राजमा की खेती दलहनी फसल के रूप में की जाती है. राजमा की दाल का आकार बाकी दाल के दानो से बड़ा होता है. राजमा की फलियों का सब्जी में कच्चे रूप में इस्तेमाल किया जाता है. कच्चे रूप में इसमें प्रोटीन की मात्रा ज्यादा पाई जाती है. राजमा के पौधे झाड़ीनुमा और लता के रूप में पाए जाते हैं. जिन्हें विकास करने के लिए सहारे की जरूरत होती है. इसकी दाल खाने के कई शारीरिक फायदे हैं. भारत में इसकी खेती रबी और खरीफ दोनों समय की जाती है.
भारत में इसकी खेती उत्तर पूर्वी और दक्षिणी राज्यों में बड़े पैमाने पर की जाती है. राजमा की खेती के लिए उष्णकटिबंधीय जलवायु उपयुक्त होती है. इसके पौधों को विकास करने के लिए सामान्य मौसम की जरूरत होती है. और इसके पौधों को बारिश की भी सामान्य जरूरत होती है. राजमा की खेती के लिए भूमि का पी.एच. मान भी सामान्य होना चाहिए. राजमा की खेती में इसकी कच्ची फलियों और इसके दाने दोनों का बाज़ार भाव अच्छा मिलता जिस कारण राजमा की खेती किसानों के लिए फायदेमंद साबित हो रही है.
अगर आप भी इसकी खेती करने का मन बना रहे हैं तो आज हम आपको इसकी खेती के बारें में सम्पूर्ण जानकारी देने वाले हैं.
राजमा को इसके लाल रंग की वजह से और किडनी के आकार जैसा होने पर किडनी बीन्स भी कहा जाता है। यह प्रोटीन का मुख्य स्त्रोत है और मोलीबडेनम तत्व भी देता है। इसमें कोलैस्ट्रोल को कम करने वाले तत्व भी हैं। उत्तरी भारत में इसकी दाल भी बनाई जाती है। भारत में, महाराष्ट्र, जम्मू कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, बंगाल, तामिलनाडू, केरल, कर्नाटक मुख्य राजमांह उत्पादक राज्य हैं।
उपयुक्त मिट्टी
इसे मिट्टी की व्यापक किस्मों जैसे हल्की रेतली से भारी चिकनी मिट्टी में उगाया जा सकता है। जल निकास वाली दोमट ज़मीनों में इसकी पैदावार बहुत अच्छी होती है। यह नमक वाली मिट्टी के प्रति बहुत संवेदनशील है। लगभग 5.5-6 पी एच वाली ज़मीनों में इसकी पैदावार अधिक होती है।
जलवायु और तापमान
राजमा की खेती में जलवायु और तापमान का एक ख़ास संयोग होता है. इसकी खेती के लिए शुष्क और आद्र मौसम की जरूरत होती है. भारत में इसकी खेती अलग अलग जगहों पर रबी और खरीफ दोनों मौसम में की जाती है. मैदानी क्षेत्रों में राजमा को रबी के समय में और पर्वतीय जगहों पर खरीफ के समय में इसकी खेती की जाती है. राजमा के पौधों के विकास के दौरान अधिक तेज़ गर्मी और सर्दी दोनों ही नुकसानदायक होती है. इसके पौधों को बारिश की ज्यादा जरूरत नही होती.
इसके बीजों के अंकुरित होने के दौरान 20 से 25 डिग्री तापमान उपयुक्त होता है. अंकुरित होने के बाद इसके पौधे 10 से 30 डिग्री तापमान के बीच अच्छे से विकास कर लेते हैं. लेकिन फूल बनने के दौरान 10 डिग्री से कम और 30 डिग्री से अधिक तापमान होने पर फसल को अधिक नुक्सान पहुँचता है. इस दौरान पौधे पर बन रहे फूल झड जाते हैं.
