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शहीद वीरांगना महारानी दुर्गावती ने दिया था अकबर को करारा जवाब

veeraangana


दुर्गावती नाम था उसका। साक्षात दुर्गा थी वह। बुंदेलखंड के प्रसिद्ध चंदेल राजपूतों में उसका जन्म हुआ था। वंश इतना उच्च माना जाता था कि चित्तौड़ के महाराणा संग्रामसिंह (राणा सांगा) की बहन भी इस वंश में ब्याही थी। दुर्गावती का विवाह हुआ था, गोंड राज परिवार  में। विवाह के कुछ ही वर्षों के पश्चात दुर्गावती को एक पुत्र हुआ था‍ जिसका नाम वीर नारायणसिंह रखा गया। 

वीर नारायण अभी बालक ही था कि दुर्गावती के पति की मृत्यु हो गई। उस अराजक मुस्लिम युग में एक जवान, सुंदर विधवा हिन्दू रानी को कौन चैन से रहने देता। दुर्गावती का राज्य तीन ओर से मु‍स्लिम राज्यों से घिरा था। पश्चिम में था निमाड़-मालवा का शुजात खां सूरी, दक्षिण में खानदेश का मुस्लिम राज्य और पूर्व में अफगान। तीनों ने असहाय जान दुर्गावती के राज्य पर हमले प्रारंभ कर दिए। दुर्गावती घबराईं नहीं। उस राजपूत बाला ने गोंडवाने के हिन्दू युवकों को एकत्र कर एक सेना तैयार की और स्वयं उसकी कमान संभाल तीनों मुस्लिम राज्यों का सामना किया।

दुर्गावती ने तीनों मुस्लिम राज्यों को बार-बार युद्ध में परास्त किया। पराजित मुस्लिम राज्य इतने भयभीत हुए कि उन्होंने गोंडवाने की ओर झांकना भी बंद कर दिया। इन तीनों राज्यों की विजय में दुर्गावती को अपार संपत्ति हाथ लगी।

आईने-अकबरी में अबुल फजल का कहना है कि दुर्गावती बड़ी वीर थी। उसे कभी पता चल जाता था कि अमुक स्थान पर शेर दिखाई दिया है, तो वह शस्त्र उठा तुरंत शेर का शिकार करने चल देती और जब तक उसे मार नहीं लेती, पानी भी नहीं पीती थीं। 

तीनों मुस्लिम राज्यों के खामोश हो जाने के बाद गोंडवाने में शां‍ति छा गई। दुर्गावती ने प्रजा के सुख के लिए कुएं, बावड़ियां, तालाब खुदवाए, धर्मशालाएं बनवाईं, मंदिर बनने लगे। दुर्गावती प्रजा के मन पर शासन करने लगी। लोग उसे देवी के रूप में पूजने लगे।

सुख-शांति का दुश्मन बना अकबर : गोंडवाना एक हरा-भरा प्रदेश था। अनावृष्टि नहीं होती थी तो अकाल भी नहीं पड़ता था। दुर्गावती के तेज और वीरता से गोंडवाने पर आक्रमण होने भी बंद हो गए थे इसलिए संपूर्ण प्रदेश में शांति थी। व्यापार फल-फूल रहा था। यह प्रथम अवसर था, जब हरियाणा और राजस्थान का व्यापारी समुदाय गोंडवाना में बसने लगा था। इस काल में गोंडवाना एक समृद्ध राज्य था। सारे भारत का धन खिंचकर गोंडवाना आ रहा था।

इन्हीं दिनों युवराज वीर नारायण 18 वर्ष का हो गया। दुर्गावती ने राज्य की बागडोर सौंपनी चाही किंतु उसने स्वीकार नहीं किया। अब दुर्गावती ने वीर नारायण के विवाह का निश्चय किया। पुरगढ़ा के राजा की 16 वर्षीय पुत्री अत्यंत सुंदर थी। दुर्गावती ने उससे वीर नारायण के विवाह का प्रस्ताव भेजा।

पुरगढ़ा के राजा ने स्वीकृति के साथ एक निवेदन भेजा कि विवाह की रस्म पुरगढ़ा में करना खतरे से खाली नहीं है। अकबर के प्रस्ताव समस्त उत्तर भारत के रजवाड़ों को गए हैं कि वे अपनी कन्याओं के डोले आगरा भेजें। यही प्रस्ताव पुरगढ़ा भी आया है। अत: विवाह की रस्म गोंडवाने की राजधानी गढ़ कटंग में पूरी की जाए तो विघ्न की आशंका नहीं रहेगी।

इसी योजनानुसार राजकन्या गढ़ कटंग पहुंचा दी गई, लेकिन अकबर के गुप्तचर फकीरों के वेश में सारे भारत में फैले हुए थे। उसे सूचना मिल गई कि पुरगढ़ा की राजकन्या गोंडवाना पहुंच गई है। सुंदर स्त्रियों और धन के लोभी अकबर ने बुंदेलखंड में डेरा डाले पड़े कड़ा के सूबेदार अपने सेनापति आसफ खां को गोंडवाने पर आक्रमण का हुक्म दिया।

आसफ खां जिरह-बख्तर से लैस अपने 50,000 मुगल घुड़सवारों के साथ गोंडवाने पर टूट पड़ा। रास्ते के नगर-ग्रामों को उजाड़ता आसफ खां मंडला के नजदीक जा पहुंचा। इधर विवाह की ‍तिथि न निकलने के कारण पुरगढ़ा की राजकन्या कुंवारी बैठी थी और अब युद्ध सामने था अत: विवाह की बात सोची भी नहीं जा सकती थी।
मुगलों के अत्याचार की कहानियां बढ़-चढ़कर गोंडवाने में फैल रही थीं। अत: दुर्गावती के कायर सैनिक सेना छोड़कर भागने लगे थे। इन अफवाहों के फैलाने में अकबर के फकीर गुप्तचरों का प्रमुख हाथ था।

गढ़ा-मंडला का भीषण युद्ध : सन् 1564 का वर्ष था। भारत के सारे हिन्दू राजे-रजवाड़ों ने इस्लाम के सम्मुख सिर झुका दिया था। बचे थे मात्र उत्तर भारत के चित्तौड़ और गोंडवाने के राज्य व दक्षिण भारत के विजय नगर का साम्राज्य। इस वर्ष अकबर द्वारा गोंडवाने की स्वतंत्रता भी नष्ट हो रही थी।

लूटमार-आगजनी करती बढ़ी चली आ रही मुगल फौजों का सामना किया दुर्गावती ने गढ़ा-मंडला के मैदान में। अपने 20 हजार घुड़सवारों और 1 हजार हाथियों के साथ दुर्गावती मुगल फौज के सामने आ डटी। दुर्गावती के घुड़सवारों के पास न जिरह-बख्तर थे न घोड़ों पर। इधर मुगल सैनिक सिर से कमर और हाथों तक लोहे के कवच से सुरक्षित थे। फिर 20 हजार हिन्दू घुड़सवारों के सामने 50 हजार की विशाल मुगल सेना थी।

आसफ खां ने अपने दाएं-बाएं के 10 हजार सवारों को घूमकर दुर्गावती की फौजों के पार्श्व से तीर बरसाने का हुक्म दिया। सामने से 10 हजार घुड़सवार हिन्दू फौजों को दबाने में लगे। तीन ओर के हमले से हिन्दू सैनिक परेशान हो उठे, तब दुर्गावती अपने 1 हजार हाथियों के साथ मुगलों की मध्य सेना पर टूट पड़ी। एक विशाल हाथी पर दुर्गावती सवार थी। चारों ओर थे उसके अंगरक्षक घुड़सवार। पास ही एक अन्य हाथी पर 18 वर्षीय वीरनारायण मां की सहायता कर रहा था। दोपहर बाद प्रारंभ हुए इस युद्ध में 2-3 घंटे की लड़ाई के बाद दोनों ओर के सैनिक थककर चूर हो गए। तब संध्या 4 बजे आसफ खां ने अपने ताजा दम 20 हजार घुड़सवारों को हमले का हु्क्म दिया। थके हिन्दू सैनिक इन तरोताजा घुड़सवारों का सामना नहीं कर पाए।

सैनिक मरते गए और कतारें टूट गईं। बढ़ते मुगल सैनिकों ने दुर्गावती और उनके पुत्र वीरनारायण को घेर लिया। दोनों हाथियों की रक्षी कर रहे हिन्दू अंगरक्षकों की पंक्तियां भी टूटने लगीं। अब मां-बेटे पूरी तरह घिर चुके थे किंतु क्रोध से उफनती शेरनी दुर्गा मुगलों के लिए काल बन गई। दुर्गावती के धनुष से चले तीर मुगलों के कवच चीर उन्हें मौत की नींद सुलाने लगे। उधर मुगलों के बाण की वर्षा से वीरनारायण घायल हो गए। लेकिन मां के वीर बेटे ने रणक्षेत्र नहीं छोड़ा। वह घायल होने के बाद भी मुगलों पर तीर बरसाता रहा। तभी दुर्गावती ने अपने महावत को वीरनारायण के हाथी के पास अपना हाथी ले चलने का आदेश दिया। रणक्षेत्र में अटे-पड़े मुगल घुड़सवारों के बीच से लड़ती-भिड़ती दुर्गावती अपने बेटे के पास पहुंची और वीरनारायण से पीछे हटकर चौरागढ़ चले जाने को कहा। वीर बालक हटने को तैयार नहीं था।

बड़ी समझाइश के बाद उसके अंगरक्षक उसे रणक्षेत्र से निकाल ले जाने में सफल हुए। इधर दुर्गावती चट्टान बनी मुगलों का मार्ग रोके रही। अंधेरा घिरने लगा था और दोनों ओर के सैनिक पीछे हटकर अपने शिविरों को लौटने लगे थे। मृतकों की देह रणक्षेत्र में ही पड़ी रही और घायलों को उठा-उठाकर शिविर में लाया जा रहा था। दुर्गावती ने रात्रि में ही बचे-खुचे सैनिकों को एकत्र किया।

कुछ तो मारे गए थे, लगभग 10 हजार घुड़सवार वीरनारायण के साथ चौरागढ़ चले गए थे। कुल 5 हजार घुड़सवार और 500 हाथी दूसरे दिन के युद्ध के लिए शेष बचे थे। पराजय निश्चित थी। यह देख दुर्गावती ने अपने पुत्र वीरनारायण के पास एक संदेश भेजा- 'बेटा अब तुम्हारा मुख देखना मेरे भाग्य में नहीं है। अपना इलाज करवाना व भावी युद्ध के लिए तैयार रहना, मैं हटूंगी नहीं, तेरे पिता के पास स्वर्ग जाना चाहती हूं। मेरे मरने के बाद गोंडवाने की रक्षा करना। भगवान यदि सफलता दे तो अच्‍छा है, लेकिन यदि पराजय हुई तो हिन्दू महिलाओं को मुसलमानों के हाथ मत पड़ने देना। उन्हें अग्नि देवता को सौंप देना। समय नहीं है अत: युद्ध के पूर्व जौहर की व्यवस्था कर लेना।

अपने पुत्र को समाचार ‍भेज दुर्गावती अपने मुट्ठीभर सैनिकों के साथ शिविर से निकलीं। सामने खड़ा था विशाल मुगल रिसाला। कल के युद्ध में अतिरिक्त सेना के कारण मुगलों की क्षति कम हुई। दुश्मन के निकट पहुंच दुर्गावती ने हाथी के होदे में खड़े हो अपने सैनिकों पर एक नजर फेरी और अपना धनुष उठा गरज पड़ी- 'हर-हर महादेव'। सैनिकों ने विजय घोष किया- 'हर-हर महादेव' और हिन्दू सैनिक मृत्यु का आलिंगन करने मुगल सेना पर टूट पड़े।

500 हाथियों पर बैठे 1 हजार सैनिक और साथ के 5 हजार घुड़सवारों को मुगल रिसाले ने चारों ओर से घेर लिया। एक-एक कर हिन्दू घुड़सवार गिरते चले गए, सेना सिकुड़ती गई। अब मरने की बारी थी गज सवारों की। मुगलों की निगाह हाथी पर सवार 33 वर्षीय सुंदर दुर्गावती पर लगी हुई थी। आसफ खां ने आदेश दिया कि आसपास के हाथी सवारों को समाप्त कर दुर्गावती को जीवित पकड़ लो। इसे शहंशाह को सौंप इनाम पाएंगे।

धीरे-धीरे सारे हाथी समाप्त हो गए। जिधर दृष्टि डालो उधर ही मुगल घुड़सवार छाए थे। मुगलों का घेरा कसने लगा, लेकिन दुर्गावती के तीरों का बरसना बंद नहीं हुआ। तभी तीरों की एक बौछार दुर्गावती के हाथी पर लगी। महावत मारा गया। एक तीर दुर्गावती के गले और एक हाथ को भेद गया। असह्य पीड़ा से धनुष हाथ से छूट गया। हाथी को घेरकर खड़े मुगल सैनिक हाथी पर चढ़ने का प्रयास करने लगे। कुछ गंदी फब्तियां भी कस रहे थे। प्रतिष्ठा और बेइज्जती में गजभर का फासला था। दुर्गावती ने परिस्‍थिति को भांपा और शीघ्रता से कमर में खुसी कटार खींची- 'जय भवानी...!' गरज समाप्त होते ही छप्प से कटार अपने हृदय में मार ली। पंछी उड़ चुका था। दुर्गावती की निष्प्राण देह हौदे में पड़ी थी।

अकबर महान या शांति का भक्षक? : एक शांत राज्य, जहां के लोग सुखपूर्वक अपना जीवन जी रहे थे। किसी पड़ोसी पर आक्रमण नहीं कर रहे थे। ऐसे शांत राज्य को केवल अपने धन की पिपासा और स्त्रियों के लोभ में अकबर ने अकारण नष्ट कर डाला। गोंडवाने में लाखों हिन्दू मारे गए।

इतिहास लेखक स्मिथ कहता है कि भविष्य में भारतीय राज्यों को हड़पने वाले डलहौजी को भी अकबर ने मात कर दिया। नागरिकों की सुख-शांति को अकारण हाहाकार में बदल देने वाला व्यक्ति नरपिशाच तो हो सकता है, महान कदापि नहीं हो सकता।

चौरागढ़ का जौहर : गढ़ा-मंडला के दूसरे दिन के युद्ध के समाचार युद्ध से लौटे सैनिकों द्वारा वीरनारायण को मिले। अब सैनिक कभी भी चौरागढ़ आ सकते हैं। अत: चौरागढ़ में जौहर की तैयारियां प्रारंभ हुईं। रुई, लाख, राल, घास, लकड़ी एकत्र कर किले में लाए जाने लगे। शीघ्रता में सूखे हरे जैसे भी निकट मिले, वृक्ष काटकर किले में लाए गए। किले की दीवार के निकट एक बड़े चौक में लकड़ियां बिछा दी गईं। उन पर घास, राल, लाख, रुई जगह-जगह लगा दी गई। अब किले के दरवाजे बंद कर वीरनारायण मुगलों की राह देखने लगा।

लेकिन आसफ खां दो माह तक चौरागढ़ नहीं आया। वह जानता था, गोंडवाना के बचे सैनिक किले में शरण लिए हुए हैं। गोंडवाना पूर्ण आरक्षित है। अत: वह दो माह तक चौरागढ़ के चारों ओर के नगर-ग्रामों को लूटत-उजाड़ता रहा। आसफ खां की इस कार्रवाई से किले में रसद पहुंचना बंद हो गई और बीते इन दो माह में किले की रसद धीरे-धीरे समाप्त हो गई। ठीक दो माह बाद आसफ खां ने चौरागढ़ घेर लिया।

गढ़ के भीतर थे 10 हजार घुड़सवार और आसपास के ग्रामों से आई संभ्रांत घरों की कुलवधुएं, बेटियां राजपरिवार की महिलाएं, सरदारों के परिवारों की महिलाएं, कुल 5 हजार स्त्रियां किले में थीं। वीरनारायण ने प्रमुख सरदारों की बैठक बुलाई और दूसरे दिन जौहर करने का निश्चय किया।

