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कालमेघ की उन्नत खेती कैसे करें ?

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कालमेघ एक महत्वपूर्ण औषधीय पौधा है . इसे कडू चिरायता व भुईनीम के नाम से जाना जाता है . इसका वास्तविक नाम एंड्रोग्राफिस पेनिकुलेटा है . यह एकेन्थेसी कुल का सदस्य है . यह हिमालय में उगने वाली वनस्पति चिरायता (सौरसिया चिरायता) के समान होता है . कालमेघ शुष्क जलवायु वाले क्षेत्रों के वनों में प्राकृतिक रूप में पाया जाता है . यह एक शाकीय पौधा है . इसकी ऊँचाई 1 से 3 फीट होता है . इसकी छोटी – छोटी फल्लियों में बीज लगते हैं . बीज छोटा व भूरे रंग का होता है | इसके पुष्प छोटे श्वेत रंग या कुछ बैगनी रंगयुक्त होते हैं .

कालमेघ का पौधा एक महत्वपूर्ण औषधीय पौधा होता है. इसके मुख्य तने से सिर्फ चार शाखाएं निकलती है. और शाखाओं पर भी चार चार शाखाएं निकलती है. जिन पर इसके फूल निकलते हैं. इसके फूलों का रंग गुलाबी होता है. कालमेघ के पौधों के सभी भाग इस्तेमाल के योग्य होते हैं. इसका पौधा एक बार लगाने के बाद काफी टाइम तक पैदावार देता है.

कालमेघ का पौधा एक औषधीय पौधा होने के कारण इसका उपयोग आयुर्वेदिक, होम्योपैथिक और एलोपैथिक दवाइयों के बनाने में किया जाता है. कालमेघ की पत्तियों का इस्तेमाल जांडिस, रक्तशोधक, पेचिश, सिरदर्द, विषनाशक और पेट संबंधित बीमारियों में किया जाता है. और इसकी जड़ों का उपयोग भूख बढ़ाने की दवाओं में किया जाता है.

कालमेघ का पौधे के लिए गर्म और आद्र जलवायु उपयुक्त होती है. भारत में इसकी खेती राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक और केरल में की जाती है. इसकी खेती के लिए बारिश का होना अच्छा होता है. बारिश के मौसम में इसका पौधा अच्छे से वृद्धि करता है. इसकी खेती के लिए जमीन का पी.एच. मान सामान्य होना चाहिए. अगर आप भी इसकी खेती करने का मन बना रहे है तो आज हम आपको इसकी खेती के बारें में सम्पूर्ण जानकारी देने वाले हैं.

उपयुक्त मिट्टी-

कालमेघ की खेती के लिए अच्छे जल निकासी वाली बलुई मिट्टी सबसे उपयुक्त होती है. जबकि इसकी खेती काली चिकनी और कठोर जल भराव वाली भूमि में नही की जा सकती. इसकी खेती के लिए जमीन का पी.एच. मान सामान्य होना चाहिए.

जलवायु – 
यह समुद्र तल से लेकर 1000 मीटर की ऊँचाई तक समस्त भारतवर्ष में पाया जाता है . पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, बिहार, आंध्रप्रदेश, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश,गुजरात तथा दक्षिण राजस्थान के प्राकृतिक वनों में प्रचुर मात्रा में पाया जाता है . उष्ण, उपोष्ण व गर्म आद्रता वाले क्षेत्र जहां वार्षिक वर्षा 500 मि.मी. से 1400 मि.मी. तक होती है तथा न्यूनतम तापमान 5˚C से 15˚C तक होता है एवं अधिकतम तापमान न 35˚C से 45˚C तक हो, वंहा अच्छी प्रकार से उगाया जा सकता है .

उन्नत किस्में-

कालमेघ के पौधे की ज्यादा किस्में विकसित नही की गई हैं. इसकी दो प्रमुख किस्में हैं. जिन्हें ज्यादातर किसान भाई उगाते हैं. इन दोनों किस्मों को उपज के आधार पर तैयार किया गया है.

