।। दोहा ।।
जय जय सीता राम के मध्य वासिनी अम्ब ।
देहु दरस जगदम्ब अब करहु न मातु विलम्ब ।।
।। चौपाई।।
जय काली कंकाल मालिनी । जय मंगला महाकपालिनी ।।
रक्तबीज वधकारिणी माता । सदा भक्तन की सुखदाता ।।
षिरोमालिका भूषित अंगे । जय काली मधु मद्य तंरगे ।।
हर हृदयारविन्द सुविलासिनी । जय जगदम्ब सकल दुखनासिनी ।।
हृीं काली श्री महाकाराली । क्रीं कल्याणी दक्षिणकाली ।।
क्लावती जय जय विद्यावति । जय तारासुन्दरी महामति ।।
देहु सुबुद्धि हरहु दुख द्वन्द्वा । काटहु सकल जगत के फन्दा ।।
जय ओम् कारे जय हूँकारे । महाषक्ति जय अपरम्पारे ।
कमला कलियुग दर्प विनाषिनी । सदा भक्तजन की भयनाषिनी ।।
अब जगदम्ब न देर लगावहु । दुख दरिद्र सब मोर हटातहु ।।
जयति कराल काल की माता । कालानल समान द्युतिगाता ।।
जय शंकरी सुरेषि सनातनी । कोटि सिद्धि कवि मातु पुरातनी ।।
कपर्दिनी कलि कल्मष मोचनी । जै विकसित नव नलिन विलोचनी ।।
आनन्दा आनन्द निधाना। देहु मातु मोहि निर्मल ज्ञाना ।।
करूणामृत सागरा कृपामयि । होहु दुष्ट जन कहं तुम निर्दयी ।।
सकल जीव तोहि परम पियारे । सकल विष्व तव रहहिं अधारे ।।
प्रलय काल महं नर्तन कारिणि । जग जननी सब जग की पालिनी ।।
महोदरी माहेष्वरी माया । हिमगिरि सुता विष्व की छाया ।।
स्वच्छच्छरद मरद धुनि माहीं । गरजत तू ही और कोउ नाही ।।
स्फुरित मणिगणाकर प्रताने । तारागण तू व्योम विताने ।।
श्रीधाने सन्तन हितकारिणी । अग्निपाणि तुम दुष्ट विदारिणि ।।
धूम्र विलोचन प्राण विमोचिनी । शुम्भ निषुम्भ मथनि वर लोचनि ।।
सहस्रभुजी सरोरूह मालिनी । चामुण्डे मरघट की वासिनी ।।
खप्पर मध्य सुषोणित साजी । संहारेउ महिषासुर पाजी ।।
अम्ब अम्बिका चण्ड चण्डिका । सब एके तुम आदि कालिका ।।
अजा एकरूपा बहुरूपा । अकथ चरित्रा शक्ति अनूपा ।।
कलकत्ता के दक्षिण द्वारे । मूरति तोरि महेषि अपारे ।।
कादम्बरी पानरत श्यामा । जय माँतगी अनूप अकामा ।।
कमलासन वासिनी कमलायनि । जय जय श्याम जय यामायनि ।।
रासरते नवरसे प्रकृति है । जयति भक्त उर कुमति सुमति है ।।
जयति ब्रह्म षिव विष्णु कामदा । जयति अहिंसा धर्म जन्मदा ।।
जलथल नभ मण्डल में व्यापिनी । सौदामिनी मध्य आलापिनि ।।
झननन तच्छुमरिन रिन नादिनी । जय सरस्वती वीणा वादिनी ।।
ओं ऐं हृीं क्लीं श्रीं चामुण्डा । कलित कण्ठ शोभित नरमुण्डा ।।
जय ब्रह्माण्ड सिद्ध कवि माता । कामाख्या काली विख्याता ।।
हिंगुलाज विन्ध्याचल वासिनी । अट्टहासिनी अधिगण नासिनी ।।
कहं लगि अस्तुति करहुं अखण्डे । तू ब्रह्माण्ड शक्तिजित चण्डे ।।
शतमुख रावण मारनि अम्बा | करहु कृपा सब पर अवलंबा ।।
चतुर्भुजी काली तुम श्यामा । रूप तुम्हार महा अभिमाना ।।
खड्ग और खप्पर कर सोहत । सुर नर मुनि सबको मन मोहत ।।
तुम्हारी कृपा पावे जो कोई । रोग शोक नहिं ता कहं होई ।।
जो यह पाठ करै चालीसा । तापर कृपा करहिं गौरीशा ।।
।। दोहा ।।
जय कपालिनी षिवा जय जय जय जगदम्ब ।
सदा भक्तजन केरि दुख हरहु मातु अविलम्ब ।।
।। इति श्री काली चालीसा समाप्त ।।

