कुष्मांडा माता की आरती नवरात्र-पूजन के चौथे दिन कूष्माण्डा देवी के स्वरूप की ही उपासना की जाती है। इस दिन साधक का मन 'अदाहत' चक्र में अवस्थित होता है। अतः इस दिन उसे अत्यंत पवित्र और अचंचल मन से कूष्माण्डा देवी के स्वरूप को ध्यान में रखकर पूजा-उपासना के कार्य में लगना चाहिए। माँ कूष्माण्डा की उपासना से भक्तों के समस्त रोग-शोक मिट जाते हैं। इनकी भक्ति से आयु, यश, बल और आरोग्य की वृद्धि होती है। माँ कूष्माण्डा अत्यल्प सेवा और भक्ति से प्रसन्न होने वाली हैं। यदि मनुष्य सच्चे हृदय से इनका शरणागत बन जाए तो फिर उसे अत्यन्त सुगमता से परम पद की प्राप्ति हो सकती है।
कूष्मांडा जय जग सुखदानी। मुझ पर दया करो महारानी।।
पिगंला ज्वालामुखी निराली। शाकंबरी माँ भोली भाली।।
लाखों नाम निराले तेरे । भक्त कई मतवाले तेरे।।
भीमा पर्वत पर है डेरा। स्वीकारो प्रणाम ये मेरा।।
सबकी सुनती हो जगदंबे। सुख पहुँचती हो माँ अंबे।।
तेरे दर्शन का मैं प्यासा। पूर्ण कर दो मेरी आशा।।
माँ के मन में ममता भारी। क्यों ना सुनेगी अरज हमारी।।
तेरे दर पर किया है डेरा। दूर करो माँ संकट मेरा।।
मेरे कारज पूरे कर दो। मेरे तुम भंडारे भर दो।।
तेरा दास तुझे ही ध्याए। भक्त तेरे दर शीश झुकाए।।
कूष्मांडा जय जग सुखदानी। मुझ पर दया करो महारानी।।
पिगंला ज्वालामुखी निराली। शाकंबरी माँ भोली भाली।।
लाखों नाम निराले तेरे । भक्त कई मतवाले तेरे।।
भीमा पर्वत पर है डेरा। स्वीकारो प्रणाम ये मेरा।।
सबकी सुनती हो जगदंबे। सुख पहुँचती हो माँ अंबे।।
तेरे दर्शन का मैं प्यासा। पूर्ण कर दो मेरी आशा।।
माँ के मन में ममता भारी। क्यों ना सुनेगी अरज हमारी।।
तेरे दर पर किया है डेरा। दूर करो माँ संकट मेरा।।
मेरे कारज पूरे कर दो। मेरे तुम भंडारे भर दो।।
तेरा दास तुझे ही ध्याए। भक्त तेरे दर शीश झुकाए।।

