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पुरुष का भाग्य अज्ञेय

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मानव की मानव की प्रति जागरूकता आज के इस ज़माने में एक मशीन की आड़ में प्रकट होती है - या तो वह मोटर के स्टीयरिंग पर बैठा पहियों को बचाकर चलने में चौकन्ना है, या वह स्वयं राही है और मोटर के स्टीयरिंग पर बैठे हुए अनेक मानवों से बचकर चलने में चौकन्ना है। बचने और बचाने का ही रिश्ता जब मानव-मानव में हो, तब इसकी सम्भावना कम है कि उस अकेली चलती हुई औरत की विचित्र क्रिया पर किसी का भी ध्यान गया हो - फिर चाहे कोल्हू के बैल-से आज के मानव के जीवन में वह क्रिया कितना ही गहरा अभिप्राय रखती हो...
मानिकतल्ले की सड़क पर, कॉलेज-स्क्वेयर से कुछ आगे, काली के मन्दिर के पास ही पटरी पर वह चली जा रही थी। मन्दिर में अर्च्चा में बहाये हुए, या प्रार्थिनी विधवाओं के गीले कपड़ों से बहे हुए, पानी से वह पटरी कुछ दूर पर तक पैरों-जूतों के पिच-पिच उपहारों से क्लान्त और बोझल, फिर क्रमशः सूखी होती चली गयी थी।
इसी स्थल पर चलती हुई वह औरत एकाएक अकचका कर रुकी, हड़बड़ाई सी पैर बचाकर एक ओर को हटी और फिर सिमट कर बचती हुई-सी आगे बढ़ी, दो कदम चलकर रुकी और फिर धीरे-धीरे, काँपती-सी आगे चली गयी...
कोई भी इस क्रिया को देखता तो अनुमान लगाता कि बहुत देर से व्रतादि करनेवाली किसी जीवन-विक्षत, धर्मप्राण हिन्दू स्त्री के अनुष्ठान से लौटते समय पैर के नीचे अचानक किसी जीव-जीव भी सख्त त्वचावाला नहीं, पिलपिला और चेंपदार, जिससे छूकर तलवे का संवेदनशील मध्य भाग तड़प जाये, जैसे मेंढक या केंचुआ-के आ जाने से जो प्रतिक्रिया होती, वही प्रतिक्रिया यहाँ भी देखी है।
लेकिन पटरी पर तो कोई जीव नहीं था, किसी भूतपूर्व जीव की लोथ भी नहीं।
केवल सूखी हुई धूल के ऊपर दो गीले पैरों की छाप वहाँ पर थी - पास-पास, छोटे-छोटे। इन्हीं बाल पद चिह्नों पर पैर पड़ने से वह इतनी आकुलता से बची थी - उसका सारा पिंजर काँप गया था और वह जैसे गिरने लगी थी, फिर सँभलकर आगे बढ़ी थी।
वह ऐसे था, जैसे घोर कारागार में एकाएक कोई फाटक खुल गया हो...

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पाँच क़दम लम्बाई की उस कोठरी के भीतर भ्रान्त गीत से आगे-पीछे घूमती हुई प्रतिमा एकाएक रुक गयी। क्या आगे-पीछे ही जीवन-क्रम है? वह बन्दिनी है, लेकिन इस परिपाटी के खिलाफ़ विद्रोह करना चाहती है। क्यों जीवन में आगे ही बढ़ना या पीछे ही हटना? क्यों पाँच क़दम आगे और पाँच क़दम वापस? वह आगे-पीछे का क्रम छोड़कर कोठरी के चारों ओर चक्कर काटने लगी-बीच में चक्की, खड्डी, पतरा कई विघ्न थे, लेकिन सीधी की बजाय मंडलाकार चाल चलने से उसे कुछ सन्तोष हुआ। यह गोल-गोल घूमना भी कोल्हू के बैल की तरह है, पर सन्तोष शायद इसलिए मिलता है कि वह केवल घिरी हुई नहीं है, कुछ है जो उसकी भी मुट्ठी में है; कुछ जो उसकी देन है, जो उसके अन्तरतम से प्रसूत होकर बाहर की ओर, संसार की ओर उन्मुख है, कुछ जो-
प्रतिमा को लगता है, वह बद्ध रहेगी, जेल ही में रहेगी, पर जैसे किसी अव्यक्त, दिव्य निमित्त से कहीं को एक फाटक उसके लिए खुल गया है...

