नोट -भारत की आजादी में शहीद हुए वीरांगना/जवानो के बारे में यदि आपके पास कोई जानकारी हो तो कृपया उपलब्ध कराने का कष्ट करे . जिसे प्रकाशित किया जा सके इस देश की युवा पीढ़ी कम से कम आजादी कैसे मिली ,कौन -कौन नायक थे यह जान सके । वैसे तो यह बहुत दुखद है कि भारत की आजादी में कुल कितने क्रान्तिकारी शहीद हुए इसकी जानकार भारत सरकार के पास उपलब्ध नही है। और न ही भारत सरकार देश की आजादी के दीवानो की सूची संकलन करने में रूचि दिखा रही जो बहुत ही दुर्भाग्य पूर्ण है।
बंता सिंह का जन्म 1890 ग्राम सागवाल जालन्धर पंजाब-शहादत 14 अगस्त, 1915 को हुआ। वैसे तमाम ज्ञात और अज्ञात क्रान्ति वीरों में से एक हैं अमर बलिदानी बंता सिंह जी मृत्यु की बात सुनते ही अच्छे से अच्छे व्यक्ति का दिल बैठ जाता है। उसे कुछ खाना-पीना अच्छा नहीं लगताय पर भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम में ऐसे क्रान्तिकारी भी हुए हैं, फाँसी की तिथि निश्चित होते ही प्रसन्नता से जिनका वजन बढ़ना शुरू हो गया। ऐसे ही एक वीर थे सरदार बन्तासिंह। बन्तासिंह का जन्म 1890 में ग्राम सागवाल (जालन्धर, पंजाब) में हुआ था। 1904-05 में काँगड़ा में भूकम्प के समय अपने मित्रों के साथ बन्तासिंह सेवाकार्य में जुटे रहे।
पढ़ाई पूरी कर वे चीन होते हुए अमरीका चले गये। वहाँ उनका सम्पर्क गदर पार्टी से हुआ। उनकी योजना से वे फिर भारत आ गये। एक बार लाहौर के अनारकली बाजार में एक थानेदार ने उनकी तलाशी लेनी चाही। बन्तासिंह ने उसे टालना चाहा पर वह नहीं माना। उसकी जिद देखकर बन्तासिंह ने आव देखा न ताव पिस्तौल निकालकर दो गोली उसके सिर में उतार दी। थानेदार वहीं ढेर हो गया। अब बन्तासिंह का फरारी जीवन शुरू हो गया। एक दिन उनका एक प्रमुख साथी प्यारासिंह पकड़ा गया। क्रान्तिकारियों ने छानबीन की, तो पता लगा कि जेलर चन्दासिंह उनके पीछे पड़ा है।
25 अपै्रल, 1915 को बन्तासिंह, बूटासिंह और जिवन्द सिंह ने जेलर को उसके घर पर ही गोलियों से भून दिया। इसी प्रकार चार जून, 1915 को एक अन्य मुखबिर अच्छरसिंह को भी ठिकाने लगाकर यमलोक पहुँचा दिया गया। गदर पार्टी पूरे देश में क्रान्ति की आग भड़काना चाहती थी। इसके लिए बड़ी मात्रा में शस्त्रों की आवश्यकता थी। बन्तासिंह और उसके साथियों ने एक योजना बनायी। उन दिनों क्रान्तिकारियों के भय से रेलगाड़ियों के साथ कुछ सुरक्षाकर्मी चलते थे। एक गाड़ी प्रातः चार बजे बल्ला पुल पर से गुजरती थी। उस समय उसकी गति बहुत कम हो जाती थी। 12 जून, 1915 को क्रान्तिकारी उस गाड़ी में सवार हो गये। जैसे ही पुल आया, उन्होंने सुरक्षाकर्मियों पर ही हमला कर दिया।
अचानक हुए हमले से डर कर वे हथियार छोड़कर भाग गये। अपना काम पूरा कर क्रान्तिकारी दल भी फरार हो गया। अब तो प्रशासन की नींद हराम हो गयी। उन्होंने क्रान्तिकारियों का पीछा किया। बन्तासिंह जंगल में साठ मील तक भागते रहे। वे बच तो गये पर उनके पैर लहूलुहान हो गये। थकान और बीमारी से सारा शरीर बुरी तरह टूट गया। वे स्वास्थ्य लाभ के लिए घर पहुँचे पर उनके एक सम्बन्धी को लालच आ गया। वह उन्हें अपने घर ले गया और पुलिस को सूचना दे दी। जब पुलिस वहाँ पहुँची, तो बन्तासिंह आराम कर रहे थे। उन्होंने पुलिस दल को देखकर ठहाका लगाया और उस रिश्तेदार से कहा, यदि मुझे पकड़वाना ही था, तो मेरे हाथ में कम से कम एक लाठी तो दे दी होती। मैं भी अपने दिल के अरमान निकाल लेता। पर अब क्या हो सकता था ?