सिम मेघा-
इस किस्म को केन्द्रीय औषधीय तथा सुगंधित पौधा संस्थान, लखनऊ द्वारा तैयार किया गया है. इस किस्म की पैदावार ज्यादा पाई जाती है. इस किस्म के पौधों से प्रति हेक्टेयर 3 से 4 टन तक सुखी हुई शाखाएं प्राप्त हो जाती हैं. इस किस्म में पौधों को जून के महीने में उगाना अच्छा है. जिसकी साल में दो बार कटाई की जा सकती है. इसका पौधा रोपाई के 120 दिन बाद कटाई के लिए तैयार हो जाता है.

आनंद कालमेघा 1-
इस किस्म को आनंद एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी, गुजरात द्वारा तैयार किया गया है. इस किस्म के पौधे सामान्य रूप से दो से तीन फिट तक पाए जाते हैं. जिनका प्रति एकड़ उत्पादन 22 से 25 क्विंटल के आसपास पाया जाता है. इस किस्म के पौधे 120 से 140 दिन में कटाई के लिए तैयार हो जाते हैं.

खेत की तैयारी-

कालमेघ की खेती के लिए शुरुआत में खेत की मिट्टी पलटने वाले हलों से गहरी जुताई करें. उसके बाद खेत में पुरानी गोबर की खाद या कम्पोस्ट खाद की उचित मात्रा को डालकर उसे अच्छे से मिट्टी में मिला दें. खाद को मिट्टी में मिलाने के बाद खेत में पानी छोड़कर उसका पलेव कर दें. जिससे खेत में खरपतवार निकल आती है. खरपतवार निकलने के बाद खेत की फिर से तिरछी जुताई कर एक दिन के लिए खुला छोड़ दें. उसके बाद खेत में पाटा लगाकर भूमि को समतल बना लें.

पौध तैयार करना-
कालमेघ की खेती के लिए बीज को सीधा खेतों में नही उगाया जाता. इसके लिए पहले पौध तैयार की जाती है. जिनको नर्सरी में तैयार किया जाता है. नर्सरी में इसकी पौध तैयार करने के लिए पहले क्यारियों की अच्छे से जुताई कर उनमें गोबर की पुरानी खाद या कोई भी अन्य जैविक खाद को डालकर उसे अच्छे से मिट्टी में मिला दें. उसके बाद उचित लम्बाई और चौड़ाई की क्यारी तैयार कर लें.

इन क्यारियों में इसके बीजों को 5 सेंटीमीटर की दूरी रखते हुए लगा दें. बीज की रोपाई से पहले उसे गोमूत्र से उपचारित कर लें. एक हेक्टेयर खेत की पौध तैयार करने के लिए 400 ग्राम बीज काफी होता है. बीजों की रोपाई मई माह में करना सबसे उपयुक्त होता है. बीज की रोपाई करने के बाद क्यारियों में नमी बनाए रखने के लिए इनकी लगातार उचित समय पर सिंचाई करते रहना चाहिए. बीज रोपाई के लगभग 40 से 45 दिन बाद पौध बनकर तैयार हो जाती है. इसकी पौध जब 10 सेंटीमीटर लम्बाई की हो जाएँ तब इन्हें खेतों में लगाया जाता है.

पौध रोपाई का टाइम और तरीका-
कालमेघ के पौधों की रोपाई जून और जुलाई माह में करनी चाहिए. क्योंकि जून माह से मानसून शुरू हो जाते हैं. जिससे पौधे को अंकुरित होने के लिए उचित वातावरण मिलता है. उसके बाद होने वाली बारिश की वजह से इसके पौधों को सिंचाई की भी जरूरत नही होती.

खेतों में इसके पौधे की रोपाई समतल और मेड दोनों पर की जा सकती है. समतल पर इसकी रोपाई 30 गुना 15 सेंटीमीटर की दूरी पर पंक्ति में करनी चाहिए. जबकि मेड पर इसकी रोपाई 40 गुना 20 सेंटीमीटर पर करनी चाहिए.

