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जेट्रोफा (रतनजोत) की उन्नत खेती कैसे करें ?

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जेट्रोफा लगभग 175 प्रजाति की वनस्पतियों का समूह है जिसमें झाडियां और पौधे सम्मिलित हैं। इसके पौधे भारत, अफ्रिका, उत्तरी अमेरिका और कैरेबियन् जैसे ट्रापिकल क्षेत्रों में उत्पन्न होते हैं। यह एक बड़ा पादप है जो झाड़ियों के रूप में अर्द्ध शुष्क क्षेत्रों में उगता है। इस पादप से प्राप्त होने वाले बीजों में 25-30 प्रतिशत तक तेल निकाला जा सकता है। इस तेल से कार आदि चलाये जा सकते हैं तथा जो अवशेष बचता है उससे बिजली पैदा की जा सकती है। जेट्रोफा अनावृष्टि-रोधी सदाबहार झाडी है। यह कठिन परिस्थितियओं को भी झेलने में सक्षम है।

सामान्य नाम-

जंगली अरंड, व्याध्र अरंड, रतनजोत, चन्द्रजोत एवं जमालगोटा आदि।

वानस्पतिक नाम-

जैट्रोफा करकस 

जलवायु एवं मिट्टी-

यह समशीतोष्ण, गर्म रेतीले, पथरीले तथा बंजर भूमि में होता है। दोमट भूमि में इसकी खेती अच्छी होती है। जल जमाव वाले क्षेत्र उपयुक्त नहीं हैं।

बीज दर-
5 किलो प्रति हेक्टेयर

बीजोपचार-
जड़ सड़न तथा तना बिगलन के रोकथाम हेतु बीज उपचार 2 ग्राम दवा प्रति किलो बीज के अनुसार थाइरेम, बेबिस्टीन तथा वाइटावेक्स के (1:1:1) मिश्रण को बीज में मिलाकर बोयें।

बोआई एवं रोपण-
बीज अथवा कलम द्वारा पौधे तैयार किए जाते हैं। मार्च-अप्रैल माह में नर्सरी लगाई जाती है तथा रोपण का कार्य जुलाई से सितम्बर तक किया जा सकता है। बीज द्वारा सीधे गड्डों मे बुवाई की जाती है।

पौधे से पौधे की दूरी-
असिंचित क्षेत्रों में 2×2 मीटर और सिंचित क्षेत्रों में 3×3 मीटर की दूरी रखी जाती है। गड्ढे का आकार 45×45 x45 (लम्बाई x चौडाई x गहराई) से.मी. होता है। रतनजोत के पौधों को बाड़ के रूप में लगाने पर दूरी 0.50 x 0.50 मी.(दो लाइन) रखी जाती है।

पौधशाला-
(1) समतल क्यारीः 15 x15 से.मी. दूरी पर बीज बोयें। बोने के पूर्व बीज को 12 घंटो तक भिगोयें। तीन माह बाद स्वस्थ पौधों को रोपें।
(2) पॉली बैंगः बालू मिट्टी तथा कम्पोस्ट खाद (1:1:1) के मिश्रण को पॉली बैग (16″x12″) में भरें। 2-3 बीज बोयें, सिंचाई करें तथा स्वस्थ पौधों की 3 माह बाद रोपाई करें।

रोपण की विधि-
गड्डे में रेत, मिट्टी तथा कम्पोस्ट की खाद का मिश्रण 1:1:1 के अनुपात में भरें। नर्सरी में तैयार पौधों की रोपाई जुलाई माह से शुरू करें। कलम द्वारा तैयार करने हेतु लम्बाई 30-50 सेंटी मीटर व्यास, स्वस्थ, सुडौल चमकदार कई आँखों वाली निचली टहनियाँ चुनें।

परीक्षण में लगाई गई उन्नत किस्मे -
बिरसा कृषि विश्वविद्यालय में देश के विभिन्न भागों से निम्न 12 किस्मों का परीक्षण चल रहा है।

GIE – नागपुर, PKVJ-DHW,PKVJ – MKV,TFRI -1,TFRI -2, RJ- 117, पंत जी – सेल 1, पंत जी – सेल 2, कल्याणपुर, मानकेश्वर, चाण्डक, बामुण्डा