प्रात:काल ब्रह्ममुहूर्त में गढ़ के सभी हिन्दू उठे, स्नान किया। महिलाओं ने पूर्ण श्रृंगार किया और एकसाथ मंदिर में जा सामूहिक आरती की। फिर सभी महिलाएं पुरुष अंतिम विदा के लिए एक-दूसरे से गले मिले। पति-पत्नी, भाई-बहन, बाप-बेटी भरे कंठ और सजल आंखों से विदा दे रहे थे। मंदिर से चला हिन्दू नर-नारियों का समूह चिता के निकट आयाल एक-एक कर महिलाएं चिता पर चढ़ने लगीं। पुरुष वर्ग भी घी के डिब्बे चिता पर डालने लगा।

वीरनारायण ने अपने दो विश्वस्त सैवकों को भोज कायस्थ और भिकारी रूमी को बुला जौहर की जिम्मेदारी सौंपी। दो सेवकों और जौहर की पूजा के लिए एक ब्राह्मण को छोड़ वीरनारायण केसरिया वस्त्र पहन सैनिकों के साथ द्वार पर आ डटा। कुछ सैनिक दुर्ग दीवार पर तैनात कर दिए गए।

दुर्ग की दीवार पर खड़े ब्राह्मण ने वेद मंत्रों का पाठ प्रारंभ किया। ब्राह्मण रोता जाता था और वेद मंत्र पढ़ता जाता था। स्वाहा की ध्वनि के साथ चिता के चारों ओर खड़े लोग चिता पर अक्षत-कंकू, पुष्प बरसा रहे थे। चिंता पर बैठी महिलाएं भीड़ में अपने पति, पिता, भाई को पहचान हाथ जोड़ अंतिम विदा दर्शन ले रही थीं। गोद में बैठे नन्हे बालकों को उनकी माताएं उंगली उठा पिता को दिखा रही थीं। महिलाएं सुबक रही थीं, कोई हंस रही थीं। लेकिन नेत्र सभी के भीगे थे। पुरुष वर्ग दांत भींचे, दृढ़ संकल्प लेता यह दृश्य देख रहा था।

वेद पाठ पूरा हुआ। दुर्ग-दीवार पर खड़े ब्राह्मण ने कहा- मेरी बेटियों, हम हिन्दू आज तुम्हारी रक्षा करने में असमर्थ हैं। तुम्हारी मान-मर्यादा की रक्षा के लिए तुम्हें अग्नि देवता को सौंप रहे हैं। मैंने इन्हीं अग्नि देवता की सप्तवदी करवा कभी आप में से कइयों को विवाह-सूत्र में बांधा था। मुझे क्षमा करना, आज विवाह सूत्र में बांधने वाला ब्राह्मण तुम्हें अग्नि में होम कर रहा है।

ब्राह्मण के संकेत पर भोज कायस्थ ने चिता में आग लगा दी। चिता धूं-धूंकर जल उठी। चिता की लपटें उठती रहीं और हिन्दू सैनिकों का प्राणों से मोह छूटता गया। दोपहर बीतने तक चिता शांत होने लगी। अब वीर नारायण ने दुर्ग द्वार खोलने की आज्ञा दी।

जिनकी मां-बहनें-बेटियां और प्रियतमाएं उनकी आंखों के सामने जल मरी थीं, वे हिन्दू सैनिक भूखे बाघ की तरह गरजते हुए मुगलों पर टूट पड़े। मुगल सैनिकों में खलबली बच गई। हिन्दू तो मरने के लिए सिर पर कफन बांधकर ही निकले थे, साक्षात महाकाल बने तलवार चला रहे थे, किंतु मुट्ठीभर हिन्दू कब तक लड़ते? रात होते-होते सभी समाप्त हो गए लेकिन एक धाक छोड़ गए मुगलों के दिलों पर, न तो रात में न दूसरे दिन मुगलों का साहस हुआ कि किले के निकट जा पाएं।

दो दिन तक आसफ खां मरे मुगल सैनिकों के लिए कब्रें खुदवाता और उन्हें दफनाता रहा। चौथे दिन मुगल सैनिक किले के निकट आए। द्वार पर आवाज लगाई। किले में बचे थे मात्र तीन व्यक्ति, ब्राह्मण, भोज कायस्थ और भिकारी रूमी। भिकारी ने द्वार खोला। मुगल सैनिक लूट के उद्देश्य से किले में फैल गए।

कलाकृतियों का शत्रु अकबर : मुगलों को लूट में मिले अलाद्दीन खिलजी के समय के सोने की अशर्फियों से भरे सौ घड़े, ढला-अनढ़ला सोना, अलंकृत पात्र, जवाहरात, मोती, सोने-चांदी की देवताओं और पशु-पक्ष‍ियों की मू‍र्तियां, रत्नजड़ित मूर्तियां, दुर्लभ चित्र। इनके साथ मुगलों को मिली दो अभागी राजकन्याएं एक 18 वर्षीय कमलावती, जो दुर्गावती की बहन थी और दूसरी पुरगढ़ा की 16 वर्षीय राजकुमारी। ये दोनों चिता के किनारे रखे एक बड़े गीले वृक्ष की बड़ी डाल की ओट में जीवित बच गई थी। धुएं के कारण भोज कायस्थ इन्हें देख नहीं पाया था।

इन अभागी राजकन्याओं के साथ लूट में मिला सारा सामान और 200 हाथी आसफ खां ने अकबर के पास आगरा भिजवा दिए। धन के लोभी अकबर ने इस दुर्लभ सामग्री को गलवा दिया। दोनों राजकन्याओं से जबरन अकबर के द्वार की देहरी चूमने को कहा गया और ये दोनों अभागी अकबर की रखैल बना ली गईं। (स्मिथ पृष्ठ 69)

स्वतंत्र भारत के नागरिक विचार करें, क्या दुर्लभ भारतीय कला-संपदा को नष्ट करने वाला भारत में महान कहला सकता है? क्या निरीह, असहाय अबलाओं को बुरी तरह अपमानित करने वाला उन्हें रखैल के निम्न स्तर पर भोगने वाला महान कहलाने के योग्य है?


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बाबा हरभजन सिंह मंदिर,सिक्किम,इस मृत सैनिक की आत्मा आज भी करती है देश की रक्षा

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क्या कोई सैनिक मृत्यु पश्चात भी अपनी ड्यूटी कर सकता है ? क्या किसी मृत सैनिक की आत्मा, अपना कर्तव्य निभाते हुए देश की सीमा की रक्षा कर सकती है ? आप सब को यह सवाल अजीब से लग सकते है, आप सब कह सकते है की भला ऐसा कैसे मुमकिन है ? पर सिक्किम के लोगो और वहां पर तैनात सैनिको से अगर आप पूछेंगे तो वो कहेंगे की ऐसा पिछले 45 सालो से लगातार हो रहा है। उन सबका मानना है की पंजाब रेजिमेंट के जवान हरभजन सिंह की आत्मा पिछले 45 सालो से लगातार देश की सीम की रक्षा कर रही है।

सैनिको का कहना है की हरभजन सिंह की आत्मा, चीन की तरफ से होने वाले खतरे के बारे में पहले से ही उन्हें बता देती है। और यदि भारतीय सैनिको को चीन के सैनिको का कोई भी मूवमेंट पसंद नहीं आता है तो उसके बारे में वो चीन के सैनिको को भी पहले ही बता देते है ताकि बात ज्यादा नहीं बिगड़े और मिल जुल कर बातचीत से उसका हल निकाल लिया जाए। आप चाहे इस पर यकीं करे या ना करे पर खुद चीनी सैनिक भी इस पर विश्वास करते है इसलिए भारत और चीन के बीच होने वाली हर फ्लैग मीटिंग में हरभजन सिंह के नाम की एक खाली कुर्सी लगाईं जाती है ताकि वो मीटिंग अटेंड कर सके।

कौन है हरभजन सिंह :
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हरभजन सिंह का जन्म 30 अगस्त 1946 को, जिला गुजरावाला जो कि वर्तमान में पाकिस्तान में है, हुआ था ।हरभजन सिंह 24 वि पंजाब रेजिमेंट के जवान थे जो की 1966 में आर्मी में भारत हुए थे। पर मात्र 2 साल की नौकरी करके 1968 में, सिक्किम में, एक दुर्घटना में मारे गए। हुआ यूं की एक दिन जब वो खच्चर पर बैठ कर नदी पार कर रहे थे तो खच्चर सहित नदी में बह गए। नदी में बह कर उनका शव काफी आगे निकल गया।  दो दिन की तलाशी के बाद भी जब उनका शव नहीं मिला तो उन्होंने खुद अपने एक साथी सैनिक के सपने में आकर अपनी शव की जगह बताई।
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सवेरे सैनिकों ने बताई गई जगह से हरभजन का शव बरामद  अंतिम संस्कार किया। हरभजन सिंह के इस चमत्कार के बाद साथी सैनिको की उनमे आस्था बढ़ गई और उन्होंने उनके बंकर को एक मंदिर का रूप दे दिया। हालांकि जब बाद में उनके चमत्कार बढ़ने लगे और वो विशाल जन समूह की आस्था का केंद्र हो गए तो उनके लिए एक नए मंदिर का निर्माण किया गया जो की ‘बाबा हरभजन सिंह मंदिर’ के नाम से जाना जाता है।  यह मंदिर गंगटोक में जेलेप्ला दर्रे और नाथुला दर्रे के बीच, 13000 फ़ीट की ऊंचाई पर स्तिथ है। पुराना बंकर वाला मंदिर इससे 1000 फ़ीट ज्यादा ऊंचाई पर स्तिथ है। मंदिर के अंदर बाबा हरभजन सिंह की एक फोटो और उनका सामान रखा है।

आज भी देते है ड्यूटी  :
बाबा हरभजन सिंह अपनी मृत्यु के बाद से लगातार ही अपनी ड्यूटी देते आ रहे है।  इनके लिए उन्हें बाकायदा तनख्वाह भी दी जाती है, उनकी सेना में एक रेंक है, नियमानुसार उनका प्रमोशन भी किया जाता है।  यहां तक की उन्हें कुछ साल पहले तक 2  महीने की छुट्टी पर गाँव भी भेजा जाता था।  इसके लिए ट्रैन में सीट रिज़र्व की जाती थी, तीन सैनिको के साथ उनका सारा सामान उनके गाँव भेजा जाता था तथा दो महीने पुरे होने पर फिर वापस सिक्किम लाया जाता था। जिन दो महीने बाबा छुट्टी पर रहते थे उस दरमियान पूरा बॉर्डर हाई अलर्ट पर रहता था क्योकि उस वक़्त सैनिको को बाबा की मदद नहीं मिल पाती थी।

लेकिन बाबा का सिक्किम से जाना और वापस आना एक धार्मिक आयोजन का रूप लेता जा रहा था जिसमे की बड़ी संख्या में जनता इकठ्ठी होने लगी थी। कुछ लोगो इस आयोजान को अंधविश्वास को बढ़ावा देने वाला मानते थे इसलिए उन्होंने अदालत का दरवाज़ा खटखटाया क्योंकि सेना में किसी भी प्रकार के अंधविश्वास की मनाही होती है। लिहाज़ा सेना ने बाबा को छुट्टी पर भेजना बंद कर दिया। अब बाबा साल के बारह महीने ड्यूटी पर रहते है। मंदिर में बाबा का एक कमरा भी है जिसमे प्रतिदिन सफाई करके बिस्तर लगाए जाते है। बाबा की सेना की वर्दी और जुते  रखे जाते है। कहते है की रोज़ पुनः सफाई करने पर उनके जूतों में कीचड़ और चद्दर पर सलवटे पाई जाती है।

लोगो की आस्था का केंद्र है मंदिर :
बाबा हरभजन सिंह का मंदिर सैनिको और लोगो दोनों की ही आस्थाओ का केंद्र है। इस इलाके में आने वाला हर नया सैनिक सबसे पहले बाबा के धोक लगाने आता है।  इस मंदिर को लेकर यहाँ के लोगो में एक अजीब सी मान्यता यह है की यदि इस मंदिर में बोतल में भरकर पानी को तीन दिन के लिए रख दिया जाए तो उस पानी में चमत्कारिक औषधीय गुण आ जाते है।  इस पानी को पीने से लोगो के रोग मिट जाते है। इसलिए इस मंदिर में नाम लिखी हुई बोतलों का अम्बार लगा रहता है। यह पानी 21 दिन के अंदर प्रयोग में लाया जाता है और इस दौरान मांसाहार और शराब कआ सेवन निषेध होता है।

बाबा का बंकर, जो की नए मंदिर से 1000 फ़ीट की ऊंचाई पर है, लाल और पीले रंगो से सज़ा है। सीढ़िया लाल रंग की और पिलर पीले रंग के। सीढ़ियों के दोनों साइड रेलिंग पर नीचे से ऊपर तक घंटिया बंधी है। बाबा के बंकर में कॉपिया राखी है।  इन कॉपियों में लोग अपनी मुरादे लिखते है ऐसा माना जाता है की इनमे लिखी गई हर मुराद पूरी होती है।  इसी तरह में बंकर में एक ऐसी जगह है जहाँ लोग सिक्के गिराते है यदि वो सिक्का उन्हें वापस मिला जाता है तो वो भाग्यशाली माने जाते है। फिर उसे हमेशा के लिए अपने पर्स या तिजोरी में रखने की सलाह दी जाती है। दोनों जगहों का सम्पूर्ण संचालन आर्मी के द्वारा ही किया जाता है।

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07 जनवरी 1857 अमर बलिदानी सयाजीराव, जिन्हे तोप के सामने खड़ाकर गोला दाग दिया गया था,जिन्होने क्रूर कैरी, मिल्स, कॉनेल व मानसन को मार डाला था

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नोट -भारत की आजादी में शहीद हुए वीरांगना/जवानो के बारे में यदि आपके पास कोई जानकारी हो तो कृपया उपलब्ध कराने का कष्ट करे . जिसे प्रकाशित किया जा सके इस देश की युवा पीढ़ी कम से कम आजादी कैसे मिली ,कौन -कौन नायक थे यह जान सके । वैसे तो यह बहुत दुखद है कि भारत की आजादी में कुल कितने क्रान्तिकारी शहीद हुए इसकी जानकार भारत सरकार के पास उपलब्ध नही है। और न ही भारत सरकार देश की आजादी के दीवानो की सूची संकलन करने में रूचि दिखा रही जो बहुत ही दुर्भाग्य पूर्ण है। 

1857 का स्वाधीनता संग्राम भले ही सफल न हुआ हो; पर उसने सिद्ध कर दिया कि देश का कोई भाग ऐसा नहीं है, जहां स्वतन्त्रता की अभिलाषा न हो तथा लोग स्वाधीनता के लिए मर मिटने का तैयार न हों।

मध्य प्रदेश में इंदौर और उसके आसपास का क्षेत्र मालवा कहलाता है। 1857 में यह पूरा क्षेत्र अंग्रेजों के विरुद्ध दहक रहा था। यहां का महिदपुर सामरिक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण क्षेत्र था। इसलिए अंग्रेजों ने यहां छावनी की स्थापना की थी, जिसे ‘यूनाइटेड मालवा कांटिनजेंट, महिदपुर हेडक्वार्टर’ कहा जाता था।

इंदौर में नागरिकों ने जुलाई 1857 में जैसा उत्साह दिखाया था, उसका प्रभाव महिदपुर छावनी के सैनिकों पर भी साफ दिखाई देता था। वे एकांत में इस बारे में उग्र बातें करते रहते थे। यह देखकर अंग्रेजों ने बड़े अधिकारियों तथा  अपने खास चमचों को सावधान कर दिया था।

