बारूद - जैसे विस्फोटक पदार्थों को पचाकर उन्हें निर्मल कर देता है। यह कोरी वैज्ञानिक जिज्ञासा भर शांत नहीं करता, वरन व्यवहार में विस्फोटक-भंडारों वाली लाखों एकड़ ज़मीन को सुरक्षित एवं उपयोगी बना रहा है। भारत में ही 'केंद्रीय औषधीय एवं सुगंध पौधा संस्थान' द्वारा की गई खोजों से पता चला है कि 'सदाबहार' की पत्तियों में 'विनिकरस्टीन' नामक क्षारीय पदार्थ भी होता है जो कैंसर, विशेषकर रक्त कैंसर (ल्यूकीमिया) में बहुत उपयोगी होता है। आज यह विषाक्त पौधा संजीवनी बूटी का काम कर रहा है। बगीचों की बात करें तो १९८० तक यह फूलोंवाली क्यारियों के लिए सबसे लोकप्रिय पौधा बन चुका था, लेकिन इसके रंगों की संख्या एक ही थी- गुलाबी। १९९८ में इसके दो नए रंग ग्रेप कूलर (बैंगनी आभा वाला गुलाबी जिसके बीच की आँख गहरी गुलाबी थी) और पिपरमिंट कूलर (सफेद पंखुरियाँ, लाल आँख) विकसित किए गए।
सदाबहार का वानस्पतिक नाम Vinca rosea (कैथरैंथस रोज़िआ) है| यह एक सदाबहार जड़ी-बूटी है, जो मुख्य तौर पर दो रूप में पाई है: Vinca मेजर और Vinca minor. यह टहनियों वाली और सीधी जड़ी-बूटी है| इसके पत्ते चमकीले, जिनका आकार अंडाकार से लम्भकार होता है| इनके बीच की नाड़ी पीली और पत्तों का आकार छोटा होता है| इसके फूलों की 5 पत्तियां होती है, जिसके बीच में पीले-गुलाबी या जामुनी रंग की आंख होती है| इस पौधे से तैयार दवाईयां कई तरह की कैंसर की बीमारीयों के इलाज के लिए प्रयोग की जाती है| इसका मूल स्थान मैड़ागैसकर है और इसकी फसल पूरे भारत मै उगाई जाती है|
जलवायु-
इसे उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में उगाया जा सकता है। इसे 2.5 – 300 से. तापमान की आवश्यकता होती है। चमकदार रोशनी में सूर्य की धूप के साथ इसका विकास उच्च होता है।
मिट्टी
धूप में पूरी तरह से सूखी और बढ़िया निकास वाली मिट्टी इसकी खेती के लिए अच्छी मानी जाती है| इसके सख्त-पन के कारण, इसको लगभग हर तरह की मिट्टी में उगाया जा सकता है| इसकी खेती अनुपजाऊ मिट्टी में भी की जा सकती है| इसको ज्यादा उपजाऊ मिट्टी में ना उगाएं, क्योंकि इससे पौधे के फूलों को नुकसान पहुंचता है| इसके लिए मिट्टी का pH 6-6.5 होना चाहिए|
प्रसिद्ध किस्में और पैदावार
Catharanthus roseus Albus: इस किस्म के फूल सफेद रंग के होते है|
Catharanthus roseus Ocellatus: इसके फूल सफेद रंग के, जो बीच में से लाल होते है|
ज़मीन की तैयारी
इसकी खेती के लिए, ज्यादा उपजाऊ मिट्टी की जरूरत नहीं होती है| पर इसकी अच्छी पैदावार के लिए इसको जैविक मिट्टी में उगाया जा सकता है| 6 इंच गहरे बैड खोदे और बिजाई से पहले सुखी या कम्पोस्ट खाद की 1 इंच पतली परत बिछाएं|
बिजाई
बिजाई का समय
इस फसल की बिजाई का उचित समय सितम्बर से फरवरी तक का होता है|
फासला
पौधों के बीच का फासला 6-9 इंच होना चाहिए|
बिजाई का ढंग
इसकी बिजाई रोपाई द्वारा या जड़ों के भागों को काट कर की जाती है|
बीज की मात्रा
50 वर्ग फुट ज़मीन के लिए लगभग 2,000 बीजों की जरूरत होती है|
पनीरी की देख-रेख और रोपण
गर्मियों या बसंत के अंत में, 5-8 सैं.मी. लम्बे पौधे का भाग प्रजनन के लिए प्रयोग किया जाता है| भाग को काटने के तुरंत बाद इसकी कांट-छांट कर दें और इसको हार्मोन रूटिंग पाउडर में भिगोएं, जिससे मिट्टीके बीच खतरनाक रोगाणुओं को मरने में सहायता मिलती है| बिजाई अच्छी तरह से नम ज़मीन में करें और पौधों के बीच का फासला 30 सैं.मी. रखें| इनकी जड़ें 3-4 हफ्तों में निकल आती है और फिर यह आम पौधे की तरह ही विकास करते है| सर्दी के अंत या बसंत के शुरू में, बीजों को बोयें|
कुछ बीजों को लेकर ट्रे में बोयें जिसमे जड़ों में नमी बनी रहें| ट्रे को पतले कपड़े से ढक दें, ताकि ट्रे में नमी बनी रहें| ट्रे को प्रकाश में रखें|