प्रसिद्ध किस्में और पैदावार
VL Rajma 125: यह किस्म उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में समय से बोयी जाती है। इसकी फली में 4-5 बीज होते हैं और 100 बीज का भार लगभग 41.38 ग्राम होता है।
RBL 6: यह किस्म पंजाब में बोयी जाती है। इसके बीज हल्के हरे रंग के होते हैं और फली में 6-8 बीज होते हैं।
उन्नत किस्में
राजमा की कई उन्नत किस्में हैं जिन्हें वातावरण की अनुकूलता के आधार पर अलग लग जगहों पर उगाया जाता है.
पी.डी.आर. 14
राजमा की इस किस्म को उदय के नाम से भी जाना जाता है. इस किस्म के पौधे सामान्य लम्बाई के होते हैं. इसके दानो का रंग लाल चित्तीदार होता है. इसके पौधे बीज रोपाई के लगभग 125 से 130 दिन बाद पककर तैयार हो जाते हैं. जिनका प्रति हेक्टेयर उत्पादन 30 किवंटल के आसपास पाया जाता है.
एच.यू.आर 15
राजमा की इस किस्म के पौधे बीज रोपाई के लगभग 120 से 125 दिन बाद पककर तैयार हो जाते हैं. जिनका प्रति हेक्टेयर उत्पादन 20 से 25 किवंटल तक पाया जाता है. राजमा की इस किस्म के दानो का रंग सफ़ेद दिखाई देता हैं.
मालवीय 137
राजमा की इस किस्म के दानो का रंग लाल दिखाई देता है. इस किस्म को ज्यादातर उत्तर पूर्वी भारत और महाराष्ट्र में उगाया जाता है. इस किस्म के पौधे बीज रोपाई के लगभग 115 से 120 दिन बाद पककर तैयार हो जाते हैं. जिनका प्रति हेक्टेयर उत्पादन 25 से 30 किवंटल तक पाया जाता हैं.
अम्बर
राजमा की इस किस्म के पौधे बीज रोपाई के लगभग 125 से 130 दिन बाद पककर तैयार हो जाते हैं. इस किस्म के पौधे सामान्य ऊंचाई वाले होते हैं. जिनका उत्पादन 20 से 25 किवंटल तक पाया जाता हैं. इसके किस्म के दाने लाल चित्तीदार दिखाई देते हैं.
उत्कर्ष
राजमा की इस किस्म की खेती पछेती पैदावार के रूप में की जाती है. इस किस्म के पौधे बीज रोपाई के लगभग 130 से 135 दिन में पककर तैयार हो जाते हैं. इसके दानो का रंग गहरा लाल दिखाई देता हैं. जिनका प्रति हेक्टेयर उत्पादन 20 से 25 किवंटल तक पाया जाता हैं. इसके पौधे सामान्य लम्बाई के होते हैं.
वी.एल. 63
राजमा की इस किस्म के पौधे दोनों मौसम में उगाये जा सकते हैं. इस किस्म के पौधे बीज रोपाई के लगभग 120 से 125 दिन बाद पककर तैयार हो जाते हैं. इस किस्म के पौधे का प्रति हेक्टेयर उत्पादन 25 किवंटल के आसपास पाया जाता हैं. इसके दाने भूरे चित्तीदार रंग के होते हैं.
इसे अलावा और काफी किस्में हैं जिन्हें अलग अलग मौसम के आधार पर उगाया जाता है. जिनमे आई.आई.पी.आर 96-4, बी.एल 63, अरुण, अम्बर, आई.आई.पी.आर 98, हूर -15 और एच.पी.आर 35 जैसी कई किस्में मौजूद हैं.
ज़मीन की तैयारी
राजमा की खेती के लिए शुरुआत में खेत की तैयारी के वक्त खेत में मौजूद पुरानी फसलों के अवशेषों को निकाल दें. जिनका इस्तेमाल किसान भाई जैविक खाद बनाने में भी कर सकते हैं. अवशेषों को निकालने के बाद खेत की मिट्टी पलटने वाले हलों से गहरी जुताई कर दें. उसके बाद खेत में पुरानी गोबर की खाद को उचित मात्रा में डालकर मिट्टी में मिला दें. खाद को मिट्टी में मिलाने के लिए खेत की सो से तीन तिरछी जुताई कर दें. उसके बाद खेत में पानी चलाकर खेत का पलेव कर दें. पलेव करने के तीन से चार दिन बाद खेत में रोटावेटर चलाकर मिट्टी को भुरभुरा बना लें. और उसके बाद खेत को पाटा लगाकर समतल बना दें.