छावनी में भारतीय सैनिकों के कमांडर शेख रहमत उल्ला तथा उज्जैन स्थित सिंधिया के सरसूबा आपतिया की सहानुभूति क्रांतिकारियों के साथ थी। महिदपुर के अमीन सदाशिवराव की भूमिका भी इस बारे में उल्लेखनीय है। उन्होंने क्रांति के लिए बड़ी संख्या में सैनिकों की भर्ती की तथा उन्हें हर प्रकार का सहयोग दिया। अंग्रेज चौकन्ने तो थे; पर उन्हें यह अनुमान नहीं था कि अंदर ही अंदर इतना भीषण लावा खौल रहा है।

8 नवम्बर, 1857 को निर्धारित योजनानुसार प्रातः 7.30 बजे दो हजार क्रांतिकारियों ने ऐरा सिंह के नेतृत्व में मारो-काटो का उद्घोष करते हुए महिदपुर छावनी पर हमला बोल दिया। इन सशस्त्र क्रांतिवीरों में उज्जैन व खाचरोद की ओर से आये मेवाती सैनिकों के साथ ही महिदपुर के नागरिक भी शामिल थे। यह देखकर छावनी में तैनात देशप्रेमी सैनिक भी इनके साथ मिल गये।

अंग्रेज अधिकारी सावधान तो थे ही, अतः भीषण युद्ध छिड़ गया; पर भारतीय सैनिकों का उत्साह अंग्रेजों पर भारी पड़ रहा था। कई घंटे के संग्राम में डा0 कैरी, लेफ्टिनेंट मिल्स, सार्जेण्ट मेजर ओ कॉनेल तथा मानसन मार डाले गये। मेजर टिमनिस की पत्नी को उसके दर्जी ने अपनी झोंपड़ी में छिपा लिया, इससे उसकी जान बच गयी। इस युद्ध में भारतीय वीरों का पलड़ा भारी रहा। जो अंग्रेज अधिकारी बच गये, उन्हें इंदौर के महाराजा तुकोजीराव होल्कर ने शरण देकर उनके भोजन तथा कपड़ों का प्रबन्ध किया।

परन्तु संगठन एवं कुशल नेतृत्व के अभाव, अधूरी योजना तथा समय  से पूर्व ही विस्फोट हो जाने के कारण 1857 का यह स्वाधीनता संग्राम सफल नहीं हो सका। धीरे-धीरे अंग्रेजों ने फिर से सभी छावनियों पर कब्जा कर लिया। जिन सैनिकों ने अत्यधिक उत्साह दिखाया था, उन्हें नौकरी से हटा दिया। कुछ को जेलों में ठूंस दिया तथा बहुतों को फांसी पर लटकाकर पूरे देश में एक बार फिर से आतंक एवं भय का वातावरण बना दिया।

महिदपुर के इस संघर्ष में यद्यपि जीत भारतीय पक्ष की हुई और अंग्रेजों को मैदान छोड़कर भागना पड़ा; पर अंग्रेजो की तरह ही बड़ी संख्या में भारतीय सैनिक भी वीरगति को प्राप्त हुए। आगे चलकर इस युद्ध के लिए वातावरण बनाने में मुख्य भूमिका निभाने वाले अमीन सयाजीराव भी गिरफ्तार कर लिये गये। अंग्रेजों ने उन्हें देशभक्ति का श्रेष्ठतम पुरस्कार देते हुए सात जनवरी, 1858 को तोप के सामने खड़ाकर गोला दाग दिया।

वीर अमीन सयाजीराव की देह एवं रक्त का कण-कण उस पावन मातृभूमि पर छितरा गया, जिसकी पूजा करने का उन्होंने व्रत लिया था। 

विशेष यह भी जाने 
अभी थोड़े समय  पहले अहिंसा और बिना खड्ग बिना ढाल वाले नारों और गानों का बोलबाला था ! हर कोई केवल शांति के कबूतर और अहिंसा के चरखे आदि में व्यस्त था लेकिन उस समय कभी इतिहास में तैयारी हो रही थी एक बड़े आन्दोलन की ! इसमें तीर भी थी, तलवार भी थी , खड्ग और ढाल से ही लड़ा गया था ये युद्ध ! जी हाँ, नकली कलमकारों के अक्षम्य अपराध से विस्मृत कर दिए गये वीर बलिदानी  जानिये जिनका आज बलिदान दिवस ! आज़ादी का महाबिगुल फूंक चुके इन वीरो को नही दिया गया था इतिहास की पुस्तकों में स्थान !  किसी भी व्यक्ति के लिए अपने मुल्क पर मर मिटने की राह चुनने के लिए सबसे पहली और महत्वपूर्ण चीज है- जज्बा या स्पिरिट। किसी व्यक्ति के क्रान्तिकारी बनने में बहुत सारी चीजें मायने रखती हैं, उसकी पृष्ठभूमि, अध्ययन, जीवन की समझ, तथा सामाजिक जीवन के आयाम व पहलू। लेकिन उपरोक्त सारी परिस्थितियों के अनुकूल होने पर भी अगर जज्बा  या स्पिरिट न हो तो कोई भी व्यक्ति क्रान्ति के मार्ग पर अग्रसर नहीं हो सकता। देश के लिए मर मिटने का जज्बा ही वो ताकत है जो विभिन्न पृष्ठभूमि के क्रान्तिकारियों को एक दूसरे के प्रति, साथ ही जनता के प्रति अगाध विश्वास और प्रेम से भरता है। आज की युवा पीढ़ी को भी अपने पूर्वजों और उनके क्रान्तिकारी जज्बे के विषय में कुछ जानकारी तो होनी ही चाहिए। आज युवाओं के बड़े हिस्से तक तो शिक्षा की पहुँच ही नहीं है। और जिन तक पहुँच है भी तो उनका काफी बड़ा हिस्सा कैरियर बनाने की चूहा दौड़ में ही लगा है। एक विद्वान ने कहा था कि चूहा-दौड़ की सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि व्यक्ति इस दौड़ में जीतकर भी चूहा ही बना रहता है।  अर्थात इंसान की तरह जीने की लगन और हिम्मत उसमें पैदा ही नहीं होती। और जीवन को जीने की बजाय अपना सारा जीवन, जीवन जीने की तैयारियों में लगा देता है। जाहिरा तौर पर इसका एक कारण हमारा औपनिवेशिक अतीत भी है जिसमें दो सौ सालों की गुलामी ने स्वतंत्र चिन्तन और तर्कणा की जगह हमारे मस्तिष्क को दिमागी गुलामी की बेड़ियों से जकड़ दिया है। आज भी हमारे युवा क्रान्तिकारियों के जन्मदिवस या शहादत दिवस पर ‘सोशल नेट्वर्किंग साइट्स’ पर फोटो तो शेयर कर देते हैं, लेकिन इस युवा आबादी में ज्यादातर को भारत की क्रान्तिकारी विरासत का या तो ज्ञान ही नहीं है या फिर अधकचरा ज्ञान है। ऐसे में सामाजिक बदलाव में लगे पत्र-पत्रिकाओं की जिम्मेदारी बनती है कि आज की युवा आबादी को गौरवशाली क्रान्तिकारी विरासत से परिचित करायें ताकि आने वाले समय के जनसंघर्षों में जनता अपने सच्चे जन-नायकों से प्ररेणा ले सके। आज हम एक ऐसी ही क्रान्तिकारी साथी का जीवन परिचय दे रहे हैं जिन्होंने जनता के लिए चल रहे संघर्ष में बेहद कम उम्र में बेमिसाल कुर्बानी दी।    

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29 दिसम्बर 14 अमर सपूत बलिदानी, जिन्होने धौलाना में अग्रेजी हुकूमत हिला कर रख दी थी

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नोट -भारत की आजादी में शहीद हुए वीरांगना/जवानो के बारे में यदि आपके पास कोई जानकारी हो तो कृपया उपलब्ध कराने का कष्ट करे . जिसे प्रकाशित किया जा सके इस देश की युवा पीढ़ी कम से कम आजादी कैसे मिली ,कौन -कौन नायक थे यह जान सके । वैसे तो यह बहुत दुखद है कि भारत की आजादी में कुल कितने क्रान्तिकारी शहीद हुए इसकी जानकार भारत सरकार के पास उपलब्ध नही है। और न ही भारत सरकार देश की आजादी के दीवानो की सूची संकलन करने में रूचि दिखा रही जो बहुत ही दुर्भाग्य पूर्ण है। 

आजादी की जंग में धौलाना के क्रांतिकारियों का बलिदान कभी नहीं भुलाया जा सकता। जब पूरे भारत में फिरंगियों के खिलाफ आवाज बुलंद हो रही थी तब धौलाना के क्रांतिकारियों ने धौलाना थाना फूंककर अंग्रेजी हुकूमत को हिला दिया था। भारत के स्वाधीनता संग्राम में मेरठ की 10 मई, 1857 की घटना का बड़ा महत्व है। इस दिन गाय और सूअर की चर्बी लगे कारतूसों को मुंह से खोलने से मना करने वाले भारतीय सैनिकों को हथकड़ी-बेड़ियों में कसकर जेल में बंद कर दिया गया। जहां-जहां यह समाचार पहुंचा, वहां की देशभक्त जनता तथा भारतीय सैनिकों में आक्रोश फैल गया। मेरठ पुलिस कोतवाली में उन दिनों धनसिंह गुर्जर कोतवाल थे। वे परम देशभक्त तथा गौभक्त थे। अपने संपर्क के गांवों में उन्होंने यह समाचार भेज दिया। उनकी योजनानुसार हजारों लोगों ने मेरठ आकर जेल पर धावा बोलकर उन सैनिकों को छुड़ा लिया। इसके बाद सबने दूसरी जेल पर हमला कर वहां के भी सब 804 बंदी छुड़ा लिये। इससे देशभक्तों का उत्साह बढ़ गया।

इसके बाद सबने अधिकारियों के घरों पर धावा बोलकर लगभग 25 अंग्रेजों को मार डाला। इनमें लेफ्टिनेंट रिचर्ड बेलेसली चेम्बर्स की पत्नी शारलैंट चेम्बर्स भी थी। रात तक पूरे मेरठ पर देशभक्तों का कब्जा हो गया। अगले दिन यह समाचार मेरठ के दूरस्थ गांवों तक पहुंच गया। हर स्थान पर देशभक्तों ने सड़कों पर आकर अंग्रेजों का विरोध किया, पर ग्राम धौलाना (जिला हापुड़, उत्तर प्रदेश) में यह चिंगारी ज्वाला बन गयी. क्षेत्र में मेवाड़ से आकर बसे राजपूतों का बाहुल्य है। महाराणा प्रताप के वंशज होने के नाते वे सब विदेशी व विधर्मी अंग्रेजों के विरुद्ध थे। मेरठ का समाचार सुनते ही उनके धैर्य का बांध टूट गया। उन्होंने धौलाना के थाने में आग लगा दी। थानेदार मुबारक अली वहां से भाग गया। उसने रात जंगल में छिपकर बिताई तथा अगले दिन मेरठ जाकर अधिकारियों को सारा समाचार दिया। मेरठ तब तक पुनः अंग्रेजों के कब्जे में आ चुका था। जिलाधिकारी ने सेना की एक बड़ी टुकड़ी यह कहकर धौलाना भेजी कि अधिकतम लोगों को फांसी देकर आतंक फैला दिया जाए, जिससे भविष्य में कोई राजद्रोह का साहस न करे। वह इन क्रांतिवीरों को मजा चखाना चाहता था। थाने में आग लगाने वालों में अग्रणी रहे लोगों की सूची बनाई गई। यह सूची थी - सुमेरसिंह, किड्ढा सिंह, साहब सिंह, वजीर सिंह, दौलत सिंह, दुर्गासिंह, महाराज सिंह, दलेल सिंह, जीरा सिंह, चंदन सिंह, मक्खन सिंह, जिया सिंह, मसाइब सिंह तथा लाला झनकूमल सिंहल।

अंग्रेज अधिकारी ने देखा कि इनमें एक व्यक्ति वैश्य समाज का भी है। उसने झनकूमल को कहा कि अंग्रेज तो व्यापारियों का बहुत सम्मान करते हैं, तुम इस चक्कर में कैसे आ गये ? इस पर झनकूमल ने गर्वपूर्वक कहा कि यह देश मेरा है और मैं इसे विदेशी व विधर्मियों से मुक्त देखना चाहता हूं। अंग्रेज अधिकारी ने बौखलाकर सभी क्रांतिवीरों को 29 दिसम्बर, 1857 को पीपल के पेड़ पर फांसी लगवा दी। इसके बाद गांव के 14 कुत्तों को मारकर हर शव के साथ एक कुत्ते को दफना दिया। यह इस बात का संकेत था कि भविष्य में राजद्रोह करने वाले की यही गति होगी।


इतिहास इस बात का साक्षी है कि ऐसी धमकियों से बलिदान की यह अग्नि बुझने की बजाय और भड़क उठी और अंततः अंग्रेजों को अपना बोरिया बिस्तर समेटना पड़ा। वर्ष 1857 की क्रांति के शताब्दी वर्ष में 11 मई, 1957 को धौलाना में शहीद स्मारक का उद्घाटन भगतसिंह के सहयोगी पत्रकार रणवीर सिंह द्वारा किया गया। प्रतिवर्ष 29 दिसम्बर को हजारों लोग वहां एकत्र होकर उन क्रांतिवीरों को श्रद्धांजलि देते हैं।

विशेष यह भी जाने 
अभी थोड़े समय  पहले अहिंसा और बिना खड्ग बिना ढाल वाले नारों और गानों का बोलबाला था ! हर कोई केवल शांति के कबूतर और अहिंसा के चरखे आदि में व्यस्त था लेकिन उस समय कभी इतिहास में तैयारी हो रही थी एक बड़े आन्दोलन की ! इसमें तीर भी थी, तलवार भी थी , खड्ग और ढाल से ही लड़ा गया था ये युद्ध ! जी हाँ, नकली कलमकारों के अक्षम्य अपराध से विस्मृत कर दिए गये वीर बलिदानी  जानिये जिनका आज बलिदान दिवस ! आज़ादी का महाबिगुल फूंक चुके इन वीरो को नही दिया गया था इतिहास की पुस्तकों में स्थान !  किसी भी व्यक्ति के लिए अपने मुल्क पर मर मिटने की राह चुनने के लिए सबसे पहली और महत्वपूर्ण चीज है- जज्बा या स्पिरिट। किसी व्यक्ति के क्रान्तिकारी बनने में बहुत सारी चीजें मायने रखती हैं, उसकी पृष्ठभूमि, अध्ययन, जीवन की समझ, तथा सामाजिक जीवन के आयाम व पहलू। लेकिन उपरोक्त सारी परिस्थितियों के अनुकूल होने पर भी अगर जज्बा  या स्पिरिट न हो तो कोई भी व्यक्ति क्रान्ति के मार्ग पर अग्रसर नहीं हो सकता। देश के लिए मर मिटने का जज्बा ही वो ताकत है जो विभिन्न पृष्ठभूमि के क्रान्तिकारियों को एक दूसरे के प्रति, साथ ही जनता के प्रति अगाध विश्वास और प्रेम से भरता है। आज की युवा पीढ़ी को भी अपने पूर्वजों और उनके क्रान्तिकारी जज्बे के विषय में कुछ जानकारी तो होनी ही चाहिए। आज युवाओं के बड़े हिस्से तक तो शिक्षा की पहुँच ही नहीं है। और जिन तक पहुँच है भी तो उनका काफी बड़ा हिस्सा कैरियर बनाने की चूहा दौड़ में ही लगा है। एक विद्वान ने कहा था कि चूहा-दौड़ की सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि व्यक्ति इस दौड़ में जीतकर भी चूहा ही बना रहता है।  अर्थात इंसान की तरह जीने की लगन और हिम्मत उसमें पैदा ही नहीं होती। और जीवन को जीने की बजाय अपना सारा जीवन, जीवन जीने की तैयारियों में लगा देता है। जाहिरा तौर पर इसका एक कारण हमारा औपनिवेशिक अतीत भी है जिसमें दो सौ सालों की गुलामी ने स्वतंत्र चिन्तन और तर्कणा की जगह हमारे मस्तिष्क को दिमागी गुलामी की बेड़ियों से जकड़ दिया है। आज भी हमारे युवा क्रान्तिकारियों के जन्मदिवस या शहादत दिवस पर ‘सोशल नेट्वर्किंग साइट्स’ पर फोटो तो शेयर कर देते हैं, लेकिन इस युवा आबादी में ज्यादातर को भारत की क्रान्तिकारी विरासत का या तो ज्ञान ही नहीं है या फिर अधकचरा ज्ञान है। ऐसे में सामाजिक बदलाव में लगे पत्र-पत्रिकाओं की जिम्मेदारी बनती है कि आज की युवा आबादी को गौरवशाली क्रान्तिकारी विरासत से परिचित करायें ताकि आने वाले समय के जनसंघर्षों में जनता अपने सच्चे जन-नायकों से प्ररेणा ले सके। आज हम एक ऐसी ही क्रान्तिकारी साथी का जीवन परिचय दे रहे हैं जिन्होंने जनता के लिए चल रहे संघर्ष में बेहद कम उम्र में बेमिसाल कुर्बानी दी।    

