एस्पिरिन की खोज मानव जगत के स्वास्थ्य के लिए एक वरदान है। इसके तत्व की मौजूदगी की सबसे पहले खोज, 1763 ई० में वाडहम कॉलेज, यूनिवर्सिटी ऑफ ऑक्सफोर्ड के प्रोफेसर एडवर्ड स्टोर ने विलो ट्री (Willow Tree) के छाल में की। उन्होंने इसकी सेलीसाइलिक एसिड (salicylic acid) के रूप में पहचान की।
इसकी पहचान के एक सौ छत्तीस वर्ष बाद, जर्मनी के केमिस्ट वैज्ञानिक डॉ० फेलिक्स हॉफमैन ने 1899 में इसकी उपयोगिता पर रिसर्च करते हुए इसे जीवनरक्षक बहुपयोगी दवा के रूप में घोषित किया। जर्मनी की दवा निर्माता कम्पनी बेयर (Bayer) ने इसे एस्पिरिन के रूप में पेटेन्ट कराया। उसके बाद एस्पिरिन, बेयर कम्पनी का रजिस्टर्ड ट्रेडमार्क बन गयी।
एस्पिरिन का इस्तेमाल-बदन दर्द निवारक, बुखार, सूजन, हृदयाघात, सर्जरी के बाद की मेडिसन, कैंसर से बचाव, वगैरह अनेक रोगों में होता है। यह एनेलजेसिक (analgesic) औषधि है। साधारण दर्द, दुखन में कारगर तो है ही, सबसे महत्वपूर्ण इसका कार्य रक्त धमनियों के बहाव नियंत्रण को दुरस्त रखने में है। यह रक्त बहाव की रूकावटों को दूर करती है। इसका साधारण मात्रा में नित्य सेवन रक्त के थक्के जमने, हार्ट अटैक और कैंसर की सम्भावना को दूर रखता है। इसका इस्तेमाल पूरे विश्व में एलोपैथ चिकित्सा में होता है। एक अनुमान के अनुसार इसकी विश्वस्तरीय खपत को देखते हुए इसका उत्पादन 40,000 टन प्रतिवर्ष होता है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने इसे आवश्यक औषधि की सूची में डालते हुए इसे मानव स्वास्थ्य के लिए सबसे महत्वपूर्ण औषधि की श्रेणी में घोषित कर रखा है।