मिट्टी के भुरभुरा होने तक खेत की 2-3 बार जोताई करें, खेत को समतल रखें ताकि उसमें पानी ना खड़ा रहे यह फसल जल जमाव के प्रति काफी संवेदनशील होती है। आखिरी जोताई के समय, 60-80 क्विंटल प्रति एकड़ रूड़ी की खाद डालें ताकि अच्छी पैदावार मिल सके।
बिजाई
बिजाई का समय
बसंत की ऋतु में राजमांह की बिजाई फरवरी से मार्च और खरीफ की ऋतु में इसकी बिजाई मई से जून के महीने की जाती है। पंजाब में कुछ किसान राजमांह की बिजाई जनवरी के आखिरी सप्ताह करते हैं।
फासला
अगेती किस्मों के लिए कतारों में 45-60 सैं.मी. और पौधों में फासला 10-15 सैं.मी. रखें। पॉल जैसी किस्मों के लिए पहाड़ी क्षेत्रों में पौधे का फासला 3-4 मीटर प्रति पहाड़ी होना चाहिए।
बीज की गहराई
बीज को 6-7 सैं.मी. गहरा बोयें।
बिजाई की विधि
इसकी बिजाई गड्ढा खोदकर की जाती है। समतल क्षेत्रों में बीज पंक्तियों में बोयें जाते हैं और पहाड़ी क्षेत्रों में इसकी खेती बैड बनाकर की जाती है।
बीज
बीज की मात्रा
अगेती किस्मों के लिए 30-35 किलोग्राम बीज प्रति एकड़ का प्रयोग करें। पॉल किस्मों की बिजाई पहाड़ी क्षेत्रों में 1 मीटर के फासले पर 3-4 पौधे प्रति पहाड़ी पर लगाए जाते हैं। बीज की मात्रा 10-12 किलोग्राम प्रति एकड़ प्रयोग की जाती है।
बीज का उपचार
बिजाई से पहले थीरम 4 ग्राम से प्रति किलो बीज का उपचार करें। बीजों का छांव में सुखाएं और तुरंत बो दें।
खाद
खादें (किलोग्राम प्रति एकड़)
| UREA | SSP | MURIATE OF POTASH |
| 87 | 150 | On soil test results |
तत्व (किलोग्राम प्रति एकड़)
| NITROGEN | PHOSPHORUS | POTASH |
| 40 | 25 | # |
नाइट्रोजन 40 किलो (87 किलो यूरिया), फासफोरस 25 किलो (150 किलो एस एस पी) की मात्रा प्रति एकड़ में प्रयोग करें। खाद डालने से पहले मिट्टी की जांच करवाएं।
खरपतवार नियंत्रण
फसल के शुरू में नदीनों की रोकथाम जरूरी है। इस अवस्था में नदीनों का हमला ना होने दें। खादें डालने और सिंचाई करने के साथ ही गोडाई कर दें। नदीनों के अंकुरन से पहले फ्लूक्लोरालिन 800 मि.ली. प्रति एकड़ या पैंडीमैथालीन 1 लीटर प्रति एकड़ का प्रयोग करें।
राजमा की खेती में खरपतवार नियंत्रण रासायनिक और प्राकृतिक दोनों तरीकों से किया जा सकता है. प्राकृतिक तरीके से खरपतवार नियंत्रण पौधों की नीलाई गुड़ाई कर किया जाता है. राजमा के पौधों में प्राकृतिक तरीके से खरपतवार नियंत्रण के दौरान इसके पौधों की पहली गुड़ाई बीज रोपाई के लगभग 20 दिन बाद कर देनी चाहिए. पौधों की पहली गुड़ाई हल्के रूप में करनी चाहिए. ताकि शुरुआत में पौधों की जड़ों को नुक्सान ना पहुँचे. पहली गुड़ाई के बाद दूसरी गुड़ाई 15 से 20 दिन बाद करनी चाहिए. इसके पौधों की दो गुड़ाई काफी होती है.