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28 दिसम्बर बलिदान दिवस राव रामबख्श सिंह जी जिन्हे फांसी देने वाला रस्सी दो बार टूटी, जिन्होने अन्तिम सांस तक सघर्ष किया

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नोट -भारत की आजादी में शहीद हुए वीरांगना/जवानो के बारे में यदि आपके पास कोई जानकारी हो तो कृपया उपलब्ध कराने का कष्ट करे . जिसे प्रकाशित किया जा सके इस देश की युवा पीढ़ी कम से कम आजादी कैसे मिली ,कौन -कौन नायक थे यह जान सके । वैसे तो यह बहुत दुखद है कि भारत की आजादी में कुल कितने क्रान्तिकारी शहीद हुए इसकी जानकार भारत सरकार के पास उपलब्ध नही है। और न ही भारत सरकार देश की आजादी के दीवानो की सूची संकलन करने में रूचि दिखा रही जो बहुत ही दुर्भाग्य पूर्ण है। 

 श्रीराम की जन्मभूमि अयोध्या और लक्ष्मणपुरी (लखनऊ) का निकटवर्ती क्षेत्र सदा से अवध कहलाता है। इसी अवध में उन्नाव जनपद का कुछ क्षेत्र बैसवारा कहा जाता है। इसी बैसवारा की वीरभूमि में राव रामबख्श सिंह जी का जन्म हुआ, जिन्होंने मातृभूमि को अंग्रेजों के चंगुल से मुक्त कराने के लिए अन्तिम दम तक संघर्ष किया और फिर हंसते हुए फांसी का फन्दा चूम लिया। राव रामबख्श सिंह जी बैसवारा के संस्थापक राजा त्रिलोक चन्द्र की 16वीं पीढ़ी में जन्मे थे। रामबख्श सिंह जी ने 1840 में बैसवारा क्षेत्र की ही एक रियासत डौडिया खेड़ा का राज्य संभाला। यह वह समय था, जब अंग्रेज छल-बल से अपने साम्राज्य का विस्तार कर रहे थे। इसी के साथ स्वाधीनता संग्राम के लिए रानी लक्ष्मीबाई, बहादुरशाह जफर, नाना साहब, तात्या टोपे आदि के नेतृत्व में लोग संगठित भी हो रहे थे। राव साहब भी इस अभियान में जुड़ गये।

31 मई, 1857 को एक साथ अंग्रेजों के विरुद्ध सैनिक छावनियों में हल्ला बोलना था, पर दुर्भाग्यवश समय से पहले ही विस्फोट हो गया, जिससे अंग्रेज सतर्क हो गये। कानपुर पर नानासाहब के अधिकार के बाद वहां से भागे 13 अंग्रेज बक्सर में गंगा के किनारे स्थित एक शिव मन्दिर में छिप गये। वहां के ठाकुर यदुनाथ सिंह ने अंग्रेजों से कहा कि वे बाहर आ जायें, तो उन्हें सुरक्षा दी जाएगी, पर अंग्रेज छल से बाज नहीं आये। उन्होंने गोली चला दी, जिससे यदुनाथ सिंह वहीं मारे गये। क्रोधित होकर लोगों ने मन्दिर को सूखी घास से ढककर आग लगा दी। इसमें दस अंग्रेज जल मरे, पर तीन गंगा में कूद गये और किसी तरह गहरौली, मौरावाँ होते हुए लखनऊ आ गये।

लखनऊ में अंग्रेज अधिकारियों को जब यह वृत्तान्त पता लगा, तो उन्होंने मई 1858 में सर होप ग्राण्ट के नेतृत्व में एक बड़ी फौज बैसवारा के दमन के लिए भेज दी। इस फौज ने पुरवा, पश्चिम गांव, निहस्था, बिहार और सेमरी को रौंदते हुए दिसम्बर 1858 में राव रामबख्श सिंह के डौडिया खेड़ा दुर्ग को घेर लिया। राव साहब ने सम्पूर्ण क्षमता के साथ युद्ध किया, पर अंग्रेजों की सामरिक शक्ति अधिक होने के कारण उन्हें पीछे हटना पड़ा।

इसके बाद भी राव साहब गुरिल्ला पद्धति से अंग्रेजों को छकाते रहे, पर उनके कुछ परिचितों ने अंग्रेजों द्वारा दिये गये चांदी के टुकड़ों के बदले अपनी देशनिष्ठा गिरवी रख दी। इनमें एक था, उनका नौकर चन्दी केवट. उसकी सूचना पर अंग्रेजों ने राव साहब को काशी में गिरफ्तार कर लिया। रायबरेली के तत्कालीन जज डब्ल्यू. ग्लाइन के सामने न्याय का नाटक खेला गया। मौरावां के देशद्रोही चन्दनलाल खत्री व दिग्विजय सिंह की गवाही पर राव साहब को मृत्युदंड दिया गया। अंग्रेज अधिकारी बैसवारा तथा सम्पूर्ण अवध में अपना आतंक फैलाना चाहते थे। इसलिए उन्होंने बक्सर के उसी मन्दिर में स्थित वटवृक्ष पर 28 दिसम्बर, 1861 को राव रामबख्श सिंह को फांसी दी, जहां दस अंग्रेजों को जलाया गया था। राव साहब डौडिया खेड़ा के कामेश्वर महादेव तथा बक्सर की मां चन्द्रिका देवी के उपासक थे। इन दोनों का ही प्रताप था कि फांसी की रस्सी दो बार टूट गयी।

राव रामबख्श सिंह भले ही चले गये, पर डौडिया खेड़ा दुर्ग एक तीर्थ बन गया, जहां भरने वाले मेले में अवध के लोकगायक आज भी गाते हैं।

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अभी थोड़े समय  पहले अहिंसा और बिना खड्ग बिना ढाल वाले नारों और गानों का बोलबाला था ! हर कोई केवल शांति के कबूतर और अहिंसा के चरखे आदि में व्यस्त था लेकिन उस समय कभी इतिहास में तैयारी हो रही थी एक बड़े आन्दोलन की ! इसमें तीर भी थी, तलवार भी थी , खड्ग और ढाल से ही लड़ा गया था ये युद्ध ! जी हाँ, नकली कलमकारों के अक्षम्य अपराध से विस्मृत कर दिए गये वीर बलिदानी  जानिये जिनका आज बलिदान दिवस ! आज़ादी का महाबिगुल फूंक चुके इन वीरो को नही दिया गया था इतिहास की पुस्तकों में स्थान !  किसी भी व्यक्ति के लिए अपने मुल्क पर मर मिटने की राह चुनने के लिए सबसे पहली और महत्वपूर्ण चीज है- जज्बा या स्पिरिट। किसी व्यक्ति के क्रान्तिकारी बनने में बहुत सारी चीजें मायने रखती हैं, उसकी पृष्ठभूमि, अध्ययन, जीवन की समझ, तथा सामाजिक जीवन के आयाम व पहलू। लेकिन उपरोक्त सारी परिस्थितियों के अनुकूल होने पर भी अगर जज्बा  या स्पिरिट न हो तो कोई भी व्यक्ति क्रान्ति के मार्ग पर अग्रसर नहीं हो सकता। देश के लिए मर मिटने का जज्बा ही वो ताकत है जो विभिन्न पृष्ठभूमि के क्रान्तिकारियों को एक दूसरे के प्रति, साथ ही जनता के प्रति अगाध विश्वास और प्रेम से भरता है। आज की युवा पीढ़ी को भी अपने पूर्वजों और उनके क्रान्तिकारी जज्बे के विषय में कुछ जानकारी तो होनी ही चाहिए। आज युवाओं के बड़े हिस्से तक तो शिक्षा की पहुँच ही नहीं है। और जिन तक पहुँच है भी तो उनका काफी बड़ा हिस्सा कैरियर बनाने की चूहा दौड़ में ही लगा है। एक विद्वान ने कहा था कि चूहा-दौड़ की सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि व्यक्ति इस दौड़ में जीतकर भी चूहा ही बना रहता है।  अर्थात इंसान की तरह जीने की लगन और हिम्मत उसमें पैदा ही नहीं होती। और जीवन को जीने की बजाय अपना सारा जीवन, जीवन जीने की तैयारियों में लगा देता है। जाहिरा तौर पर इसका एक कारण हमारा औपनिवेशिक अतीत भी है जिसमें दो सौ सालों की गुलामी ने स्वतंत्र चिन्तन और तर्कणा की जगह हमारे मस्तिष्क को दिमागी गुलामी की बेड़ियों से जकड़ दिया है। आज भी हमारे युवा क्रान्तिकारियों के जन्मदिवस या शहादत दिवस पर ‘सोशल नेट्वर्किंग साइट्स’ पर फोटो तो शेयर कर देते हैं, लेकिन इस युवा आबादी में ज्यादातर को भारत की क्रान्तिकारी विरासत का या तो ज्ञान ही नहीं है या फिर अधकचरा ज्ञान है। ऐसे में सामाजिक बदलाव में लगे पत्र-पत्रिकाओं की जिम्मेदारी बनती है कि आज की युवा आबादी को गौरवशाली क्रान्तिकारी विरासत से परिचित करायें ताकि आने वाले समय के जनसंघर्षों में जनता अपने सच्चे जन-नायकों से प्ररेणा ले सके। आज हम एक ऐसी ही क्रान्तिकारी साथी का जीवन परिचय दे रहे हैं जिन्होंने जनता के लिए चल रहे संघर्ष में बेहद कम उम्र में बेमिसाल कुर्बानी दी।    

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19 दिसम्बर बलिदान दिवस अमर शहीद काकोरी काण्ड के महानायक ठाकुर रोशन सिंह

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नोट -भारत की आजादी में शहीद हुए वीरांगना/जवानो के बारे में यदि आपके पास कोई जानकारी हो तो कृपया उपलब्ध कराने का कष्ट करे . जिसे प्रकाशित किया जा सके इस देश की युवा पीढ़ी कम से कम आजादी कैसे मिली ,कौन -कौन नायक थे यह जान सके । वैसे तो यह बहुत दुखद है कि भारत की आजादी में कुल कितने क्रान्तिकारी शहीद हुए इसकी जानकार भारत सरकार के पास उपलब्ध नही है। और न ही भारत सरकार देश की आजादी के दीवानो की सूची संकलन करने में रूचि दिखा रही जो बहुत ही दुर्भाग्य पूर्ण है। 
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ठाकुर रोशन सिंह का जन्म- 22 जनवरी, 1892, शाहजहाँपुर, उत्तर प्रदेश। तथा उनकी शहादत- 19 दिसम्बर, 1927, नैनी जेल, इलाहाबाद) भारत की आजादी के लिए संघर्ष करने वाले क्रांतिकारियों में से एक थे। 9 अगस्त, 1925 को उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के पास काकोरी स्टेशन के निकट काकोरी काण्ड के अंतर्गत सरकारी खजाना लूटा गया था। यद्यपि ठाकुर रोशन सिंह ने काकोरी काण्ड में प्रत्यक्ष रूप से भाग नहीं लिया था, फिर भी उनके आकर्षक व रौबीले व्यक्तित्व को देखकर डकैती के सूत्रधार रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खाँ और राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी के साथ उन्हें भी फाँसी की सजा दे दी गई।

ठाकुर रोशन सिंह की जीवन परिचय 
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ठाकुर रोशन सिंह का जन्म 22 जनवरी, 1892 को उत्तर प्रदेश के ख्याति प्राप्त जनपद शाहजहाँपुर में स्थित गांव नबादा में हुआ था। उनकी माता का नाम कौशल्या देवी और पिता का नाम ठाकुर जंगी सिंह था। ठाकुर रोशन सिंह का पूरा परिवार आर्य समाज से अनुप्राणित था। वे अपने पाँच भाई-बहनों में सबसे बड़े थे। जब गाँधीजी ने असहयोग आन्दोलन शुरू किया, तब रोशन सिंह ने उत्तर प्रदेश के शाहजहाँपुर और बरेली जिले के ग्रामीण क्षेत्र में अद्भुत योगदान दिया था। हिन्दू धर्म, आर्य संस्कृति, भारतीय स्वाधीनता और क्रान्ति के विषय में ठाकुर रोशन सिंह सदैव पढ़ते व सुनते रहते थे। ईश्वर पर उनकी आगाध श्रद्धा थी। हिन्दी, संस्कृत, बंगला और अंग्रेजी इन सभी भाषाओं को सीखने के वे बराबर प्रयत्न करते रहते थे। स्वस्थ, लम्बे, तगड़े सबल शारीर के भीतर स्थिर उनका हृदय और मस्तिष्क भी उतना ही सबल और विशाल था।

ठाकुर रोशन सिंह की गिरफ्तारी
ठाकुर रोशन सिंह 1929 के आस-पास असहयोग आन्दोलन से पूरी तरह प्रभावित हो गए थे। वे देश सेवा की और झुके और अंततः रामप्रसाद बिस्मिल के संपर्क में आकर क्रांति पथ के यात्री बन गए। यह उनकी ब्रिटिश विरोधी और भारत भक्ति का ही प्रभाव था की वे बिस्मिल के साथ रहकर खतरनाक कामों में उत्साह पूर्वक भाग लेने लगे। काकोरी काण्ड में भी वे सम्म्लित थे और उसी के आरोप में वे 26 सितम्बर, 1925 को गिरफ्तार किये गए थे। उन्हे मुखबिर बनाने की अग्रेजो ने बहुत कोशिश की प्ररन्तु वे सफल नही हुए।  जेल जीवन में पुलिस ने उन्हें मुखबिर बनाने के लिए बहुत कोशिश की, लेकिन वे डिगे नहीं। चट्टान की तरह अपने सिद्धांतो पर दृढ रहे। काकोरी काण्ड के सन्दर्भ में रामप्रसाद बिस्मिल, राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी और अशफाक उल्ला खाँ की तरह ठाकुर रोशन सिंह को भी फाँसी की सजा दी गई थी। यद्यपि लोगों का अनुमान था की उन्हें कारावास मिलेगा, पर वास्तव में उन्हें कीर्ति भी मिलनी थी और उसके लिए फाँसी ही श्रेष्ठ माध्यम थी। फाँसी की सजा सुनकर उन्होंने अदालत में ओंकार का उच्चारण किया और फिर चुप हो गए। ॐ मंत्र के वे अनन्य उपासक थे।

साथियों के प्रति प्रेम भाव
अपने साथियों में रोशन सिंह प्रोढ़ थे। इसलिए युवक मित्रों की फाँसी उन्हें कचोट रही थी। अदालत से बहार निकलने पर उन्होंने साथियों से कहा था हमने तो जिन्दगी का आनंद खूब ले लिया है, मुझे फाँसी हो जाये तो कोई दुःख नहीं है, लेकिन तुम्हारे लिए मुझे अफसोस हो रहा है, क्योंकि तुमने तो अभी जीवन का कुछ भी नहीं देखा।