RJ- 117, GIE- नागपुर बरमुण्डा अच्छी पाई गई। सरदार कृषि विश्वविद्यालय, बनासकान्ठा से विकसित SDAUJI किस्म भी अच्छी है।

खाद एवं उर्वरक-
रोपण से पूर्व गड्ढे में मिट्टी (4 किलो), कम्पोस्ट की खाद (3 किलो) तथा रेत (3 किलो) के अनुपात का मिश्रण भरकर 20 ग्राम यूरिया 120 ग्राम सिंगल सुपर फॉस्फेट तथा 15 ग्राम म्युरेट ऑफ पोटाश डालकर मिला दें। दीमक नियंत्रण के लिए क्लोरो पायरिफॉस पाउडर (50 ग्राम ) प्रति गड्डा में डालें, तत्पश्चात पौधा रोपण करें।

सिंचाई एवं गुड़ाई-
शुष्क मौसम (मार्च से मई) में दो सिंचाई उत्तम रहती है। प्रत्येक तीन माह के अन्तराल पर खाद का प्रयोग तथा गुड़ाई करें।

खरपतवार नियंत्रण-
नर्सरी के पौधों को खरपतवार नियंत्रण हेतु विशेष ध्यान रखें तथा रोपा फसल में फावड़े, खुरपी आदि की मदद से घास हटा दें। वर्षा ऋतु में प्रत्येक माह खरपतवार नियंत्रण करें।

रोग नियंत्रण-
कोमल पौधों में जड़-सड़न तथा तना बिगलन रोग मुख्य है। नर्सरी तथा पौधों में रोग के लक्षण होने पर 2 ग्राम बीजोपचार मिश्रण प्रति लीटर पानी में घोल को सप्ताह में दो बार छिड़काव करें।

कीट नियंत्रण-
कोमल पौधों में कटूवा (सूंडी) तने को काट सकता है। इसके लिए Lindane या Follidol धूल का सूखा पाउडर भूरकाव से नियंत्रण किया जा सकता है। माइट के प्रकोप से बचाव के लिए 1 मिली लीटर मेटासिस्टॉक्स दवा को 1 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें।

कटाई-छँटाई-
पौधों को गोल छाते का आकार देने के लिए दो वर्ष तक कटाई-छँटाई आवश्यक है। प्रथम कटाई में रोपण के 7-8 महीने पश्चात पौधों को भूमि से 30-45 से.मी. छोड़कर शेष ऊपरी हिस्सा काट देना चाहिए। दूसरी छँटाई पुनः 12 महीने बाद सभी टहनियों में 1/3 भाग छोड़कर शेष हिस्सा काट देना चाहिए। प्रत्येक छँटाई के पश्चात 1 ग्राम बेविस्टीन 1 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें। अप्रैल और मई महीनों में छँटाई का कार्य करते हैं।

उपज-
बरसात के समय में पौधे में फूल आना प्रारंभ हो जाता है तथा दिसंबर-जनवरी माह में हरे रंग के फल काले पड़ने लगते हैं। जब फल का ऊपरी भाग काला पड़ने लगे तब तोड़ा जा सकता है।

