बथुआ भारत के इतिहास में काफी महत्व रखता है. इसके प्राचीन मौसमी हरे रंग को ध्यान में रखते हुए, बथुए को अन्य साग की तरह ही तैयार किया जाता है। इसके समृद्ध स्वाद और स्वास्थ्य गुणों को देखते हुए व्यापक रूप से इसका सेवन किया जाता है। बथुए के साग की सबसे ज्यादा खेती राजस्थान और हिमाचल के क्षेत्रों में होती है इसके अलावा इसकी कुछ खेती मैदानी क्षेत्रो में भी किया जाता है जहाँ काफी लोकप्रिय है । जहां से देश भर में साग पहुँचाया जाता है। बथुआ के पत्ते सर्दियों के महीनों में 4,700 मीटर तक की ऊंचाई पर विशेष रूप से पाए जाते हैं। यहां हम आपको बताते हैं मौसम निकलने से पहले आपको इसका सेवन क्यों करना चाहिए।
किनोवा बथुआ प्रजाति का सदस्य है जिसका वनस्पति नाम चिनोपोडियम किनोवा है ग्रामीण क्षेत्र में शब्द उच्चारण के कारण इसे किनोवा, केनवा आदि कई नाम से बताया जाता है। इसकी खेती मुख्य रूप से दक्षिण अमेरिकी देशों में की जाती है। जिसमें इंग्लैंड, कनाडा, आस्टेलिया, चाइना, बोलिविया, पेरू इक्वाडोर आदि| किनोवा की खेती इस फसल को रबी के मौसम में उगाया जाता है। इसका उपयोग गेहूँ चावल सूजी की तरह खाने में किया जाता है।
बथुए में पाए जाने वाले पोषक तत्व
- विटामिन ए और डी
- फ़ास्फ़रोस
- कैल्शियम
- पोटैशियम
- नाइट्रोजन
- कार्बोहायड्रेट
- लौह तत्व
- कैरोटिन
- खनिज लवण
- थायेमिन
औषधीय गुणों से भरपूर बथुआ-
बथुआ एक ऐसी सब्जी है जिसके गुणों से ज्यादातर लोग अपरिचित हैं। ये छोटा-सा दिखने वाला हराभरा पौधा काफी फायदेमंद होता है, सर्दियों में इसका सेवन कई बीमारियों को दूर रखने में मदद करता है। बथुए में आयरन प्रचुर मात्रा में होता है, बथुआ न सिर्फ पाचनशक्ति बढ़ाता बल्कि अन्य कई बीमारियों से भी छुटकारा दिलाता है। गुजरात में इसे चील भी कहते है। बथुआ एक ऐसी सब्जी या साग है, जो गुणों की खान होने पर भी बिना किसी विशेष परिश्रम और देखभाल के खेतों में स्वत: ही उग जाता है। एक डेढ़ फुट का यह हराभरा पौधा कितने ही गुणों से भरपूर है। आयुर्वेदिक विद्वानों ने बथुआ को भूख बढ़ाने वाला पित्तशामक मलमूत्र को साफ और शुद्ध करने वाला माना है। यह आंखों के लिए उपयोगी तथा पेट के कीड़ों का नाश करने वाला है। यह पाचनशक्ति बढ़ाने वाला, भोजन में रुचि बढ़ाने वाला पेट की कब्ज मिटाने वाला और स्वर (गले) को मधुर बनाने वाला है। गुणों में हरे से ज्यादा लाल बथुआ अधिक उपयोगी होता है। इसके सेवन से वात, पित्त, कफ के प्रकोप का नाश होता है और बल-बुद्धि बढ़ती है। लाल बथुआ के सेवन से बूंद-बूंद पेशाब आने की तकलीफ में लाभ होता है। टीबी की खांसी में इसको बादाम के तेल में पकाकर खाने से लाभ होता है। नियमित कब्ज वालों को इसके पत्ते पानी में उबाल कर शक्कर (चीनी नहीं) मिला कर पीने से बहुत लाभ होता है। यही पानी गुर्दे तथा मसाने के लिए भी लाभकारी है। इस पानी से तिल्ली की सूजन में लाभ होता है। सूजन अधिक हो तो उबले पत्तों को पीसकर तिल्ली पर लेप लगाएं। लाल बथुआ हृदय को बल देने वाला, फोड़े-फुंसी, मिटाकर खून साफ करने में भी मददगार है। बथुआ लीवर के विकारों को मिटा कर पाचन शक्ति बढ़ाकर रक्त बढ़ाता है। शरीर की शिथिलता मिटाता है। लिवर के आसपास की जगह सख्त हो, उसके कारण पीलिया हो गया हो तो छह ग्राम बथुआ के बीज