बीज 2-3 हफ्तों में अंकुरण शुरू कर देते है, फिर ट्रे से कपड़ा हटा दें और नए पौधों को थोड़ा-थोड़ा पानी दें| मिट्टी को गिला रखनेयोग्य ही पानी दें, अनावश्यक पानी ना दें|
जब नए पौधे 1 सैं.मी. कद के हो जाये तो, इनको 8 सैं.मी. गोल गमलों में लगा दें|
खाद
ज़मीन की तैयारी के समय 50-100 क्विंटल रूड़ी की खाद डालें| पोटाशियम और फासफोरस को दो बराबर हिस्सों में डालें| पहली वार्षिक कांट-छांट के बाद और दूसरी जून-जुलाई के महीने में डालें|
खरपतवार नियंत्रण
पौधे के बढ़िया विकास के लिए नियमित गोड़ाई करें| गोड़ाई 2 महीने के फासले पर करें|
सिंचाई
गर्म और शुष्क मौसम या पौधे के विकास के समय पौधे के बढ़िया विकास के लिए नियमित पानी दें| हर 3 महीने बाद 15-15 दिनों के फासले पर सिंचाई करें| अनावश्यक पानी ना दें, क्योंकि इसके साथ पौधे के विकास को नुकसान होता है|
बीमारीयां और रोकथाम
बहुत तरह की जड़ें और फूलों की बीमारियां vinca को नुकसान पहुंचाती है| जड़ों की बीमारियां
काले रंग का जड़ गलन: यह बीमारी थिलाविओपसिस बैसिकोल फंगस के कारण होती है| इसके मुख्य लक्षण पत्तों का पीला पड़ना, विकास में रुकावट और पत्ते मुरझाना या मुड़ जाना है| इससे जड़ों पर भी गहरे धब्बे पड़ जाते है| इसकी रोकथाम के लिए फंगसनाशी जैसे कि थायोफानेट मिथाइल, टराइफयूमिजोल और फ्लूडीओक्सोनिल डालें|
उखेड़ा रोग: इस बीमारी के साथ बीज गलने लग जाते है, जिस कारण नए पौधे नष्ट हो जाते है या क्षतिग्रस्त हो जाते है|
पाईथियम जड़ गलन: यह जड़ों के सिरों पर हमला करती है और फिर धीरे-धीरे ऊपर कि तरफ बढ़ती रहती है| इसकी रोकथाम के लिए एटरिडाईआजोल, फोसेटिल- आल, मैफेनोजाम और परोपामोकारब जैसे फंगसनाशी डालें|
फाईटॉफथोरा जड़ गलन: इस बीमारी के साथ पत्ते पीले या जामुनी रंग के हो जाते है, पौधे का विकास रुक जाता है और पौधे सूखने के बाद मर जाते है| इसकी रोकथाम के लिए एटरिडाईआजोल, फोसेटिल- आल या मैफेनोजाम डालें|
राईज़ोकटोनियां जड़ गलन: इस बीमारी से साथ पौधा सूखने के बाद अचानक मर जाता है| इसकी रोकथाम के लिए फ्लूडीओक्सोनिल, इपराडाईऑन, पी सी एम बी, थायोफानेट मिथाइल या टराइफयूमिजोल की भारी स्प्रे करें या मिट्टी में डालें|
पत्तों की बीमारियां
उलोकलेडियम और अलटरनेरिया पत्तों के धब्बे: इससे तने, पत्तियां और पत्तों पर भूरे या काले रंग के धब्बे पड़ जाते है| इसकी रोकथाम के लिए पत्तों पर शुरुआती धब्बे दिखाई देने के समय एजोकसीस्टरोबिन, क्लोरोथैलोनिल, फ्लूडीओक्सोनिल या इपराडाईऑन जैसे फंगसनाशी 7-14 दिनों के फासले पर डालें|
फाईटॉफथोरा हवाई झुलस रोग: इस बीमारी से शाखाएं सूख जाती है और इन पर स्लेटी-हरे रंग के घाव बन जाते है| इसकी रोकथाम के लिए एजोकसीस्टरोबिन, फोसेटिल- आल 1 महीने के फासले पर 2-3 बार डालें|
टमाटरों के धब्बों वाला सूखा रोग (टी एस डब्लयू वी): इस बीमारी से पत्तों के बीच में काले गोल धब्बे या धारियां पड़ जाती है|
पत्तों पर स्लेटी धब्बे (स्लेटी फंगस): यह बीमारी पौधों को कमज़ोर कर देती है| इसकी रोकथाम के लिए क्लोरोथेनोनिल, इपराडाईऑन और मैंकोजेब जैसे फंगसनाशी डालें|
फसल की कटाई
इसके पौधे बिजाई से 12 महीने बाद तक तैयार हो जाते है| इसकी कटाई 3-3 महीने के फासले पर की जाती है| इसकी जड़ें, पत्तों और फूलों को अलग-अलग इक्क्ठा किया जाता है और इनको दवाइयां बनाने और नए पौधे तैयार करने के लिए प्रयोग किया जाता है|
कटाई के बाद
कटाई के बाद, जड़ें, बीजों, पत्त्तों और फूलों को धुप में सुखाया जाया है| फिर इनको हवा-रहित बक्सों में नमी से बचाने के लिए स्टोर कर लिया जाता है| पौधे के इन सूखे भागों को सदाबहार पाउडर जैसे उत्पाद तैयार किये जाते है|