ठाकुर रोशन सिंह को कारावास
उसी रात रोशन सिंह लखनऊ से ट्रेन द्वारा इलाहाबाद जेल भेजे गए। उन्हें इलाहाबाद की मलाका जेल में फाँसी दिए जाने का फैसला किया गया था। उसी ट्रेन से काकोरी कांड के दो अन्य कैदी विष्णु शरण दुबलिस और मन्मथनाथ गुप्त भी इलाहाबाद जा रहे थे। उनके लिए वहाँ की नेनी जेल में कारावास की सजा दी गई थी। लखनऊ से इलाहाबाद तक तीनों साथी, जो अपने क्रांति जीवन और काकोरी कांड में भी साथी थे, बाते करते रहे। डिब्बे के दूसरे यात्रियों को जब पता चला की ये तीनों क्रन्तिकारी और काकोरी कांड के दण्डित वीर हैं तो उन्होंने श्रद्धा-पूर्वक इन लोगों के लिए अपनी-अपनी सीटें खाली करके आराम से बेठने का अनुरोध किया। ट्रेन में भी ठाकुर रोशन सिंह बातचीत के दौरान बीच-बीच में ॐ मंत्र का उच्च स्वर में जप करने लगते थे।

महाप्रयाण
मलाका जेल में रोशन सिंह को आठ महीने तक बड़ा कष्टप्रद जीवन बिताना पड़ा। न जाने क्यों फाँसी की सजा को क्रियान्वित करने में अंग्रेज अधिकारी बंदियों के साथ ऐसा अमानुषिक बर्ताव कर रहे थे। फाँसी से पहली की रात ठाकुर रोशन सिंह कुछ घंटे सोए। फिर देर रात से ही ईश्वर भजन करते रहे। प्रातरूकाल शौच आदि से निवृत्त होकर यथानियम स्नान-ध्यान किया। कुछ देर श्गीताश् पाठ में लगाया, फिर पहरेदार से कहा- चलो। वह हैरत से देखने लगा कि यह कोई आदमी है या देवता। उन्होंने अपनी काल कोठरी को प्रणाम किया और श्गीताश् हाथ में लेकर निर्विकार भाव से फाँसी घर की ओर चल दिए। फाँसी के फंदे को चूमा, फिर जोर से तीन बार वंदे मातरम का उद्घोष किया। वेद मंत्र का जाप करते हुए वे 19 दिसम्बर, 1927 को फंदे से झूल गए। उस समय वे इतने निर्विकार थे, जैसे कोई योगी सहज भाव से अपनी साधना कर रहा हो।

अंतिम यात्रा
इलाहाबाद में नैनी स्थित मलाका जेल के फाटक पर हजारों की संख्या में स्त्री-पुरुष, युवा और वृद्ध रोशन सिंह के अंतिम दर्शन करने और उनकी अंत्येष्टि में शामिल होने के लिए खड़े थे। जैसे ही उनका शव जेल कर्मचारी बाहर लाए, वहाँ उपस्थित सभी लोगों ने नारा लगाया ष्रोशन सिंह अमर रहेंष्। भारी जुलूस की शक्ल में शवयात्रा निकली और गंगा-यमुना के संगम तट पर जाकर रुकी, जहाँ वैदिक रीति से उनका अंतिम संस्कार किया गया।

ठाकुर रोशन सिंह का पत्र
ठाकुर रोशन सिंह ने 6 दिसम्बर, 1927 को इलाहाबाद की नैनी जेल की काल कोठरी से अपने एक मित्र को पत्र में लिखा- एक सप्ताह के भीतर ही फाँसी होगी। ईश्वर से प्रार्थना है कि आप मेरे लिए रंज हरगिज न करें। मेरी मौत खुशी का कारण होगी। दुनिया में पैदा होकर मरना जरूर है। दुनिया में बदफैली करके अपने को बदनाम न करें और मरते वक्त ईश्वर को याद रखें, यही दो बातें होनी चाहिए। ईश्वर की कृपा से मेरे साथ यह दोनों बातें हैं। इसलिए मेरी मौत किसी प्रकार अफसोस के लायक नहीं है। दो साल से बाल-बच्चों से अलग रहा हूँ। इस बीच ईश्वर भजन का खूब मौका मिला। इससे मेरा मोह छूट गया और कोई वासना बाकी न रही। मेरा पूरा विश्वास है कि दुनिया की कष्ट भरी यात्रा समाप्त करके मैं अब आराम की जिंदगी जीने के लिए जा रहा हूँ। हमारे शास्त्रों में लिखा है कि जो आदमी धर्म युद्ध में प्राण देता है, उसकी वही गति होती है, जो जंगल में रहकर तपस्या करने वाले महात्मा मुनियों कीकृ। पत्र समाप्त करने के पश्चात् उसके अंत में ठाकुर रोशन सिंह ने अपना निम्न शेर भी लिखा-

जिंदगी जिंदा-दिली को जान ऐ रोशन
..वरना कितने ही यहाँ रोज फना होते हैं..।

विशेष यह भी जाने 
अभी थोड़े समय  पहले अहिंसा और बिना खड्ग बिना ढाल वाले नारों और गानों का बोलबाला था ! हर कोई केवल शांति के कबूतर और अहिंसा के चरखे आदि में व्यस्त था लेकिन उस समय कभी इतिहास में तैयारी हो रही थी एक बड़े आन्दोलन की ! इसमें तीर भी थी, तलवार भी थी , खड्ग और ढाल से ही लड़ा गया था ये युद्ध ! जी हाँ, नकली कलमकारों के अक्षम्य अपराध से विस्मृत कर दिए गये वीर बलिदानी  जानिये जिनका आज बलिदान दिवस ! आज़ादी का महाबिगुल फूंक चुके इन वीरो को नही दिया गया था इतिहास की पुस्तकों में स्थान !  किसी भी व्यक्ति के लिए अपने मुल्क पर मर मिटने की राह चुनने के लिए सबसे पहली और महत्वपूर्ण चीज है- जज्बा या स्पिरिट। किसी व्यक्ति के क्रान्तिकारी बनने में बहुत सारी चीजें मायने रखती हैं, उसकी पृष्ठभूमि, अध्ययन, जीवन की समझ, तथा सामाजिक जीवन के आयाम व पहलू। लेकिन उपरोक्त सारी परिस्थितियों के अनुकूल होने पर भी अगर जज्बा  या स्पिरिट न हो तो कोई भी व्यक्ति क्रान्ति के मार्ग पर अग्रसर नहीं हो सकता। देश के लिए मर मिटने का जज्बा ही वो ताकत है जो विभिन्न पृष्ठभूमि के क्रान्तिकारियों को एक दूसरे के प्रति, साथ ही जनता के प्रति अगाध विश्वास और प्रेम से भरता है। आज की युवा पीढ़ी को भी अपने पूर्वजों और उनके क्रान्तिकारी जज्बे के विषय में कुछ जानकारी तो होनी ही चाहिए। आज युवाओं के बड़े हिस्से तक तो शिक्षा की पहुँच ही नहीं है। और जिन तक पहुँच है भी तो उनका काफी बड़ा हिस्सा कैरियर बनाने की चूहा दौड़ में ही लगा है। एक विद्वान ने कहा था कि चूहा-दौड़ की सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि व्यक्ति इस दौड़ में जीतकर भी चूहा ही बना रहता है।  अर्थात इंसान की तरह जीने की लगन और हिम्मत उसमें पैदा ही नहीं होती। और जीवन को जीने की बजाय अपना सारा जीवन, जीवन जीने की तैयारियों में लगा देता है। जाहिरा तौर पर इसका एक कारण हमारा औपनिवेशिक अतीत भी है जिसमें दो सौ सालों की गुलामी ने स्वतंत्र चिन्तन और तर्कणा की जगह हमारे मस्तिष्क को दिमागी गुलामी की बेड़ियों से जकड़ दिया है। आज भी हमारे युवा क्रान्तिकारियों के जन्मदिवस या शहादत दिवस पर ‘सोशल नेट्वर्किंग साइट्स’ पर फोटो तो शेयर कर देते हैं, लेकिन इस युवा आबादी में ज्यादातर को भारत की क्रान्तिकारी विरासत का या तो ज्ञान ही नहीं है या फिर अधकचरा ज्ञान है। ऐसे में सामाजिक बदलाव में लगे पत्र-पत्रिकाओं की जिम्मेदारी बनती है कि आज की युवा आबादी को गौरवशाली क्रान्तिकारी विरासत से परिचित करायें ताकि आने वाले समय के जनसंघर्षों में जनता अपने सच्चे जन-नायकों से प्ररेणा ले सके। आज हम एक ऐसी ही क्रान्तिकारी साथी का जीवन परिचय दे रहे हैं जिन्होंने जनता के लिए चल रहे संघर्ष में बेहद कम उम्र में बेमिसाल कुर्बानी दी।    

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19 दिसम्बर बलिदान दिवस काकोरी काण्ड के महानायक अशफाक उल्ला खां जिन्होंने काकोरी में लुटा था खजाना

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नोट -भारत की आजादी में शहीद हुए वीरांगना/जवानो के बारे में यदि आपके पास कोई जानकारी हो तो कृपया उपलब्ध कराने का कष्ट करे . जिसे प्रकाशित किया जा सके इस देश की युवा पीढ़ी कम से कम आजादी कैसे मिली ,कौन -कौन नायक थे यह जान सके । वैसे तो यह बहुत दुखद है कि भारत की आजादी में कुल कितने क्रान्तिकारी शहीद हुए इसकी जानकार भारत सरकार के पास उपलब्ध नही है। और न ही भारत सरकार देश की आजादी के दीवानो की सूची संकलन करने में रूचि दिखा रही जो बहुत ही दुर्भाग्य पूर्ण है। 

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अशफाक उल्ला खां  जन्म- 22 अक्टूबर, 1900 ई., शाहजहाँपुर, उत्तर प्रदेश मृत्यु- 19 दिसम्बर, 1927 ई0, फैजाबाद को भारत के प्रसिद्ध अमर शहीद क्रांतिकारियों में गिना जाता है। देश की आजादी के लिए हंसते-हंसते प्राण न्यौछावर करने वाले अशफाक उल्ला खां हिन्दू-मुस्लिम एकता के प्रबल पक्षधर थे। काकोरी कांड के सिलसिले में 19 दिसम्बर, 1927 ई0 को उन्हें फैजाबाद जेल में फाँसी पर चढ़ा दिया गया। अशफाक उल्ला खाँ ऐसे पहले मुस्लिम थे, जिन्हें षड्यंत्र के मामले में फाँसी की सजा हुई थी। उनका हृदय बड़ा विशाल और विचार बड़े उदार थे। हिन्दू-मुस्लिम एकता से सम्बन्धित संकीर्णता भरे भाव उनके हृदय में कभी नहीं आ पाये। सब के साथ सम व्यवहार करना उनका सहज स्वभाव था। कठोर परिश्रम, लगन, दृढ़ता, प्रसन्नता, ये उनके स्वभाव के विशेष गुण थे।

अशफाक उल्ला खां की जीवन परिचय
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अशफाक उल्ला खाँ का जन्म 22 अक्टूबर, 1900 ई0 को उत्तर प्रदेश में शाहजहाँपुर जिले के शहीदगढ़ नामक स्थान पर हुआ था। इनके पिता का नाम मोहम्मद शफीक उल्ला खां था, जो एक पठान परिवार से ताल्लुक रखते थे तथा माता मजहूरुन्निशाँ बेगम थीं। इनकी माता बहुत सुन्दर थीं और खूबसूरत स्त्रियों में गिनी जाती थीं। इनका परिवार काफी समृद्ध था। परिवार के सभी लोग सरकारी नौकरी में थे। किंतु अशफाक को विदेशी दासता विद्यार्थी जीवन से ही खलती थी। वे देश के लिए कुछ करने को बेताव थे। बंगाल के क्रांतिकारियों का उनके जीवन पर बहुत प्रभाव था। 

अपनी बाल्यावस्था में अशफाक उल्ला खां का मन पढ़ने-लिखने में नहीं लगता था। खनौत में तैरने, घोड़े की सवारी करने और भाई की बन्दूक लेकर शिकार करने में इन्हें बड़ा आनन्द आता था। ये बड़े सुडौल, सुन्दर और स्वस्थ जवान थे। चेहरा हमेशा खिला रहता था और दूसरों के साथ हमेशा प्रेम भरी बोली बोला करते थे। बचपन से ही उनमें देश के प्रति अपार अनुराग था। देश की भलाई के लिये किये जाने वाले आन्दोलनों की कथाएँ वे बड़ी रुचि से पड़ते थे। अशफाक को कविता का शौक आदि भी किया करते थे। उन्हें इसका बहुत शौक था। उन्होंने बहुत अच्छी-अच्छी कवितायें लिखी थीं, जो स्वदेशानुराग से सराबोर थीं। कविता में वे अपना उपनाम हसरत लिखते थे। उन्होंने कभी भी अपनी कविताओं को प्रकाशित कराने की चेष्टा नहीं की। उनका कहना था कि हमें नाम पैदा करना तो है नहीं। अगर नाम पैदा करना होता तो क्रान्तिकारी काम छोड़ लीडरी न करता ? उनकी लिखी हुई कविताएँ अदालत आते-जाते समय अक्सर काकोरी कांड के क्रांतिकारी गाया करते थे। अपनी भावनाओं का इजहार करते हुए अशफाक उल्ला खाँ ने लिखा था कि- जमीं दुश्मन, जमां दुश्मन, जो अपने थे पराये हैं, सुनोगे दास्ताँ क्या तुम मेरे हाले परेशाँ की।

राम प्रसाद बिस्मिल से मित्रता
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देश में चल रहे आन्दोलनों और क्रांतिकारी गतिविधियों से अशफाक उल्ला खाँ प्रभावित होने लगे थे। धीरे-धीरे उनमें क्रान्तिकारी भाव पैदा होने लगे। उनको बड़ी उत्सुकता हुई कि किसी ऐसे आदमी से भेंट हो जाये, जो क्रान्तिकारी दल का सदस्य हो। उस समय मैनपुरी षड़यन्त्र का मामला चल रहा था। अशफाक शाहजहाँपुर में ही स्कूल में शिक्षा पाते थे। मैनपुरी षड़यन्त्र में शाहजहाँपुर के ही रहने वाले एक नवयुवक के नाम भी वारण्ट निकला था। वह नवयुवक और कोई नहीं, रामप्रसाद बिस्मिल थे। यह जानकर अशफाक को बड़ी प्रसन्नता हुई कि उनके शहर में ही एक आदमी है, जैसा कि वे चाहते थे। किन्तु मामले से बचने के लिये रामप्रसाद बिस्मिल फरार थे। जब शाही ऐलान द्वारा सब राजनीतिक कैदी छोड़ दिये गये, तब रामप्रसाद बिस्मिल भी शाहजहाँपुर आ गये। जब अशफाक को यह बात मालूम हुई तो उन्होंने बिस्मिल से मिलने की कोशिश की। उनसे मिलकर षड्यंत्र के सम्बन्ध में बातचीत करनी चाही। पहले तो रामप्रसाद बिस्मिल ने टालमटूल कर दी। परन्तु फिर अशफाक के व्यवहार और बर्ताव से वह इतने प्रसन्न हुए कि उनको अपना बहुत ही घनिष्ट मित्र बना लिया। इस प्रकार वे क्रान्तिकारी जीवन में आ गये। क्रान्तिकारी जीवन में पदार्पण करने के बाद से अशफाक उल्ला खाँ सदा प्रयत्न करते रहे कि उनकी भांति और भी थे मुस्लिम नवयुवक क्रान्तिकारी दल के सदस्य बनें। हिन्दु-मुस्लिम एकता के वे बहुत बड़े समर्थक थे।