इसकी खेती में रासायनिक तरीके से खरपतवार नियंत्रण के लिए पेन्डीमेथलीन की उचित मात्रा का इस्तेमाल करना चाहिए. राजमा की खेती में पेन्डीमेथलीन का छिडकाव बीज रोपाई के तुरंत बाद कर देना चाहिए. इससे खेत में खरपतवार जन्म ही नही ले पाती. और अगर जन्म लेती भी हैं तो उनकी मात्रा काफी कम होती है.
सिंचाई
बीजों के अच्छे अंकुरण के लिए बिजाई से पहले सिंचाई करें। फसल की वृद्धि के दौरान 6-7 सिंचाइयों की आवश्यकता होती है। बिजाई के बाद 25वें दिन सिंचाई करें और अच्छी उपज प्राप्त करने के लिए 25 दिनों के अंतराल पर 3 सिंचाइयां जरूरी होती हैं। फसल के खिलने, फूल निकलने के दौरान और फलियां विकसित होने की अवस्था में सिंचाई करें। इन अवस्थाओं पर पानी की कमी ना होने दें।
- पौधे की देखभाल
हानिकारक कीट और रोकथाम
थ्रिप्स :
यह आम पाया जाने वाला कीट है। यह कीड़ा शुष्क मौसम में सबसे ज्यादा नुकसान करता है। यह पत्तों का रस चूसता है। जिस कारण पत्ते के किनारे मुड़ जाते हैं। फूल भी गिर पड़ते हैं। थ्रिप्स की जनसंख्या को जानने के लिए नीले रंग के 6-8 कार्ड प्रति एकड़ प्रयोग करें। इसके इलावा वर्टीसिलियम लेकानी 5 ग्राम को प्रति लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें।
ज्यादा नुकसान के समय इमीडाक्लोप्रिड 17.8 एस एल या फिप्रोनिल 1 मि.ली. या एसीफेट 75 प्रतिशत डब्लयु पी 1 ग्राम को प्रति लीटर पानी में डालकर स्प्रे करें।
चेपा:
यह कीट पत्ते का रस चूसता है। जिस कारण पत्तों पर फफूंद लग जाती है और काले हो जाते हैं। यह फलियों को भी खराब कर देता है। इसकी रोकथाम के लिए एसीफेट 75 डब्लयु पी 1 ग्राम प्रति लीटर पानी या मिथाइल डेमेटन 25 ई.सी. 2 मि.ली. प्रति पानी में प्रयोग करें। कीटनाशक जैसे कि कार्बोफ्यूरॉन, फोरेट 4-8 किलो प्रति एकड़ मिट्टी में डालकर फसल बीजने से 15 और 60 दिनों के बाद छिड़कने चाहिए।
जूं :
यह कीड़ा पूरे संसार में पाया जाता है। इसके नवजात शिशु पत्तों के नीचे की तरफ अपना भोजन बनाते हैं। प्रभावित पत्ते कप के आकार की तरह बन जाते हैं। ज्यादा नुकसान होने पर पत्ते गिर जाते हैं और टहनियां सूख जाती हैं।
यदि यह बीमारी ज्यादा बढ़ जाये तो क्लोरफेनापायर 15 मि.ली., एबामैक्टिन 15 मि.ली. को प्रति लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें। यह एक खतरनाक कीड़ा है, जो कि 80 प्रतिशत तक फसल की पैदावार का नुकसान करता है। इसकी रोकथाम के लिए स्पाइरोमैसीफैन 22.9 एस सी 200 मि.ली. को 180 लीटर पानी में डाल कर प्रति एकड़ पर स्प्रे करें।
बीमारियां और रोकथाम
पत्तों पर सफेद धब्बे :
इस बीमारी के कारण पत्तों के नीचे की तरफ सफेद रंग के धब्बे बन जाते हैं। इसके कीट पत्तों को अपना भोजन बनाते हैं। यह फसल के किसी भी विकास के समय हमला कर सकते हैं। कईं बार यह पत्तों की गिरावट का कारण भी बनते हैं।
