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हरा दुपट्टा-लघुकथाएँ त्रिलोक सिंह ठकुरेला

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रेलगाड़ी में उस दिन कुछ ज्यादा ही भीड़ थी, इसलिए सरोज को खड़े होकर यात्रा करनी पड़ रही थी । उसे दो स्टेशन बाद ही उतरना था। उसके पास ही अपने चार बच्चों के साथ बुर्के में एक महिला बैठी थी।

बुर्के बाली महिला की नज़र सरोज गयी तो लगा कि वह उसे पहचानने की कोशिश कर रही है। बुर्के वाली महिला ने सरोज को अपने पास बुलाते हुए सीट पर जगह दी। फिर पूछा कि 'क्या तुम सरोज हो। '

सरोज ने 'हाँ ' में सर हिलाया तो वह सरोज से लिपट गयी। बुर्का हटाते हुए उसने प्रश्नों की झड़ी लगा दी -- '' सरोज ,बहुत सालों बाद मिली हो। कैसी हो ? शादी हो गयी ? अंकल आंटी कैसे हैं ?''
देखते ही सरोज भी खुशी से झूम उठी - '' रूबिया , तुम ?''
'' हाँ , सरोज '' रूबिया ने कहा।
''अरे , तुम अचानक कहाँ गायब हो गयीं थीं ? कालेज छोड़ने के बाद तुम्हारी कोई खोज खबर ही नहीं मिली। ''
'' सरोज , अब्बा दंगों की भेंट चढ़ गये तो हमने शहर ही छोड़ दिया और अपने अंकल के पास सूरत चले गये। अब अम्मी भी नहीं रहीं। ''
'' रूबिया, बहुत दुःख हुआ। बीस साल में मैं तुम्हें कभी नहीं भूली। तुम्हारी याद बराबर आती रही। ''
''तो मैं भी तुम्हें कब भूल पायी , सरोज। तुम्हारा दिया दुपट्टा हमेशा अपने पास रखती हूँ। ''
यह कहकर रूबिया ने अपने छोटे से बैग से हरा दुपट्टा निकाला और हवा में लहरा दिया। यह दुपट्टा वर्षों पूर्व सरोज ने रूबिया को दिया था।
ख़ुशी के अतिरेक में थोड़ी देर के लिए दोनों नि:शब्द हो गयीं। आत्मीयता की गंध हरे दुपट्टे से निकलकर पूरे कम्पार्टमेंट में फ़ैल चुकी थी।

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