काकोरी काण्ड के प्रमुख नायक
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अशफाक उल्ला खाँ जब चौरी चौरा घटना के बाद गांधीजी ने असहयोग आंदोलन वापस ले लिया तो उनके मन को अत्यंत पीड़ा पहुँची। रामप्रसाद बिस्मिल और चन्द्रशेखर आजाद के नेतृत्व में 8 अगस्त, 1925 को शाहजहाँपुर में क्रांतिकारियों की एक अहम बैठक हुई, जिसमें हथियारों के लिए ट्रेन में ले जाए जाने वाले सरकारी खजाने को लूटने की योजना बनाई गई। क्रांतिकारी जिस धन को लूटना चाहते थे, दरअसल वह धन अंग्रेजों ने भारतीयों से ही हड़पा था। 9 अगस्त, 1925 को अशफाक उल्ला खाँ, रामप्रसाद बिस्मिल, चन्द्रशेखर आजाद, राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी, ठाकुर रोशन सिंह, सचिन्द्र बख्शी, केशव चक्रवर्ती, बनवारी लाल, मुकुन्द लाल और मन्मथ लाल गुप्त ने अपनी योजना को अंजाम देते हुए लखनऊ के नजदीक काकोरी में ट्रेन द्वारा ले जाए जा रहे सरकारी खजाने को लूट लिया। भारतीय इतिहास में यह घटना काकोरी कांड के नाम से जानी जाती है। इस घटना को आजादी के इन मतवालों ने अपने नाम बदलकर अंजाम दिया था। अशफाक उल्ला खाँ ने अपना नाम कुमारजी रखा। इस घटना के बाद ब्रिटिश हुकूमत पागल हो उठी और उसने बहुत से निर्दोषों को पकड़कर जेलों में ठूँस दिया। अपनों की दगाबाजी से इस घटना में शामिल एक-एक कर सभी क्रांतिकारी पकड़े गए, लेकिन चन्द्रशेखर आजाद और अशफाक उल्ला खाँ पुलिस के हाथ नहीं आए।

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इस घटना के बाद अशफाक उल्ला खाँ शाहजहाँपुर छोड़कर बनारस आ गए और वहाँ दस महीने तक एक इंजीनियरिंग कंपनी में काम किया। इसके बाद उन्होंने इंजीनियरिंग के लिए विदेश जाने की योजना बनाई ताकि वहाँ से कमाए गए पैसों से अपने क्रांतिकारी साथियों की मदद करते रहें। विदेश जाने के लिए वह दिल्ली में अपने एक पठान मित्र के संपर्क में आए, लेकिन उनका वह दोस्त विश्वासघाती निकला। उसने इनाम के लालच में अंग्रेज पुलिस को सूचना दे दी और इस तरह अशफाक उल्ला खाँ पकड़ लिए गए।

सरकारी गवाह बनाने की कोशिश
जेल में अशफाक को कई तरह की यातनाएँ दी गईं। जब उन पर इन यातनाओं का कोई असर नहीं हुआ तो अंग्रेजों ने तरह−तरह की चालें चलकर उन्हें सरकारी गवाह बनाने की कोशिश की, लेकिन अंग्रेज अपने इरादों में किसी भी तरह कामयाब नहीं हो पाए। अंग्रेज अधिकारियों ने उनसे यह तक कहा कि हिन्दुस्तान आजाद हो भी गया तो भी उस पर मुस्लिमों का नहीं हिन्दुओं का राज होगा और मुस्लिमों को कुछ नहीं मिलेगा। इसके जवाब में अशफाक उल्ला खाँ ने अंग्रेज अफसर से कहा कि- फूट डालकर शासन करने की चाल का उन पर कोई असर नहीं होगा और हिन्दुस्तान आजाद होकर रहेगा। उन्होंने अंग्रेज अधिकारी से कहा- तुम लोग हिन्दू-मुस्लिमों में फूट डालकर आजादी की लड़ाई को अब बिलकुल नहीं दबा सकते। अपने दोस्तों के खिलाफ मैं सरकारी गवाह कभी नहीं बनूँगा।

शहादत
19 दिसम्बर, 1927 को अशफाक उल्ला खाँ को फैजाबाद जेल में फाँसी दे दी गई। इस तरह भारत का यह महान् सपूत देश के लिए अपना बलिदान दे गया। उनकी इस शहादत ने देश की आजादी की लड़ाई में हिन्दू-मुस्लिम एकता को और भी अधिक मजबूत कर दिया। आज भी उनका दिया गया बलिदान देशवासियों को एकता के सूत्र में पिरोने का काम करता है।

अशफाक उल्ला खां की एक प्रेरक प्रसंग
अशफाक उल्ला खाँ से जुड़े कई प्रसंग ऐसे हैं, जो उन्हें हिन्दू-मुस्लिम एकता का पक्षधर सिद्ध करते हैं- अशफाक उल्ला खाँ के लिए मंदिर और मसजिद एक समान थे। एक बार जब शाहजहाँपुर में हिन्दू और मुस्लिमों में झगड़ा हुआ और शहर में मारपीट शुरू हो गई, उस समय अशफाक बिस्मिल जी के साथ आर्य समाज मन्दिर में बैठे हुए थे। कुछ मुस्लिम मन्दिर के पास आ गए और आक्रमण करने के लिए तैयार हो गए। अशफाक उल्ला खाँ ने अपना पिस्तौल निकाल लिया और आर्य समाज मन्दिर से बाहर आकर मुस्लिमों से कहने लगे कि मैं कटटर मुसलमान हूँ, परन्तु इस मन्दिर की एक-एक ईंट मुझे प्राणों से प्यारी है। मेरे नजदीक मन्दिर और मसजिद की प्रतिष्ठा बराबर है। अगर किसी ने इस मन्दिर की ओर निगाह उठाई तो गोली का निशाना बनेगा। अगर तुमको लड़ना है तो बाहर सड़क पर चले जाओ और खूब दिल खोल कर लड़ लो।ष् उनकी इस सिंह गर्जना को सुनकर सबके होश गुम हो गए और किसी का साहस नहीं हुआ, जो आर्य समाज मन्दिर पर आक्रमण करे। यह अशफाक का सार्वजनिक प्रेम था। इस से भी अधिक उनको रामप्रसाद बिस्मिल जी से प्रेम था। एक बार अशफाक उल्ला खाँ बहुत बीमार पड़ गये। उस समय वे राम-राम कहकर पुकारने लगे। माता-पिता ने बहुत कहा कि तुम मुस्लिम हो, खुदा-खुदा कहो, परन्तु उस प्रेम के सच्चे पुजारी के कान में यह आवाज ही नहीं पहुँची और वह बराबर राम-राम कहते रहे। माता-पिता तथा अन्य सम्बन्धियों की समझ में यह बात नहीं आई। उसी समय एक अन्य व्यक्ति ने आकर उनके सम्बन्धियों से कहा कि यह रामप्रसाद बिस्मिल को याद कर रहे हैं। यह एक-दूसरे को राम और कृष्ण कहते हैं। अतः एक आदमी जाकर बिस्मिल जी को बुला लाया। उनको देख कर अशफाक ने कहा राम तुम आ गए। उस समय उनके घर वालों को राम का पता चला। अशफाक के इन आचरणों से उनके सम्बन्धी कहते थे कि वे काफिर हो गये हैं, किन्तु वे इन बातों की कभी परवाह नहीं करते थे और सदैव एकाग्र चित्त से अपने व्रत पर अटल रहे।  

विशेष यह भी जाने 
अभी थोड़े समय  पहले अहिंसा और बिना खड्ग बिना ढाल वाले नारों और गानों का बोलबाला था ! हर कोई केवल शांति के कबूतर और अहिंसा के चरखे आदि में व्यस्त था लेकिन उस समय कभी इतिहास में तैयारी हो रही थी एक बड़े आन्दोलन की ! इसमें तीर भी थी, तलवार भी थी , खड्ग और ढाल से ही लड़ा गया था ये युद्ध ! जी हाँ, नकली कलमकारों के अक्षम्य अपराध से विस्मृत कर दिए गये वीर बलिदानी  जानिये जिनका आज बलिदान दिवस ! आज़ादी का महाबिगुल फूंक चुके इन वीरो को नही दिया गया था इतिहास की पुस्तकों में स्थान !  किसी भी व्यक्ति के लिए अपने मुल्क पर मर मिटने की राह चुनने के लिए सबसे पहली और महत्वपूर्ण चीज है- जज्बा या स्पिरिट। किसी व्यक्ति के क्रान्तिकारी बनने में बहुत सारी चीजें मायने रखती हैं, उसकी पृष्ठभूमि, अध्ययन, जीवन की समझ, तथा सामाजिक जीवन के आयाम व पहलू। लेकिन उपरोक्त सारी परिस्थितियों के अनुकूल होने पर भी अगर जज्बा  या स्पिरिट न हो तो कोई भी व्यक्ति क्रान्ति के मार्ग पर अग्रसर नहीं हो सकता। देश के लिए मर मिटने का जज्बा ही वो ताकत है जो विभिन्न पृष्ठभूमि के क्रान्तिकारियों को एक दूसरे के प्रति, साथ ही जनता के प्रति अगाध विश्वास और प्रेम से भरता है। आज की युवा पीढ़ी को भी अपने पूर्वजों और उनके क्रान्तिकारी जज्बे के विषय में कुछ जानकारी तो होनी ही चाहिए। आज युवाओं के बड़े हिस्से तक तो शिक्षा की पहुँच ही नहीं है। और जिन तक पहुँच है भी तो उनका काफी बड़ा हिस्सा कैरियर बनाने की चूहा दौड़ में ही लगा है। एक विद्वान ने कहा था कि चूहा-दौड़ की सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि व्यक्ति इस दौड़ में जीतकर भी चूहा ही बना रहता है।  अर्थात इंसान की तरह जीने की लगन और हिम्मत उसमें पैदा ही नहीं होती। और जीवन को जीने की बजाय अपना सारा जीवन, जीवन जीने की तैयारियों में लगा देता है। जाहिरा तौर पर इसका एक कारण हमारा औपनिवेशिक अतीत भी है जिसमें दो सौ सालों की गुलामी ने स्वतंत्र चिन्तन और तर्कणा की जगह हमारे मस्तिष्क को दिमागी गुलामी की बेड़ियों से जकड़ दिया है। आज भी हमारे युवा क्रान्तिकारियों के जन्मदिवस या शहादत दिवस पर ‘सोशल नेट्वर्किंग साइट्स’ पर फोटो तो शेयर कर देते हैं, लेकिन इस युवा आबादी में ज्यादातर को भारत की क्रान्तिकारी विरासत का या तो ज्ञान ही नहीं है या फिर अधकचरा ज्ञान है। ऐसे में सामाजिक बदलाव में लगे पत्र-पत्रिकाओं की जिम्मेदारी बनती है कि आज की युवा आबादी को गौरवशाली क्रान्तिकारी विरासत से परिचित करायें ताकि आने वाले समय के जनसंघर्षों में जनता अपने सच्चे जन-नायकों से प्ररेणा ले सके। आज हम एक ऐसी ही क्रान्तिकारी साथी का जीवन परिचय दे रहे हैं जिन्होंने जनता के लिए चल रहे संघर्ष में बेहद कम उम्र में बेमिसाल कुर्बानी दी।    

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19 दिसम्बर बलिदान दिवस काकोरी कांड के पंडित रामप्रसाद बिस्मिल जिसने देश में क्रांतिकारियों के प्रति जनता का नजरिया ही बदल दिया

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नोट -भारत की आजादी में शहीद हुए वीरांगना/जवानो के बारे में यदि आपके पास कोई जानकारी हो तो कृपया उपलब्ध कराने का कष्ट करे . जिसे प्रकाशित किया जा सके इस देश की युवा पीढ़ी कम से कम आजादी कैसे मिली ,कौन -कौन नायक थे यह जान सके । वैसे तो यह बहुत दुखद है कि भारत की आजादी में कुल कितने क्रान्तिकारी शहीद हुए इसकी जानकार भारत सरकार के पास उपलब्ध नही है। और न ही भारत सरकार देश की आजादी के दीवानो की सूची संकलन करने में रूचि दिखा रही जो बहुत ही दुर्भाग्य पूर्ण है। 

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राम प्रसाद बिस्मिलजन्म- 11 जून, 1897 शाहजहाँपुर मृत्यु- 19 दिसंबर, 1927 गोरखपुर भारत के महान् स्वतन्त्रता सेनानी ही नहीं, बल्कि उच्च कोटि के कवि, शायर, अनुवादक, बहुभाषाविद् व साहित्यकार भी थे जिन्होंने भारत की आजादी के लिये अपने प्राणों की आहुति दे दी।

पं0 रामप्रसाद विस्मिल का जीवन परिचय
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पंडित रामप्रसाद ‘बिस्मिल’ किसी परिचय के मोहताज नहीं। उनके लिखे ‘सरफरोशी की तमन्ना’ जैसे अमर गीत ने हर भारतीय के दिल में जगह बनाई और अंग्रेजों से भारत की आजादी के लिए वो चिंगारी छेड़ी जिसने ज्वाला का रूप लेकर ब्रिटिश शासन के भवन को लाक्षागृह में परिवर्तित कर दिया। ब्रिटिश साम्राज्य को दहला देने वाले काकोरी काण्ड को रामप्रसाद बिस्मिल ने ही अंजाम दिया था। का जन्म ज्येष्ठ शुक्ल 11 संवत् 1954 सन 1897 में पंडित मुरलीधर की धर्मपत्नी ने द्वितीय पुत्र को जन्म दिया। इस पुत्र का जन्म मैनपुरी में हुआ था। सम्भवतः वहाँ बालक का ननिहाल रहा हो। इस विषय में श्री व्यथित हृदय ने लिखा है- यहाँ  यह बात बड़े आश्चर्य की मालूम होती है कि बिस्मिल के दादा और पिता ग्वालियर के निवासी थे। फिर भी उनका जन्म मैनपुरी में क्यों हुआ ? हो सकता है कि मैनपुरी में बिस्मिल जी का ननिहाल रहा हो। इस पुत्र से पूर्व एक पुत्र की मृत्यु हो जाने से माता-पिता का इसके प्रति चिन्तित रहना स्वाभाविक था। अतः बालक के जीवन की रक्षा के लिए जिसने जो उपाय बताया, वही किया गया। बालक को अनेक प्रकार के गण्डे ताबीज आदि भी लगाये गए। बालक जन्म से ही दुर्बल था। जन्म के एक-दो माह बाद इतना दुर्बल हो गया कि उसके बचने की आशा ही बहुत कम रह गई थी। माता-पिता इससे अत्यन्त चिन्तित हुए। उन्हें लगा कि कहीं यह बच्चा भी पहले बच्चे की तरह ही चल न बसे। इस पर लोगों ने कहा कि सम्भवतरू घर में ही कोई बच्चों का रोग प्रवेश कर गया है। इसके लिए उन्होंने उपाय सुझाया। बताया गया कि एक बिल्कुल सफेद खरगोश बालक के चारों ओर घुमाकर छोड़ दिया जाए। यदि बालक को कोई रोग होगा तो खरगोश तुरन्त मर जायेगा। माता-पिता बालक की रक्षा के लिए कुछ भी करने को तैयार थे, अतः ऐसा ही किया गया। आश्चर्य की बात कि खरगोश तुरन्त मर गया। इसके बाद बच्चे का स्वास्थ्य दिन पर दिन सुधरने लगा। यही बालक आगे चलकर प्रसिद्ध क्रान्तिकारी अमर शहीद रामप्रसाद बिस्मिल के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

शिक्षा और दिक्षा
पं0 रामप्रसाद विस्मिल मात्र सात वर्ष की अवस्था हो जाने पर बालक रामप्रसाद को पिता पंडित मुरलीधर घर पर ही हिन्दी अक्षरों का ज्ञान कराने लगे। उस समय उर्दू का बोलबाला था। अतः घर में हिन्दी शिक्षा के साथ ही बालक को उर्दू पढ़ने के लिए एक मौलवी साहब के पास मकतब में भेजा जाता था। पंडित मुरलीधर पुत्र की शिक्षा पर विशेष ध्यान देते थे। पढ़ाई के मामले में जरा भी लापरवाही करने पर बालक रामप्रसाद को पिता की मार भी पड़ती रहती थी। हिन्दी अक्षरों का ज्ञान कराते समय एक बार उन्हें बन्दूक के लोहे के गज से इतनी मार पड़ी थी कि गज टेढ़ा हो गया था। 

