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जानिए कौन है वायरलेस कम्युनिकेशन के भारतीय जन्मदाता को…

 
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वायरलेस कम्युनिकेशन आज के दौर में रोजमर्रा की जरुरत सी बन गया है. सोते, जागते, उठते-बैठते किसी न किसी रुप में हम इससे जुडे़ रहते हैं. फिर चाहे वह इंटरनेट हो, रेडियो हो या फिर हम सबका फेवरेट मोबाईल फोन ही क्यों न हो!

क्या आप जानते हैं, इस उपयोगी टेक्नोलॉजी की खोज कैसी हुई और किसने की? अगर नहीं, तो यह सुनकर आपको खुशी होगी कि इसके पीछे एक भारतीय का दिमाग है. इस उड़ान को भारत के मशहूर वैज्ञानिक जगदीश चंद्र बसु ने पंख दिये थे. तो आइये जानते हैं बसु और उनकी इस खोज से जुडे़ दिलचस्प पहलुओं को:

पिता ने दिखाई विज्ञान की राह-

जिस दौर में बसु ने जन्म लिया, उस समय अपने बच्चों को इंग्लिश माध्यम के स्कूल में पढ़ाना स्टेटस सिंबल हुआ करता था. चूंकि बसु के पिता की गिनती रईसों में होती थी, इसलिए वह उन्हें अंग्रेजी के स्कूल में दाखिला दिलवा सकते थे, परंतु वह इसके खिलाफ थे. असल में वह भारतीय संस्कृति को बहुत मानते थे. उनका मानना था कि बसु अगर अंग्रेजी पढ़ेंगे तो अपनी संस्कृति भूल जायेंगे.

पिता की इसी सोच के कारण बसु ने बंगाली स्कूल में अपनी शुरुआती पढ़ाई पूरी की. उनके पिता एक सरकारी नौकर थे, इसलिए बचपन से ही उनकी रुचि सरकारी नौकरी की तरफ बढ़ने लगी थी. उनके पिता की इस पर नजर थी. वह जानते थे कि बसु नौकरी के लिए अंग्रेजी के तरफ आकर्षित हो सकते हैं, इसलिए उन्होंंने उनको समझाते हुए कहा कि वह विज्ञान की पढ़ाई करें और खुद के मालिक बने.

पिता की बात को समझकर बसु लंदन के लिए रवाना हो गए. शुरूआती दौर में उन्होंने दवाइयों की पढाई की. वह सीख तो रहे थे पर अचानक से वह बीमार होने लगे. मजबूरन उन्हें अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़ कर घर वापस आना पड़ा. सबको लगा कि दवाइयों के बीच ज्यादा रहने के कारण ऐसा हुआ. तय किया गया कि वह दवाइयों को छोड़ अब प्राकृतिक विज्ञान की पढ़ाई करेंगे और वह दोबारा लंदन चले गये.

उन्होंने वहां कैंब्रिज कॉलेज से प्राकृतिक विज्ञान में दाखिला लिया. थोड़े ही समय में वह पढ़ाई में डूब गये. उन्हें मजा आ रहा था. किताबों से उनकी दोस्ती कुछ इस तरह हो गई थी कि लोग कहने लगे थे ‘बसु तुम पागल हो जाओगे’. आगे बढ़ते हुए यहीं से उन्होंने डीएससी की डिग्री ली.

एक किताब ने बदल दी दुनिया-

अपनी पढ़ाई के दौरान उन्होंने देखा कि उस समय के कई सारे वैज्ञानिक रेडियो तरंगों की गुत्थी सुलझाने में लगे हुए थे. उस समय ऑलिवर लॉज नामक एक ब्रिटिश वैज्ञानिक ने रडियो तरंगों से जुड़ी एक खोज की. इस खोज में बताया कि रेडियो तरंगे लाइट की तरह होती हैं, जो हवा में तैर सकती हैं. इस खोज पर एक किताब भी छपी. लोगों ने बढ़-चढ़कर इस किताब को खरीदा. जगदीश ने भी यह किताब खरीदी थी. इस किताब को पढ़ने के बाद न जाने बसु को क्या हुआ कि वह इस खोज को नया आयाम देने में लग गये. काम आसान नहीं था, लेकिन वह ठान चुके थे, वह करके रहेंगे.

बसु के दिमाग में अब बस रेडियो तरंगे ही चल रही थीं. वह दिन रात हर समय बस उसी के बारे में सोचने में लगे हुए थे. रेडियो तरंगे आकार में काफी बड़ी हुआ करती थी. हालांकि इन्हें देख नहीं सकते थे, पर कुछ उपकरणों की मदद से इन्हें मापा जा सकता था. यही कारण था कि यह रेडियो तरंगे सिर्फ थोड़ी दूरी तक ही जा पाती थीं.