पौधों की सिंचाई-
कालमेघ का पौधा बारिश पर ज्यादा निर्भर होता है. इस कारण एक बार की जाने वाली इसकी खेती के लिए ज्यादा सिंचाई की जरूरत नही होती. लेकिन अगर जरूरत पड़े तो इसकी दो से तीन सिंचाई कर देनी चाहिए. और अगर इसकी खेती बहुवर्षीय तौर पर की जा रही हो तो इसके पौधों की आवश्यकता के आधार पर साल भर में 6 से 8 सिंचाई कर सकते हैं.

उर्वरक की मात्रा-
कालमेघ की खेती औषधीय पौधे के रूप में की जाती है. इस कारण इसकी खेती में रासायनिक उर्वरक का इस्तेमाल नही करना चाहिए. इसकी खेती में केवल जैविक उर्वरक का इस्तेमाल अच्छा होता है. जैविक उर्वरकों के रूप में एक हेक्टेयर में 15 टन पुरानी गोबर की खाद या 2.5 क्विंटल कम्पोस्ट खाद का इस्तेमाल किया जाता है. लेकिन अगर कोई किसान भाई रासायनिक खाद का इस्तेमाल करना चाहता है तो प्रति हेक्टेयर 150 किलो एन.पी.के. की मात्रा को खेत में आखिरी जुताई के वक्त देना चाहिए.

खरपतवार नियंत्रण-
कालमेघ की खेती में खरपतवार नियंत्रण सबसे जरूरी होता है. इसके लिए खेत की नीलाई गुड़ाई कर खरपतवार नियंत्रण किया जाना चाहिए. पौध लगाने के लगभग 20 से 25 दिन बाद खेत की पहली गुड़ाई कर दें. उसके बाद 20 दिन के अंतराल में दो गुड़ाई और कर दें. जब इसके पौधे मानसून के बाद बड़े होकर जमीन को घेर लेते हैं तब गुड़ाई की जरूरत नही होती.

पौधों में लगने वाले रोग और रोकथाम-
कालमेघ के पौधे में अभी तक कुछ ख़ास तरह के रोग देखने को नही मिला है. लेकिन इसके पौधे के विकास करने के दौरान समय परिवर्तन की वजह से एक ख़ास रोग देखने को मिलता है. जिसे धुमक के नाम से जाना जाता है. इस रोग की रोकथाम के लिए पौधों की हलकी सिंचाई कर देनी चाहिए. इसके अलावा अगर पौधे पर किसी तरह के कीट का कोई आक्रमण देखने को मिले तो पौधों पर मेलाथियान का उचित मात्रा में छिडकाव करना चाहिए.

पौधों की कटाई और सुखाई-
कालमेघ में पौधों की साल भर में दो कटाई की जा सकती है. इसका पौधा खेत में रोपाई के लगभग 130 दिन बाद कटाई के लिए तैयार हो जाता है. जिसके बाद इसकी पहली कटाई नवम्बर और दिसम्बर में की जाती है. जबकि दूसरी कटाई बारिश के मौसम के बाद की जाती है.

इसके पौधों की कटाई जब इस पर फूल 50 प्रतिशत रह जाएँ तब कर लेनी चाहिए. अगर इसकी खेती बहुवर्षीय तौर पर कर रहे हैं तो इसके पौधों की कटाई जमीन से 5 से 10 सेंटीमीटर ऊपर करनी चाहिए. ताकि पौधे में फिर से नई शाखाएं बन सके. इसके पौधों की कटाई के बाद उन्हें सुखाया जाता है. पौधे को हमेशा छायादार जगह में सुखाना अच्छा होता है.

पैदावार और लाभ-
कालमेघ की खेती अगर अच्छी देखरेख से की जाए तो एक हेक्टेयर से दो से चार टन तक सुखी हुई शाखाएं और चार क्विंटल तक बीज प्राप्त किया जा सकता है. जिनका बाज़ार भाव 15 से 50 रूपये प्रति किलो रहता है. इस हिसाब से किसान भाई कालमेघ की खेती कर सालाना एक लाख से ज्यादा की कमाई आसानी से कर सकते है.

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