अपनी इस मार का वर्णन करते हुए उन्होंने लिखा है-
इसके बाद बालक रामप्रसाद ने पढ़ाई में कभी असावधानी नहीं की। वह परिश्रम से पढ़ने लगे। वह आठवीं कक्षा तक सदा अपनी कक्षा में प्रथम आते थे, किन्तु कुसंगति में पड़ जाने के कारण उर्दू मिडिल परीक्षा में वह लगातार दो वर्ष अनुत्तीर्ण हो गए। बालक की इस अवनति से घर में सभी को बहत दुरूख हुआ। दो बार एक ही परीक्षा में अनुत्तीर्ण होने पर बालक रामप्रसाद का मन उर्दू की पढ़ाई से उठ गया। उन्होंने अंग्रेजी पढ़ने की इच्छा व्यक्त की, किन्तु पिता पंडित मुरलीधर अंग्रेजी पढ़ाने के पक्ष में नहीं थे। वह रामप्रसाद को किसी व्यवसाय में लगाना चाहते थे। अन्ततः मां के कहने पर उन्हें अंग्रेजी पढ़ने भेजा गया। अंग्रेजी में आठवीं पास करने के बाद नवीं में ही वह आर्य समाज के सम्पर्क में आये, जिससे उनके जीवन की दशा ही बदल गई।

पं0 रामप्रसाद विस्मिल का क्रांतिकारियों से संपर्क
लखनऊ कांग्रेस अधिवेशन में भाग लेने के लिए जाने पर रामप्रसाद बिस्मिल कुछ क्रांतिकारी विचारों वाले युवकों के सम्पर्क में आए। इन युवकों का मत था कि देश की तत्कालीन दुर्दशा के एकमात्र कारण अंग्रेज ही थे। रामप्रसाद भी इन विचारों से प्रभावित हुए। अतः देश की स्वतंत्रता के लिए उनके मन कुछ विशेष काम करने का विचार आया। यहीं उन्हें यह भी ज्ञात हुआ कि क्रांतिकारियों की एक गुप्त समिति भी है। इस समिति के मुख्य उद्देश्य क्रांतिकारी मार्ग से देश की स्वतंत्रता प्राप्त करना था। वह सब ज्ञात होने पर बिस्मिल के मन में भी इस समिति का सदस्य बनने की तीव्र इच्छा हुई। वह समिति के कार्यों में सहयोग देने लगे। अपने एक मित्र के माध्यम से इसके सदस्य बन गए और थोड़े ही समय में वह समिति की कार्यकारिणी के सदस्य बना लिये गए। इस समिति के सदस्य बनने के बाद बिस्मिल फिर अपने घर शाहजहाँपुर आ गए। समिति के पास आय का कोई स्रोत न होने से धन की बहुत कमी थी। अतः इसके लिए कुछ धन संग्रह करने के लिए उनके मन में एक पुस्तक प्रकाशित करने का विचार आया। पुस्तक प्रकाशित करने के लिए भी रुपयों की आवश्यकता थी। अतरू उन्होंने एक चाल चली। अपनी माँ से कहा कि वह कुछ काम करना चाहते हैं, इससे अवश्य लाभ होगा, अतः इसके लिए पहले कुछ रुपयों की आवश्यकता है। माँ ने उन्हें दो सौ रुपये दिए। उन्होंने अमेरिका को स्वतंत्रता कैसे मिली नाम की एक पुस्तक पहले ही लिख ली थी। पुस्तक को प्रकाशित करने का प्रबंध किया गया। इसके लिए फिर से दो सौ रुपयों की आवश्यकता पड़ी। इस बार भी माँ से दो सौ रुपये और लिए। पुस्तक प्रकाशित हुई। इसकी कुछ प्रतियां बिक गई, जिनसे लगभग छरू सौ रुपयों की आय हुई। पहले माँ से लिए हुए चार सौ रुपये लौटा दिए गए। फिर श्मातृदेवीश् समिति की ओर से एक पर्चा प्रकाशित किया गया, जिसका शीर्षक था- देशवासियों के नाम संदेश।  समिति के सभी सदस्य और भी अधिक उत्साह से काम करने लगे। यह पर्चा संयुक्त प्रांत के अनेक जिलों में चिपकाया गया और वितरित किया गया। शीघ्र ही सरकार चैकन्नी हो गई, अतः संयुक्त प्रांत की सरकार ने इस पर्चे तथा पूर्व लिखित पुस्तक, दोनों को जब्त कर लिया।

काकोरी काण्ड के नायक पं0 रामप्रसाद विस्मिल
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राम प्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में 10 लोगों ने सुनियोजित कार्रवाई के तहत यह कार्य करने की योजना बनाई। 9 अगस्त, 1925 को लखनऊ के काकोरी नामक स्थान पर देशभक्तों ने रेल विभाग की ले जाई जा रही संग्रहीत धनराशि को लूटा। उन्होंने ट्रेन के गार्ड को बंदूक की नोंक पर काबू कर लिया। गार्ड के डिब्बे में लोहे की तिजोरी को तोड़कर आक्रमणकारी दल चार हजार रुपये लेकर फरार हो गए। इस डकैती में अशफाकउल्ला, चन्द्रशेखर आजाद, राजेन्द्र लाहिड़ी, सचीन्द्र सान्याल, मन्मथनाथ गुप्त, राम प्रसाद बिस्मिल आदि शामिल थे। काकोरी षड्यंत्र मुकदमे ने काफी लोगों का ध्यान खींचा। इसके कारण देश का राजनीतिक वातावरण आवेशित हो गया।

महाप्रयाण
सभी प्रकार से मृत्यु दंड को बदलने के लिए की गयी दया प्रार्थनाओं के अस्वीकृत हो जाने के बाद बिस्मिल अपने महाप्रयाण की तैयारी करने लगे। अपने जीवन के अंतिम दिनों में गोरखपुर जेल में उन्होंने अपनी आत्मकथा लिखी। फाँसी के तख्ते पर झूलने के तीन दिन पहले तक वह इसे लिखते रहे। 
इस विषय में उन्होंने स्वयं लिखा है-

( आज 16 दिसम्बर, 1927 ई. को निम्नलिखित पंक्तियों का उल्लेख कर रहा हूँ, जबकि 19 दिसम्बर, 1927 ई. सोमवार (पौष कृष्ण 11 संवत 1984) को साढ़े छः बजे प्रातः काल इस शरीर को फाँसी पर लटका देने की तिथि निश्चित हो चुकी है। अतएव नियत सीमा पर इहलीला संवरण करनी होगी। ) 

उन्हें इन दिनों गोरखपुर जेल की नौ फीट लम्बी तथा इतनी ही चैड़ी एक कोठरी में रखा गया था। इसमें केवल छरू फीट लम्बा, दो फीट चैड़ा दरवाजा था तथा दो फीट लम्बी, एक फीट चैड़ी एक खिड़की थी। इसी कोठरी में भोजन, स्नान, सोना, नित्य कर्म आदि सभी कुछ करना पड़ता था। मुश्किल से रात्रि में दो चार घण्टे नींद आ पाती थी। मिट्टी के बर्तनों में खाना, कम्बलों का बिस्तर, एकदम एकान्तिक जीवनचर्या यही उनके अंतिम दिन थे। इस सबका उन्होंने अपनी आत्मकथा में बड़ा ही मार्मिक वर्णन किया है।

फाँसी से एक दिन पूर्व
फाँसी के एक दिन पूर्व बिस्मिल के पिता अंतिम मुलाकात के लिए गोरखपुर आये। कदाचित् माँ का हृदय इस आघात को सहन न कर सके, ऐसा विचार कर वह बिस्मिल की माँ को साथ नहीं लाये। बिस्मिल के दल के साथी शिव वर्मा को लेकर अंतिम बार पुत्र से मिलने जेल पहुँचे, किन्तु वहाँ पहुँचने पर उन्हें यह देखकर आश्चर्यचकित रह जाना पड़ा कि माँ वहाँ पहले ही पहुँची थीं। शिव वर्मा को क्या कहकर अंदर ले जाएं, ऐसा कुछ सोच पाते, माँ ने शिव वर्मा को चुप रहने का संकेत किया और पूछने पर बता दिया। मेरी बहिन का लड़का है। सब लोग अंदर पहुँचे, माँ को देखते ही बिस्मिल रो पड़े। उनका मातृ स्नेह आंखों से उमड़ पड़ा, किन्तु वीर जननी माँ ने एक वीरांगना की तरह पुत्र को उसके कर्तव्य का बोध कराते हुए ऊँचे स्वर में कहा-

( मैं तो समझती थी कि मेरा बेटा बहादुर है, जिसके नाम से अंग्रेज सरकार भी कांपती है। मुझे नहीं पता था कि वह मौत से डरता है। यदि तुम्हें रोकर ही मरना था, तो व्यर्थ इस काम में क्यों आए।  )

तब बिस्मिल ने कहा, श्ये मौत के डर के आंसू नहीं हैं। यह माँ का स्नेह है। मौत से मैं नहीं डरता माँ तुम विश्वास करो।श् इसके बाद माँ ने शिव वर्मा का हाथ पकड़कर आगे कर दया और कहा कि पार्टी के लिए जो भी संदेश देना हो, इनसे कह दो। माँ के इस व्यवहार से जेल के अधिकारी भी अत्यन्त प्रभावित हुए। इसके बाद उनकी अपने पिता जी से बातें हुईं, फिर सब लौट पड़े।

फाँसी का दिन
19 दिसम्बर, 1927 की प्रातः बिस्मिल नित्य की तरह चार बजे उठे। नित्यकर्म, स्नान आदि के बाद संध्या उपासना की। अपनी माँ को पत्र लिखा और फिर महाप्रयाण बेला की प्रतिज्ञा करने लगे। नियत समय पर बुलाने वाले आ गए। वन्दे मातरम तथा भारत माता की जय का उद्घोष करते हुए बिस्मिल उनके साथ चल पड़े और बड़े मनोयोग से गाने लगे-

मालिक तेरी रजा रहे और तू ही तू रहे।
बाकी न मैं रहूँ न मेरी आरजू रहे।।
जब तक कि तन में जान रगों में लहू रहे।
तेरा ही जिक्र या तेरी ही जुस्तजू रहे।। 

फाँसी के तख्ते के पास पहुँचे। तख्ते पर चढ़ने से पहले उन्होंने अपनी अंतिम इच्छा व्यक्त की- अर्थात मैं ब्रिटिश साम्राज्य का नाश चाहता हूँ इसके बाद उन्होंने परमात्मा का स्मरण करते हुए निम्नलिखित वैदिक मंत्रों का पाठ किया-

ऊं विश्वानि देव सावितर्दुरितानि परासुव।
यद् भद्रं तन्न आ सुव।।

हे परमात्मा! सभी अच्छाइयाँ हमें प्रदान करो और बुराइयों को हमसे दूर करो इत्यादि मंत्रों का पाठ करते हुए वह फाँसी के फंदे पर झूल गये।

अंतिम संस्कार
जिस समय रामप्रसाद बिस्मिल को फाँसी लगी उस समय जेल के बाहर विशाल जनसमुदाय उनके अंतिम दर्शनों की प्रतीक्षा कर रहा था। जेल के चारों ओर पुलिस का कड़ा पहरा था। शव जनता को दे दिया गया। जनता ने बिस्मिल की अर्थी को सम्मान के साथ शहर में घुमाया। लोगों ने उस पर सुगन्धित पदार्थ, फूल तथा पैसे बरसाये। हजारों लोग उनकी शवयात्रा में सम्मिलित हुए। उनका अंतिम संस्कार वैदिक मंत्रों के साथ किया गया।

विशेष यह भी जाने 
अभी थोड़े समय  पहले अहिंसा और बिना खड्ग बिना ढाल वाले नारों और गानों का बोलबाला था ! हर कोई केवल शांति के कबूतर और अहिंसा के चरखे आदि में व्यस्त था लेकिन उस समय कभी इतिहास में तैयारी हो रही थी एक बड़े आन्दोलन की ! इसमें तीर भी थी, तलवार भी थी , खड्ग और ढाल से ही लड़ा गया था ये युद्ध ! जी हाँ, नकली कलमकारों के अक्षम्य अपराध से विस्मृत कर दिए गये वीर बलिदानी  जानिये जिनका आज बलिदान दिवस ! आज़ादी का महाबिगुल फूंक चुके इन वीरो को नही दिया गया था इतिहास की पुस्तकों में स्थान !  किसी भी व्यक्ति के लिए अपने मुल्क पर मर मिटने की राह चुनने के लिए सबसे पहली और महत्वपूर्ण चीज है- जज्बा या स्पिरिट। किसी व्यक्ति के क्रान्तिकारी बनने में बहुत सारी चीजें मायने रखती हैं, उसकी पृष्ठभूमि, अध्ययन, जीवन की समझ, तथा सामाजिक जीवन के आयाम व पहलू। लेकिन उपरोक्त सारी परिस्थितियों के अनुकूल होने पर भी अगर जज्बा  या स्पिरिट न हो तो कोई भी व्यक्ति क्रान्ति के मार्ग पर अग्रसर नहीं हो सकता। देश के लिए मर मिटने का जज्बा ही वो ताकत है जो विभिन्न पृष्ठभूमि के क्रान्तिकारियों को एक दूसरे के प्रति, साथ ही जनता के प्रति अगाध विश्वास और प्रेम से भरता है। आज की युवा पीढ़ी को भी अपने पूर्वजों और उनके क्रान्तिकारी जज्बे के विषय में कुछ जानकारी तो होनी ही चाहिए। आज युवाओं के बड़े हिस्से तक तो शिक्षा की पहुँच ही नहीं है। और जिन तक पहुँच है भी तो उनका काफी बड़ा हिस्सा कैरियर बनाने की चूहा दौड़ में ही लगा है। एक विद्वान ने कहा था कि चूहा-दौड़ की सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि व्यक्ति इस दौड़ में जीतकर भी चूहा ही बना रहता है।  अर्थात इंसान की तरह जीने की लगन और हिम्मत उसमें पैदा ही नहीं होती। और जीवन को जीने की बजाय अपना सारा जीवन, जीवन जीने की तैयारियों में लगा देता है। जाहिरा तौर पर इसका एक कारण हमारा औपनिवेशिक अतीत भी है जिसमें दो सौ सालों की गुलामी ने स्वतंत्र चिन्तन और तर्कणा की जगह हमारे मस्तिष्क को दिमागी गुलामी की बेड़ियों से जकड़ दिया है। आज भी हमारे युवा क्रान्तिकारियों के जन्मदिवस या शहादत दिवस पर ‘सोशल नेट्वर्किंग साइट्स’ पर फोटो तो शेयर कर देते हैं, लेकिन इस युवा आबादी में ज्यादातर को भारत की क्रान्तिकारी विरासत का या तो ज्ञान ही नहीं है या फिर अधकचरा ज्ञान है। ऐसे में सामाजिक बदलाव में लगे पत्र-पत्रिकाओं की जिम्मेदारी बनती है कि आज की युवा आबादी को गौरवशाली क्रान्तिकारी विरासत से परिचित करायें ताकि आने वाले समय के जनसंघर्षों में जनता अपने सच्चे जन-नायकों से प्ररेणा ले सके। आज हम एक ऐसी ही क्रान्तिकारी साथी का जीवन परिचय दे रहे हैं जिन्होंने जनता के लिए चल रहे संघर्ष में बेहद कम उम्र में बेमिसाल कुर्बानी दी।    

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30 जनवरी अमर बलिदानी धर्म रक्षक राणा सांगा जिन्होने 80 घाव होने के बाद भी बाबर से लडते रहे युद्ध

