जनपद गोंडा उत्तर प्रदेश के परसपुर क्षेत्रान्र्तगत माँ आदि शक्ति के 108 स्वरूपों में माँ वाराही का 57 रूप है। जो हाथ में खड्ग और भैंसे पर सवार होकर माँ वाराही ने रक्तवीज नामक महादैत्य का संहार किया था। और सुर मुनि देव सभी हर्षित हो उठे। जगत के सभी प्राणी नर नारी खुशी से उछल पडे। शास्त्रों अनुसार- जब जब पृथ्वी पर असुर, दैत्य, निशाचरों का घोर अत्याचार बढा, पाप के बोझ बढ गए, विश्व मण्डल में सभी प्राणी त्राहि-त्राहि करने लगे। सुर मुनि देवता सभी माँ आदि शक्ति के सानिध्य पहुंचकर स्तुति करने लगे।
हे माँ अवतार लो ...... माँ अवतार लो ... योगमाया जगत जननी प्रकट हुई
वर्तमान में शक्तिपीठं माँ वाराही धाम जग प्रसिद्ध है। जनपद गोण्डा मुख्यालय से 27 किमी. दक्षिण, पतित पावन माँ सरयू नदी के समीपस्थ स्थित बेलसर ब्लॉक के तहत ग्राम मुकुंदपुर में माँ वाराही का दरबार है।
जहाँ प्रतिवर्ष शारदीय व वसन्तीय नवरात्रि बेला के साथ साथ प्रति शुक्र व सोमवॉर को श्रद्धालुओं की अपार भीड उमडती है। पूजा- पाठ, परिक्रमा, प्रसाद, चढावा को माँ भक्तों का ताँता लग जाता है। चारों तरफ से वट-वृक्ष की लताओं से घिरा माँ भवानी का भवन अत्यंत ही सुरम्य, मनोरम व रमणीक धार्मिक स्थल है। यहाँ दूर दराज ग्रामीण अंचलों समेत गैर जनपद से आये हुए माँ भक्तों के आस्था व धार्मिक अनुष्ठान का केंद्र बना हुआ है। माँ वाराही का महात्म्य प्रचलित है कि आँखों से ग्रसित मानव प्राणी माँ वाराही देवी का दर्शन पूजा के साथ वाराही नीर का नियमित प्रयोग करने से असाध्य नेत्र की पीडा, अंधापन दूर हो जाता है।
पारिवारिक कलह, मानसिक कष्ट से मुक्ति मिलती है। माँ वाराही धाम पहुँच सुगम मार्ग - जनपद गोण्डा मुख्यालय से बस वाहन मार्ग 27 किमी बेलसर बाजार होकर उमरी बेगमगंज होते हुए श्रद्धालु माँ वाराही धाम पहुँचते हैं। वहीं वाराह क्षेत्र संगम सुकर खेत पसका के लिये जनपद (गोण्डा) मुख्यालय से दक्षिण दिशा में बस वाहन मार्ग 36 किमी परसपुर बाजार होकर पसका वाराह देव होकर वाराही धाम का दुर्गम मार्ग है। जी हाँ, एक ऐसा पावन धाम मंदिर जहाँ माँ के दर्शन व नीर के उपयोग से असाध्य नेत्र पीड़ा से निजात मिलती है। महात्म चर्चा के अनुसार- नेत्र की पीड़ा से ग्रसित भक्त माँ के दर्शन करते हैं। और नीर का प्रयोग कर आँख की पीड़ा से मुक्ति पाकर प्रसन्न होते हैं। उत्तर प्रदेश के देवीपाटन मण्डल में गोण्डा जिले की कर्नलगंज क्षेत्र के मुकुन्दपुर गांव में बने ऐतिहासिक मां वाराही देवी के मंदिर में नवरात्र में प्रतीकात्मक नेत्र चढ़ाने के लिए दूर दराज से आए श्रद्धालुओं की दर्शनार्थ भीड़ जुटती है। और दर्शन कर भक्तजन मां वाराही की कृपा पाते हैं।
वाराह पुराण के मतानुसार -
हिरण्य कश्यप के भ्राता हिरण्याक्ष का वध करने के लिए भगवान विष्णु ने वाराह अवतार लिया। तो पाताल लोक जाने के लिए आदिशक्ति की उपासना की। मुकुन्दपुर में सुखनोई (वर्तमान सरयू) नदी के तट पर मां वाराही देवी अवतरित हुई। इस मन्दिर में एक सुरंग स्थित है। जिसके विषय में माना जाता है कि भगवान वाराह ने पाताल लोक तक इसी सुरंग के रास्ते तय किया था। और हिरण्याक्ष का वध किया था। इस घटना के पश्चात से ही यह मन्दिर प्रकाश में आया। मंदिर चारों ओर से वट वृक्ष की शाखाओं से घिरा हुआ है। जिससे ज्ञात होता है कि यह मंदिर पुरातन काल से ही स्थित है। जानकारों का मानना है कि वर्तमान समय में भी सुरंग मौजूद है। सुरंग के गर्भगृह में अखण्ड ज्योति प्रज्जवलित रहती है। इस सुरंग की गहराई आज तक मापी नहीं जा सकी। मां वाराही का दर्शन पूजन करने वाले को आयु और यश की प्राप्ति होती है।
एवं मांगी गई मन्नत निश्चित ही पूरी होती है। लोक मान्यताओं के अनुसार- यहां प्रतीकात्मक नेत्र चढ़ाने से आंखों की विभिन्न जटिल बीमारियों का निवारण होता है। वाराह भगवान की इच्छा से पसका सूकर खेत के निकट मुकुन्दपुर गांव में वाराही देवी प्रकट हुई थी। तभी भगवान विष्णु के नाभि कमल पर विराजमान ब्रह्मा और मां सतरुपा ने देवी के अवरित होने पर भवानी अवतरी का उद्घोष किया। तभी से इस पवित्र मन्दिर को उत्तरी भवानी के नाम से भी जाना जाता है। चैत्र व आश्विन माह के नवरात्रि, तीज त्यौहार समेत हर शुक्र व सोमवार को श्रद्धालुओं का विशाल मेला लगता है।
जहाँ स्थानीय मेलार्थियों समेत गैर जिलों के दर्शनार्थियों का सैलाब उमड़ता है। क्षेत्र की जटिल समस्याएं जनपद का गौरव, ऐतिहासिक व धार्मिक पौराणिकता को संजोये वाराह क्षेत्र प्रशासनिक उपेक्षा का शिकार है। सडक साधन व विकास की गतिविधियों में काफी पिछडा यह क्षेत्र विकास की राह निहार रहा है। आस पास की सडकों की स्थिति दयनीय है। जर्जर व क्षतिग्रस्त सडकें, खराब सरकारी हैण्डपम्प क्षेत्र की मूल पहचान है। जन प्रतिनिधि प्रतिवर्ष क्षेत्र के अमन चैन, खुशहाली व विकास की सौगन्ध संकल्प लेते हैं। परंतु समय बीतते ही सभी ढाक के तीन पात होकर रह जाता है। नव रात्रि पर्व को लेकर माँ वाराही दरबार में श्रद्धालुओं का भव्य मेला लगा हुआ है। मनोवांक्षित फल की कामना को लेकर श्रद्धालु माँ वाराही धाम में पूजा, पाठ, हवन, कथा, भागवत, मानस पाठ, प्रतिष्ठा व भण्डारा समेत माँ के गगन भेदी जयकारे से सम्पूर्ण वाराह क्षेत्र गुंजायमान है।



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