सवेरे शाम पानी से देने से लाभ होता है। बीजों को सिल पर पीस कर उबटन की तरह लगाने से शरीर का मैल साफ होता है, चेहरे के दाग धब्बे दूर होते हैं। तिल्ली की बीमारी और पित्त के प्रकोप में इसका साग खाना उपयोगी है। इसका रस जरा-सा नमक मिलाकर दो-दो चम्मच दिन में दो बार पिलाने से पेट के कीड़ों से छुटकारा मिलता है। पत्तों के रस में मिश्री मिला कर पिलाने से पेशाब खुल कर आता है। इसका साग खाने से बवासीर में लाभ होता है। पखाना खुलकर आता है। दर्द में आराम मिलता है। इसके काढ़े से रंगीन तथा रेशमी कपड़े धोने से दाग धब्बे छूट जाते हैं और रंग सुरक्षित रहते हैं। अरुचि, अर्जीण, भूख की कमी, कब्ज, लिवर की बीमारी पीलिया में इसका साग खाना बहुत लाभकारी है। सामान्य दुर्बलता बुखार के बाद की अरुचि और कमजोरी में इसका साग खाना हितकारी है। धातु दुर्बलता में भी बथुए का साग खाना लाभकारी है।
बथुआ की खेती के लिए उपयोगी मिट्टी
अधिक्तर क्षेत्र में काले बीज वाला बथुआ खरपतवार के रूप में गेहूं, चना, मेथी आदि के साथ उपजता है। सफ़ेद बीज वाले क्विनोआ की खेती की जाती है। काले बीज वाला बथुआ, खरपतवार के रूप हर प्रकार की मिट्टी में पनपता है। अतः आप किसी भी मिटटी में बथुवे की खेती कर सकते है।
कैसे करें खेत की तैयारी
खेत की तैयारी के लिए खेत को अच्छी तरह से 2 और 3 बार जुताई करके मिट्टी को भुरभुरा बना लेना चाहिए अंतिम जुताई से पहले खेत में 5,6 टन प्रति हेक्टेयर की दर से गोबर की खाद मिला देना चाहिए फिर उचित जल निकासी की व्यवस्था करनी चाहिए।
कब करें किनोवा की बुआई
इसकी बुआई अक्तूबर, फरवरी, मार्च और कई जगह जून-जुलाई में भी की जाती है | इसका बीज बहुत ही छोटा होता है इसलिए प्रति बीघे में 400 से 600 ग्राम पर्याप्त होता है इसकी बुआई कतारों में और सीधे बिखेर कर भी कर सकते है। इसका बीज खेत की मिट्टी में 1.5 सेमी से 2 सेमी तक गहरा लगाना चाहिए जब इसके पौधे 5,6 इंच के हो जाये तब पौधे से पौधे के बीच की दूरी 10 से 14 इंच बना लेनी चाहिए| अन्य पौधे को हटा देना चाहिए।
सिचाई और खरपतवार
बुआई के तुरंत बाद सिचाई कर देना चाहिए इसके पौधे को बहुत ही कम पानी की आवश्यकता होती है फसल लगाने से काटने तक 3 से 4 बार पानी देना पर्याप्त रहता है। जब पौधे छोटे रहे तब खरपतवार को निकलवा देना चाहिए कीट और रोग प्रबंधन किनोवा के पौधे में कीटो और रोगों से लड़ने की बहुत ज्यादा क्षमता रहती है साथ ही पाले और सूखे को भी सहन कर सकते है। अभी तक इस पर किसी भी प्रकार के रोगों की जानकरी नही मिली है।
फसल की कटाई और कढाई
बथुआ की फसल 100 दिनों में तैयार हो जाती है अच्छी विकसित फसल में आसानी से बीज को निकालने के कुछ दिनों की धुप आवश्यक होती है ।
किनोवा (बथुआ ) की मुख्य बातें
अन्तराष्ट्रीय बाज़ार में इसका भाव 50 से 100 रुपये किलो तक है
100 ग्राम किनोवा में 14 ग्राम प्रोटीन, 7 ग्राम डायटरी फाइबर 197 मिली ग्राम मैग्नेशियम 563 मिली ग्राम पोटेशियम 5 मिली ग्राम विटामिन B पाया जाता है।
- इसका प्रतिदिन सेवन करने पर हार्ट अटेक, कैंसर और सास सम्बन्धित बीमारियों में लाभ मिलता है।
- कम पानी और कम खर्च में अच्छा लाभ देने वाली फसल है।
- इसके पत्तों की भांजी बना कर भी खाया जा सकती है।
- यह खून की कमी को दूर करता है|