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नोट -भारत की आजादी में शहीद हुए वीरांगना/जवानो के बारे में यदि आपके पास कोई जानकारी हो तो कृपया उपलब्ध कराने का कष्ट करे . जिसे प्रकाशित किया जा सके इस देश की युवा पीढ़ी कम से कम आजादी कैसे मिली ,कौन -कौन नायक थे यह जान सके । वैसे तो यह बहुत दुखद है कि भारत की आजादी में कुल कितने क्रान्तिकारी शहीद हुए इसकी जानकार भारत सरकार के पास उपलब्ध नही है। और न ही भारत सरकार देश की आजादी के दीवानो की सूची संकलन करने में रूचि दिखा रही जो बहुत ही दुर्भाग्य पूर्ण है। 

महाराणा संग्राम सिंह (राणा सांगा)’ 12 अप्रैल 1484 को मालवा में मेवाड़ के सूर्यवंशी सिसोदिया राजकुल में राणा सांगा का जन्म हुआ।1507-1508 में राणा सांगा अपने पिता राणा रायमल के उत्तराधिकारी बने। इनका विवाह रानी कर्णावती से हुआ।राणा ने अपने शासन काल में निम्नलिखित युद्ध लड़े।

’ईडर के युद्ध् (1514)’
ईडर राजस्थान-गुजरातसीमा पर स्थित राठौड़ों की गद्दी थी जिसके उत्तराधिकारी रायमल थे पर भारमल उस पर अवैध रूप से काबिज था।राणा ने भारमल को पराजित कर रायमल को ईडर की कमान दिलाई।भारमल हार कर मदद के लिए गुजरात के सुल्तान मुजफ्फर के पास चला गया।ईडर की गद्दी के लिए तीसरे युद्ध में महाराणा की सेना का सामान सुल्तान मुजफ्फर द्वारा भेजे गए सैन्य अधिकारी जाहिर-उल-मुल्क से हुआ। युद्ध में जाहिर मारा गया और सुल्तान की फौज राजपूतों के आगे ज्यादा देर ना टिकी और भाग खड़ी हुई।बौखलाहट में सुल्तान अपने खास योद्धा नुसरत-उल-मुल्क को भेजता है, रायमल उसे भी पराजित कर देते हैं।

’खतौली का युद्ध 1518’
विदेशी आततायी इब्राहिम लोधी से मातृभूमि को मुक्त कराने निकली राणा की सेना ने कई ठिकानों पर कब्जे शुरू कर दिए जिसकी खबर लोधी को जब लगी तो उसने मेवाड़ के लिए कूच किया। महाराणा भी अपनी सेना के साथ उसका मुकाबला करने निकल पड़े। दोनों का आमना सामना खतौली में हुआ।निर्भीक राजपूतों के आगे सुल्तान की फौज 5 घण्टों से ज्यादा नहीं टिकी, इब्राहिम लोधी अपनी सेना के साथ भाग खड़ा हुआ। एक लोधी शहजादा बन्दी भी बनाया गया।इस युद्ध में महाराणा की बाँह कट गयी एवं एक पैर सदा के लिए बेकारहो गया।

’धौलपुर का युद्ध 1519’
इस युद्ध में राणा के साथ थे राव विरमदेव मेड़ता, रतन सिंह चुंडावत, माणिकचन्द्र चैहान, चन्द्रभान चैहान, रावल उदय सिंह, राणा अज्ज, राव रामदास, गोकलदास परमार, रावल उदय सिंह वगारी, मेदिनी राय।खतौली की हार का बदला लेने के लिए इस बार पूरी तैयारी के साथ आया था इब्राहिम लोधी। पर रणभूमि में लोधी की फौज यूँ बिखरी जैसे किसी वृक्ष की सूखी पत्तियां हों।राणा की सेना का सामना मियाँ माखन, खान फुरात, हाजी खान, दौलत खान, अल्लाहदद खान एवं यूसुफ खान की हजारों की फौज से हुआ। पर कुछ ही देर में राजपूतों की तलवारों में वो रक्तपात मचाया कि सुल्तान की सेना भागने को मजबूर हो गयी। राणा की सेना में सुल्तान की फौज को बयाना तक धकेल दिया।हुसैन खान ने दिल्ली में मुस्लिम दरबारियों पर कटाक्ष करते हुए कहा कि ष्सैकड़ों दफा लानत है कि 30,000 की फौज चंद राजपूतों से हार गयीष्इस युद्ध के बाद मालवा जिस पर मुहम्मद शाह काबिज था, उस पर राणा का आधिपत्य हो गया।

’गागरोन का युद्ध 1519’
राणा सांगा द्वारा मेदिनी राय को दी गयी जागीर पर धीरे-धीरे महमूद खिलजी काबिज होने लगा। राणा ने उसे सबक सिखाने की ठान ली औरयुद्ध के लिए चित्तौड़ से कूच किया, उनके साथ राव विरमदेव थे। राणाऔर राव का सामना हुआ महमूद खिलजी और आसिफ खान से। राजपूतों के आक्रमण से खिलजी की विशाल सेना में हाहाकार मच गयी। उसके लगभग सभी प्रमुख सैन्य अधिकारी मारे गए और तकरीबन सारी सेना का सर्वनाश हो गया। आसिफ खान का पुत्र मारा गया और महमूद खिलजी को बन्दी बना लिया गया।लेकिन परंपरागत राजपूती उदारता का परिचय देते हुए राणा ने उसे मुक्त किया एवं सम्मान सहित उसका राज्य लौटा दिया पर खिलजी ने राणा की अधीनता स्वीकार करते हुए नजराने के रूप में अपना पुश्तैनी रत्न-जड़ित मुकुट और कमरबन्द राणा को दे दिया।इतिहासकार अबू फजल ने राणा की सतत प्रशंसा की।

’गुजरात का युद्ध 1520’
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ईडर की कमान वापस राव रायमल को दिलाने एवं मुस्लिम सुल्तान से गुजरात को मुक्त कराने राणा ने युद्ध का ऐलान किया।राणा अत्यंत महत्वाकांक्षी थे, हिन्दू राष्ट्र की स्थापना उनका उद्देश्य था।कहा जाता है कि निजाम-उल-मुल्क के सामने भरे दरबार में एक बार किसी भाटध्चारण ने राणा की बहादुरी और उदारता की भूरि-भूरि प्रशंसा की जिससे खिन्न हो कर निजाम उल मुल्क ने राणा के लिए अपमानजनक शब्द कहे, इस उद्दंडता की सजा राणा निजाम को देना चाहते थे।युद्ध का आवाह्न कर राणा ने गुजरात की ओर कूच की। मुजफ्फर शाह को जैसे ही इसकी भनक लगी वो राणा का सामना किये बगैर किवाम उल मुल्क को अहमदाबाद का राजपाल बना कर मुहम्मदाबाद भाग गया।महाराणा 40000 घोड़ों और पैदल सैनिकों के साथ वागड़ पहुँचे, वहाँरावल उदय सिंह डूंगरपुर 5000 सैनिकों समेत उनके साथ हो लिए, रावविरमदेव मेड़तिया 5000 सैनिकों के साथ आये और राव गंगा ने अपने पुत्रों को 7000 सैनिकों के साथ भेजा।राणा तेजी से ईडर पहुँचे, निजाम उल मुल्क राणा के आने की सूचना पाकर अपनी डींगें भूलकर हिम्मतनगर की ओर भागा। राणा ने ईडर की कमान वापस रायमल के हाथों में दी और निजाम उल मुल्क की तलाश में निकले,राणा ने हिम्मतनगर गढ़ की घेराबन्दी करा दी, भीषण रक्तपात हुआ, इस दौरान राणा की सेना के एक शीर्ष अधिकारी डूँगर सिंह चैहान गंभीर रूप से घायल हो गए। राजपूतों ने गढ़ की सारी मुस्लिम सेना का वध करदिया पर मुबारिज उल मुल्क बच निकला। वह किले के साथ बहती हुई नदी के किनारे पर रुका, उसके साथ सुल्तान द्वारा भेजा हुआ सैन्य दस्ता था।राणा ने उन पर आक्रमण कर दिया, सुल्तान की फौज भाग छूटी और उल मुल्क अहमदनगर की ओर भागा। ब्रिटिश प्रशासक एलेग्जेंडर फोर्ब्स लिखते हैं, ष् इस्लाम के व्यूह को राजपूतों के रोष ने ध्वस्त कर दिया, सुल्तान की सेना के कई शीर्ष अधिकारी मारे गए, मुबारिज उल मुल्क गंभीर रूप से घायल होगया,उनके हाथी छीन लिए गए..फौज में हाहाकार मच गयी। राणा ने वाडनगर के ब्राह्मणों को छोड़ दिया, विसलनगर के राजपाल हातिम खान का वध किया। जब राणा ने देखा की सुल्तान अब वापस नहीं आएगा और बड़बोले निजाम उल मुल्क को भी उसकी उद्दंडता का अच्छा सबक मिल गया है तो वे चित्तौड़ लौट गये।

’खानवा का युद्ध 1527’
बाबर ने उत्तर भारत में भयंकर लूटपाट मचाई, कई निर्दोष हिंदुओं की निर्मम हत्या की। राणा ने हिन्दू राष्ट्र की स्थापना और और राष्ट्र को विदेशी आक्रमणकारियों से मुक्त कराने के उद्देश्य सेबाबर के विरुद्ध युद्ध का आवाह्न किया और बाबर को देश छोड़ने का आदेश दिया।पानीपत की लड़ाई के बाद बाबर जान चुका था कि राणा उसके लिए बहुत बड़ा खतरा थे। राणा ने आगरा की ओर कूच किया,बाबर ने धौलपुर, ग्वालियर और बयाना की ओर सैन्य टुकड़ियां भेजीं।इधर राणा के नेतृत्व में सभी राजपूत राजघराने एक हुए (जालोर, सिरोही, हाड़ौती,डूँगरपुर, धुआंधार, आमेर, मारवाड़, चन्देरी-मालवा) मेवात के मैड़ राजपूत भी राणा के साथ थे। राजपूतों की आक्रामकता और वीरता सुप्रसिद्ध थी, बाबर की सेना में भय व्याप्त था। बाबर नेराज्य की सारी मदिरा बहा दी, और सैनिकों को किसी भी प्रकार का नशाकरने से मना कर दिया ताकि युद्ध के दौरान वो कमजोर न पड़ें। बाबर ने अपनी फौज को राणा के विरुद्ध युद्ध को जिहाद बताया और दरबारियों एवं सैनिकों से कुरांन की कसमें खिलवायीं।

युद्ध -16 मार्च, 1527 फतेहपुर सीकरी के निकट खानवा।
बाबर ने रण क्षेत्र का बारीकी से निरीक्षण किया एवं योजनाबद्ध तरीके से व्यूह रचा, बंदूकधारियों एवं तोपों को स्थापित किया।यूँ तो राणा सांगा ने कई युद्ध लड़े थे और सभी जीते थे, पर वो परम्परागत तरीके से जीते युद्ध थे। राणा ने हमला बोला, जब राणा कीसेना बाबर द्वारा रचित व्यूह में फंस गई तब बाबर ने तोपों और बंदूकों से हमला करवाया। भीषण रक्तपात हुआ। अनेक राजपूत वीरगति को प्राप्त हुए, राणा गंभीर रूप से घायल हुए। 30 जनवरी 1528 को राणा ने देह त्याग दी, अखण्ड हिन्दू राष्ट्र का उनका स्वप्न उन्हीं के साथ चला गया। अंत समय में उनके शरीर पर 80 घाव थे। एक हाथ, एक पैर और एक आँख खो कर इस महाबली योद्धा ने बाबर जैसे शक्तिशाली सुल्तान से लोहा लिया और दिल्ली की सल्तनत हिला कर रख दी। अपने पूरे शासन काल में राणा ने सभी युद्ध जीते। तमाम इतिहासकारों का कहना है कि अगर बाबर के पास वो आधुनिक तोपें और बंदूकें ना होतीं तो वो राणा और राजपूतों की तलवारों को कभी पराजित नहीं कर पाता। राणा के साथ एक युग का अंत हुआ,उन जैसा महाबली कुशल सुशासक योद्धा दुबारा नहीं जन्मा। मातृभूमि की लिए अपने प्राणों की आहुति देने वाले इस शूरवीर को कोटि-कोटि नमन एवं श्रद्धांजलि।

विशेष यह भी जाने 
अभी थोड़े समय  पहले अहिंसा और बिना खड्ग बिना ढाल वाले नारों और गानों का बोलबाला था ! हर कोई केवल शांति के कबूतर और अहिंसा के चरखे आदि में व्यस्त था लेकिन उस समय कभी इतिहास में तैयारी हो रही थी एक बड़े आन्दोलन की ! इसमें तीर भी थी, तलवार भी थी , खड्ग और ढाल से ही लड़ा गया था ये युद्ध ! जी हाँ, नकली कलमकारों के अक्षम्य अपराध से विस्मृत कर दिए गये वीर बलिदानी  जानिये जिनका आज बलिदान दिवस ! आज़ादी का महाबिगुल फूंक चुके इन वीरो को नही दिया गया था इतिहास की पुस्तकों में स्थान !  किसी भी व्यक्ति के लिए अपने मुल्क पर मर मिटने की राह चुनने के लिए सबसे पहली और महत्वपूर्ण चीज है- जज्बा या स्पिरिट। किसी व्यक्ति के क्रान्तिकारी बनने में बहुत सारी चीजें मायने रखती हैं, उसकी पृष्ठभूमि, अध्ययन, जीवन की समझ, तथा सामाजिक जीवन के आयाम व पहलू। लेकिन उपरोक्त सारी परिस्थितियों के अनुकूल होने पर भी अगर जज्बा  या स्पिरिट न हो तो कोई भी व्यक्ति क्रान्ति के मार्ग पर अग्रसर नहीं हो सकता। देश के लिए मर मिटने का जज्बा ही वो ताकत है जो विभिन्न पृष्ठभूमि के क्रान्तिकारियों को एक दूसरे के प्रति, साथ ही जनता के प्रति अगाध विश्वास और प्रेम से भरता है। आज की युवा पीढ़ी को भी अपने पूर्वजों और उनके क्रान्तिकारी जज्बे के विषय में कुछ जानकारी तो होनी ही चाहिए। आज युवाओं के बड़े हिस्से तक तो शिक्षा की पहुँच ही नहीं है। और जिन तक पहुँच है भी तो उनका काफी बड़ा हिस्सा कैरियर बनाने की चूहा दौड़ में ही लगा है। एक विद्वान ने कहा था कि चूहा-दौड़ की सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि व्यक्ति इस दौड़ में जीतकर भी चूहा ही बना रहता है।  अर्थात इंसान की तरह जीने की लगन और हिम्मत उसमें पैदा ही नहीं होती। और जीवन को जीने की बजाय अपना सारा जीवन, जीवन जीने की तैयारियों में लगा देता है। जाहिरा तौर पर इसका एक कारण हमारा औपनिवेशिक अतीत भी है जिसमें दो सौ सालों की गुलामी ने स्वतंत्र चिन्तन और तर्कणा की जगह हमारे मस्तिष्क को दिमागी गुलामी की बेड़ियों से जकड़ दिया है। आज भी हमारे युवा क्रान्तिकारियों के जन्मदिवस या शहादत दिवस पर ‘सोशल नेट्वर्किंग साइट्स’ पर फोटो तो शेयर कर देते हैं, लेकिन इस युवा आबादी में ज्यादातर को भारत की क्रान्तिकारी विरासत का या तो ज्ञान ही नहीं है या फिर अधकचरा ज्ञान है। ऐसे में सामाजिक बदलाव में लगे पत्र-पत्रिकाओं की जिम्मेदारी बनती है कि आज की युवा आबादी को गौरवशाली क्रान्तिकारी विरासत से परिचित करायें ताकि आने वाले समय के जनसंघर्षों में जनता अपने सच्चे जन-नायकों से प्ररेणा ले सके। आज हम एक ऐसी ही क्रान्तिकारी साथी का जीवन परिचय दे रहे हैं जिन्होंने जनता के लिए चल रहे संघर्ष में बेहद कम उम्र में बेमिसाल कुर्बानी दी।    

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