पानी को खड़ा होने से परहेज़ करें और खेत साफ रखें। इसकी रोकथाम के लिए हैक्साकोनाज़ोल के साथ स्टिकर 1 मि.ली. को प्रति लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें। अचानक बारिश होने पर इस बीमारी का खतरा बढ़ जाता है। हमला होने पर घुलनशील सल्फर 20 ग्राम को 10 लीटर पानी में मिलाकर 10 दिनों के अंतराल पर 2-3 बार स्प्रे करें।
सूखा:
नमी और कम निकास वाली ज़मीनों में यह बीमारी ज्यादा आती है। यह बीमारी मिट्टी से पैदा होती है। ज्यादा पानी सोखने के कारण यह बीमारी नए पौधों के अंकुरन से पहले ही उन्हें मार देती है।
इसकी रोकथाम के लिए खालियों में कॉपर ऑक्सीकलोराइड 25 ग्राम या कार्बेनडाज़िम 20 ग्राम को प्रति 10 लीटर पानी में डालकर इसकी स्प्रे करें।
पौधों की जड़ों को गलने से रोकने के लिए टराईकोडरमा बायो फंगस 2.5 किलोग्राम को प्रति 500 लीटर पानी में डालकर पौधे की जड़ों में डालें।
पीला चितकबरा रोग:
इस बीमारी के दौरान पत्तों पर हल्के और हरे रंग के धब्बे बन जाते हैं। पौधे के अगले विकास में रूकावट पड़ जाती है। पत्तों और फलों पर पीले रंग के गोल धब्बे बन जाते हैं। बिजाई के लिए सेहतमंद और बीमारी रहित बीजों का प्रयोग करें। प्रभावित पौधों को खेत में से उखाड़ कर नष्ट कर दें।
इसकी रोकथाम के लिए एसीफेट 75 एस पी 600 ग्राम को 200 लीटर पानी या मिथाइल डेमेटन 25 ई सी 2 मि.ली. को प्रति लीटर पानी में डालकर स्प्रे करें।
फसल की कटाई
जब इसकी फलियां पूरी तरह पक जायें और रंग पीला हो जाये तो इसकी तुड़ाई की जा सकती है। इसके पत्ते पीले पड़ने के बाद गिरने शुरू हो जाते हैं। किस्म के आधार पर इसकी फलियां 7-12 दिनों में पककर तुड़ाई के लिए तैयार हो जाती हैं। पूरी फसल 120-130 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती हैं। कटाई समय से करें। काटी हुई फसल 3-4 दिनों के लिए धूप में रखें। अच्छी तरह सूखने के बाद बैलों या छड़ों की मदद से छंटाई की जा सकती हैं।
कटाई के बाद
राजमांह को कटाई के बाद कईं कामों के लिए प्रयोग किया जाता है। सांभ संभाल के समय इसकी देखभाल जरूरी है। राजमांह को स्टोर करने से पहले आकार और क्वालिटी के आधार पर बांटा जाता है। गले हुए राजमांह धूप में हल्की गर्मी में रख दिए जाते हैं ताकि उनमें से नमी की मात्रा कम हो जाये। इसके लिए हमेशा ठंडी, अंधेरे और सूखी जगह पर रख दिया जाता है।
पैदावार और लाभ
राजमा की अलग अलग प्रदेशों में उगाई जाने वाली किस्मों का प्रति हेक्टेयर औसत उत्पादन 25 किवंटल के आसपास पाया जाता है. और राजमा दाल का बाज़ार भाव 8 हज़ार रूपये प्रति किवंटल के आसपास पाया जाता हैं. इस हिसाब से किसान भाई एक बार में एक हेक्टेयर से डेढ़ लाख तक की कमाई आसानी से कर सकते हैं.