जेट्रोफा की विशेषताएं-
  • इसके बीज सस्ते हैं
  • बीजों में तेल की मात्रा बहुत अधिक है (लगभग ३७%)
  • इससे प्राप्त तेल का ज्वलन ताप (फ्लैश प्वाइंट) अधिक होने के कारण यह बहुत सुरक्षित भी है।
  • १.०५ किग्रा जत्रोफा तेल से १ किग्रा बायोडिजल पैदा होता है।
  • जेट्रोफा का तेल बिना रिफाइन किये हुए भी इंधन के रूप में प्रयोग किया जा सकता है।
  • जेट्रोफा का तेल जलाने पर धुआंरहित स्वच्छ लौ पैदा करता है।
  • थोडे ही दिनों (लगभग दो वर्ष) में इसके पौधे से फल प्राप्त होने लगते हैं
  • उपजाऊ भूमि और खराब (उसर भूमि) भूमि, दोनो पर इसकी उपज ली जा सकती है
  • कम वर्षा के क्षेत्रों (२०० मिमी) और अधिक वर्षा के क्षेत्रों, दोनों में यह जीवित रहता और फलता-फूलता है
  • वहां भी इसकी पैदावार ली जा सकती है जहां दूसरी फसलें नही ली जा सकतीं।
  • इसे नहरों के किनारे, सडकों के किनारे या रेलवे लाइन के किनारे भी लगा सकते हैं।
  • यह कठिन परिस्थितियों को भी सह लेता है।
  • इसकी खेती के लिये किसी प्रकार की विशेषज्ञता की आवश्यकता नहीं होती।
  • इसके पौधे की उंचाई भी फल और बीज इकट्ठा करने की दृष्टि से बहुत उपयुक्त है - जमीन पर खडे होकर ही फल तोडे जा सकते हैं।
  • फल वर्षा ऋतु आरम्भ होने के पाले ही पक जाते हैं, इसलिये भी फल इकट्ठा करना आसान काम है।
  • इसके पौधा लगभग ५० वर्ष तक फल पैदा करता है। बार-बार फसल लगाने की आवश्यकता नहीं होती।
  • इसको लगाना आसान है, यह तेजी से बढता है और इसको देखरेख की बहुत कम जरूरत होती है।
  • इसको जानवर नही खाते और कीट नही लगते। इस कारण इसकी विशेष देखभाल नहीं करनी पडती।
  • यह् किसी भी पसल का प्रतिस्पर्धी नहीं है, बल्कि यह उन फसलों की पैदावार बढाने में मदद करता है।

जेट्रोफा के उपयोग-
  • जेट्रोफा के करीब १६०० उपयोग गिनाये गये हैं।
  • इसके पौधे भू-क्षरण रोकने के लिये भी काम आते हैं
  • जेट्रोफा की जडें जमीन से फास्फोरस सोखने का कार्य करती हैं - इसका यह गुण अम्लीय भूमि के लिये वरदान है
  • अपने पूरे जीवन के दौरान जमीन पर पत्तियां गिराता है जो भूमि की उर्वरा-शक्ति को बढाती हैं
  • इसके बीजों से तेल निकालने के बाद जो खली बचती है वह उच्च कोटि की जैविक खाद है (नाइट्रोजन से भरपूर)। इसे जानवरों को भी खिलाया जा सकता है क्योकि यह प्रोटीन से भरपूर होती है।
  • ग्लीसरीन भी इसका एक सह-उत्पाद है।
  • जानवर और कीडे इससे प्राकृतिक रूप से ही दूर भागते हैं। इसलिये इसका उपयोग बागों और खेतों की रक्षा के लिये चारदीवारी के रूप में भी किया जाता है।
  • इसके बीजों को पीसने पर जो तेल प्राप्त होता है उससे -
  • वाहनों के लिये बायोडिजल बनाया जा सकता है
  • सीधे लालटेन में डालकर जलाया जा सकता है
  • इसे जलाकर भोजन पकाने के काम में लिया जा सकता है
  • इसके तेल के अन्य उपयोग हैं - जलवायु संरक्षण, वार्निश, साबुन, जैव कीट-नाशक आदि

औषधीय उपयोग-
  • इसके फूल और तने औषधीय गुणों के लिये जाने जाते हैं।
  • इसकी पत्तियां घाव पर लपेटने (ड्रेसिंग) के काम आती हैं।
  • इसके अलावा इससे चर्मरोगों की दवा, कैंसर, बाबासीर, ड्राप्सी, पक्षाघात, सर्पदंश, मच्छर भगाने की दवा तथा अन्य अनेक दवायें बनती हैं।

इसके पौधे के अन्य उपयोग-
  • इसके छाल से गहरे नीले रंग की 'डाई' और मोम बनायी जा सकती है।
  • इसकी जडों से पीले रंग की 'डाई' बनती है।
  • इसका तना एक निम्न-श्रेणी की लकडी का भी काम करता है। इसे जलावनी लकडी के रूप में प्रयोग किया जाता है।




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