उनकी गिरफ्तारी का समाचार मिलते ही उनके दर्शन के लिए पूरा नगर उमड़ पड़ा। हथकड़ी और बेड़ियों में जकड़े बन्तासिंह ने नगरवासियांे को देखकर कहा कि मेरा बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा। कुछ समय बाद ही यह अंग्रेज आपके पैरों पर लोटते नजर आयेंगे। ‘भारत माता की जय’ ओर ‘बन्तासिंह जिन्दाबाद’ के नारों से न्यायालय गूँज उठा। बन्तासिंह को 25 जून को पकड़ा गया था। उन पर राजद्रोह का मुकदमा चलाकर 14 अगस्त, 1915 को फाँसी दे दी गयी। देश के लिए बलिदान होने की खुशी में इन 50 दिनों में उनका वजन 4.5 किलो बढ़ गया था।
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अभी थोड़े समय पहले अहिंसा और बिना खड्ग बिना ढाल वाले नारों और गानों का बोलबाला था ! हर कोई केवल शांति के कबूतर और अहिंसा के चरखे आदि में व्यस्त था लेकिन उस समय कभी इतिहास में तैयारी हो रही थी एक बड़े आन्दोलन की ! इसमें तीर भी थी, तलवार भी थी , खड्ग और ढाल से ही लड़ा गया था ये युद्ध ! जी हाँ, नकली कलमकारों के अक्षम्य अपराध से विस्मृत कर दिए गये वीर बलिदानी जानिये जिनका आज बलिदान दिवस ! आज़ादी का महाबिगुल फूंक चुके इन वीरो को नही दिया गया था इतिहास की पुस्तकों में स्थान ! किसी भी व्यक्ति के लिए अपने मुल्क पर मर मिटने की राह चुनने के लिए सबसे पहली और महत्वपूर्ण चीज है- जज्बा या स्पिरिट। किसी व्यक्ति के क्रान्तिकारी बनने में बहुत सारी चीजें मायने रखती हैं, उसकी पृष्ठभूमि, अध्ययन, जीवन की समझ, तथा सामाजिक जीवन के आयाम व पहलू। लेकिन उपरोक्त सारी परिस्थितियों के अनुकूल होने पर भी अगर जज्बा या स्पिरिट न हो तो कोई भी व्यक्ति क्रान्ति के मार्ग पर अग्रसर नहीं हो सकता। देश के लिए मर मिटने का जज्बा ही वो ताकत है जो विभिन्न पृष्ठभूमि के क्रान्तिकारियों को एक दूसरे के प्रति, साथ ही जनता के प्रति अगाध विश्वास और प्रेम से भरता है। आज की युवा पीढ़ी को भी अपने पूर्वजों और उनके क्रान्तिकारी जज्बे के विषय में कुछ जानकारी तो होनी ही चाहिए। आज युवाओं के बड़े हिस्से तक तो शिक्षा की पहुँच ही नहीं है। और जिन तक पहुँच है भी तो उनका काफी बड़ा हिस्सा कैरियर बनाने की चूहा दौड़ में ही लगा है। एक विद्वान ने कहा था कि चूहा-दौड़ की सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि व्यक्ति इस दौड़ में जीतकर भी चूहा ही बना रहता है। अर्थात इंसान की तरह जीने की लगन और हिम्मत उसमें पैदा ही नहीं होती। और जीवन को जीने की बजाय अपना सारा जीवन, जीवन जीने की तैयारियों में लगा देता है। जाहिरा तौर पर इसका एक कारण हमारा औपनिवेशिक अतीत भी है जिसमें दो सौ सालों की गुलामी ने स्वतंत्र चिन्तन और तर्कणा की जगह हमारे मस्तिष्क को दिमागी गुलामी की बेड़ियों से जकड़ दिया है। आज भी हमारे युवा क्रान्तिकारियों के जन्मदिवस या शहादत दिवस पर ‘सोशल नेट्वर्किंग साइट्स’ पर फोटो तो शेयर कर देते हैं, लेकिन इस युवा आबादी में ज्यादातर को भारत की क्रान्तिकारी विरासत का या तो ज्ञान ही नहीं है या फिर अधकचरा ज्ञान है। ऐसे में सामाजिक बदलाव में लगे पत्र-पत्रिकाओं की जिम्मेदारी बनती है कि आज की युवा आबादी को गौरवशाली क्रान्तिकारी विरासत से परिचित करायें ताकि आने वाले समय के जनसंघर्षों में जनता अपने सच्चे जन-नायकों से प्ररेणा ले सके। आज हम एक ऐसी ही क्रान्तिकारी साथी का जीवन परिचय दे रहे हैं जिन्होंने जनता के लिए चल रहे संघर्ष में बेहद कम उम्र में बेमिसाल कुर्बानी दी।


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