बसु ने आखिरकार इसका इलाज भी ढूंढ लिया. उन्होंने इन तरंगों का आकार थोड़ा सा छोटा कर दिया. उन तरंगों को मिलीमीटर वेव भी कहा जाता है. रेडियो की तरंगों को बनाने से ज्यादा मुश्किल काम था, उसका रिसीवर बनाना. रिसीवर ही वह चीज थी जो उन तरंगों को पकड़कर उनके हिसाब से प्रतिक्रिया करता. वह पूरी शिद्दत से इस रिसीवर को बनाने में जुट गए. उन्हें पता था कि बिना इसके वह अपनी खोज को पूरी नहीं कर सकते. अंतत: वह रिसीवर बनाने में भी सफल हो गये.

अब बस इस रिसीवर के प्रयोग की बारी थी. बसु ने जैसे ही अपने आविष्कार को आजमाकर देखा तो वह हैरान हो गए. उनका बनाया रिसीवर रेडियो तरंगों को पकड़ रहा था. उस समय तो वह जरा सी दूरी तक ही सीमित था, पर अब वह उसे और आगे तक ले जाना चाहते थे.

1895 में कोलकाता के एक कॉलेज में वह अपनी खोज को दर्शाने गए. उन्होंने रेडियो तरंगो की मदद से एक घंटी को बजाया. घंटी जगदीश से 75 फीट दूर थी और उसके बीच में दीवारें थी. लोग यह देखकर हैरान थे कि आखिर दीवारों के पार से वह तरंग गई कैसे! इस खोज ने बसु को विज्ञान की दुनिया में मशहूर कर दिया था.

मार्कोनी की एंट्री और रेडियो संचार की खोज-

अपनी खोज को लेकर बसु लंदन में एक सभागार में लेक्चर दे रहे थे. यहां वैज्ञानिकों का एक समूह मौजूद था. इसी में मार्कोनी भी मौजूद थे. वह ब्रिटिश डाक के लिए एक ऐसी ख़ोज में लगे थे, जिससे वह तरंगों के जरिये कोई सन्देश भेज सकें. वह बसु से इम्प्रेस हुए फिर दोनों दोस्त बन गये. मार्कोनी ने बसु को अपने प्रयोग के बारे में बताया, तो बसु को लगा कि यह किया जा सकता है.

इसी के साथ वह अपने नए मिशन पर निकल पड़े. वह समाज के लिए यह खोज करना चाहते थे. उनका मानना था कि यह खोज लोगों के लिए बहुत लाभकारी हो सकती थी, जिसे लोग आसानी से इस्तेमाल कर सकते थे. आखिरकार 1899 में वह इसमें कामयाब हो गये. उनका यह आविष्कार लंदन ‘रॉयल सोसाइटी’ के एक संस्करण में छपा.

सभी उनके इस खोज से अचंभित थे. मार्कोनी ने भी इसे पढ़ा. माना जाता है कि वह चोरी-छिपे बसु की खोज से रेडियो संचार का आविष्कार करने लगे थे. बसु के बनाए यंत्र से उन्हें अपना काम करने में आसानी हो गई. ऐसी धारणाएं हैं कि मार्कोनी का एक बचपन का दोस्त था, जिसने उसे इस यंत्र को और अच्छे से बनाकर दे दिया था.

चोरी हो चुकी थी बसु की खोज!-
मार्कोनी ने जैसे ही उस रिसीवर को अपने रेडियो संचार के यंत्र के साथ लगाया, वह काम करने लगा. मार्कोनी अब फूले नहीं समा रहे थे. शायद उन्हें पता चल गया था कि उनके हाथ क्या लग चुका है. 1901 में बसु के उस यंत्र पर मार्कोनी ने कब्ज़ा कर लिया था. अब वह तैयार थे दुनिया के सामने रडियो तरंगो से संदेश भेजने को. फिर आखिर में उन्होंने संदेश भेज ही दिया. बसु के जिस यंत्र ने अभी तक 75 फीट की दूरी तय की थी. मार्कोनी ने उसी यंत्र का इस्तेमाल करके दूरी को 2000 मील तक पहुंचा दिया. मार्कोनी मशहूर हो चुके थे. इस खोज के लिए वह नोबेल पुरस्कार लेने मे भी कामयाब रहे.

बसु जिन्होंने इस यंत्र के बेसिक तैयार किये थे. उनका नाम कहीं नहीं था. वह किसी से कुछ कह भी नहीं सकते थे, क्योंकि उन्होंने अपने किसी भी अविष्कार का पेटेंट नहीं कराया था. कानूनन उनका अपनी ही खोज पर कोई हक नहीं था. उसके बाद कोई भी नहीं जान पाया कि वह खोज आख़िर बसु की थी. सारी दुनिया ने इसे मार्कोनी के नाम से जाना.

इस खोज के सही हकदार बसु थे, लेकिन उन्हें वह सम्मान नहीं मिला, जो मिलना चाहिए था. बसु ने भारत आकर देश के लिए कई सारे अन्य योगदान दिए, जिनके लिए देश के लोग उनको अपने सिर आंखों पर बैठातै हैं.


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