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आत्म-प्रवंचना! कौन-सा, किधर का, कहाँ को है - वह फाटक जो खुला है?
जेल के इन पिछले चार वर्षों में प्रतिमा के जीवन-मन्दिर में कई फाटक खुले और बन्द हुए हैं। कभी कहीं फाटक न होने से सेंध लगाकर ही कालतस्कर घुस आया है और न जाने किधर को निकल गया है। प्रतिमा का पति किसी षड्यन्त्र के मुक़दमे में फाँसी लटक गया है; वह स्वयं एक ऐसे ही अपराध में, स्कूल में अध्यापन करती हुई, क्लास में से पकड़कर जेल में डाल दी गयी है और वहीं सात वर्ष की कारावास की सज़ा की घोषणा होते-होते तक स्त्री से माता हो गयी है। धरे हुए पुरुष का खोना और जने हुए पुरुष का पाना इतना पास-पास हुआ है कि वह उद्भ्रान्त-सी हो गयी है, लेकिन खुलने और बन्द होनेवाले इन फाटकों की भूलभूलैयाँ में उसने अपना अभिमान नहीं खोया है। लोगों ने उसे विश्वास दिलाया था कि माता होने पर वह छूट जाएगी, उसने तिरस्कारपूर्वक इस विश्वास को निकाल फेंका था। छोड़ी वह नहीं गयी, और विश्वास व्यर्थ गया, लेकिन उसने तिरस्कार किया था तो निराश होने के डर से नहीं, एक सहज दर्प से, जो किसी की दया से छूटना नहीं चाहता था।
और न जाने किस दिव्य या दैव क्रिया से, प्रतिमा को अकेलापन नहीं अखरा था, न जाने कैसे वरे हुए पुरुष के अन्तर्धान होने की खलिश इस जने हुए पुरुष ने धीरे-धीरे दूर कर दी थी। वह पुरुष अभी शिशु था, उसकी चाल अटपटी और वाणी तुतली थी, पर प्रतिमा को ऐसा लगता था कि वह भाग्य के फाटक की ओर समर्थ पैरों से बढ़ रहा है, कि उसके स्पर्श से फाटक खुल जाएगा, कि उसके पीछे खड़ी होकर प्रतिमा भी देखेगी कि वह भाग्य शिशु का नहीं, पुरुष का है...

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कब की बात है? कैसे उसे याद आती है? याद नहीं आनी चाहिए, क्योंकि आज उसका सारा जीवन एक ही अनुभूति केन्द्रित है, और वह अनुभूति शिशु-पुरुष की समीपता की नहीं है, ‘वह दूसरी अनुभूति है’ ओफ़ कितनी दूसरी!
क्योंकि वह शिशु-पुरुष आज उसके साथ नहीं है। एक दिन जेलवालों ने कहा था, बालक अब बड़ा हो गया है अब तुम्हारे साथ नहीं रहा सकता। तुम्हारे सम्बन्धी हैं? तब उसने अभिमान से कह दिया था, मेरा कोई नहीं है। यह मेरे पास रहेगा। और एक बार जगाकर इस अभिमान को छोड़ना कठिन हो गया था - फाटक कई हैं, लेकिन आलोक अभिमान का है। उस दिन वे चले गये थे, पर पीछे प्रतिमा को पता लग गया था कि उसका भाग्य उसके साथ नहीं है, कि जिस शिशु को जेलवालों ने पुरुष मान लिया है, उसका मार्ग अलग होगा ही। और एक दिन वे आकर उसे ले गये थे-कह गये थे कि वे उसे अनाथाश्रम में रखने का प्रबन्ध कर रहे हैं... जेल के फाटक के बाहर - पर अनाथाश्रम का फाटक...

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एक दिन ले गये थे? आज है वह दिन - अभी वे उसे ले गये हैं। अभी, जब मैं यह चक्कर काटने लगी हूँ। अभी! पुरुष को पाना, पुरुष को खो देना-क्या वह आगे-पीछे की गति ही जीवन की गति है? मैं इसे अस्वीकार करती हूँ। मैं कोठरी का चक्कर काटती हूँ; मैं पृथ्वी का एक अंश घेरती हूँ, जीवन का एक अंश है, जो मेरी मुट्ठी में है; जो मुझसे प्रस्तुत होकर संसारोन्मुख है, जो-
इस समय वह जेल के दफ्तर में होगा। कुछ लिखा-पढ़ी हो रही होगी, कुछ काग़जी कार्रवाई, उसके बाद वह वहाँ से भी आगे चलेगा, वह फाटक उसके लिए खुलेगा और वह उतनी सब सीढ़ियाँ उतरकर आगे बढ़ेगा - कि फाटक अब तक खुल ही चुका है?
मैं अपनी कोठरी में आगे-पीछे नहीं, चक्कर काटती हुई चल रही हूँ; यह भी कोल्हू के बैल की तरह है, पर उसकी मार्फत मुझे लगता है, जैसे कहीं को एक फाटक मेरे लिए खुल गया है; मेरे लिए किसी अव्यक्त, दिव्य निमित्त से, पर उसी की मार्फत, उसी पुरुष की मार्फत, जिसका भाग्य मैंने गढ़ा है...
दफ्तर में।
क्या बच्चे को पता है कि वह अब पुरुष है, कि वह माँ से छिन नहीं रहा, पुरुषत्व को प्राप्त कर रहा है, पुरुष के भाग्य की ओर जा रहा है? क्योंकि वह रो नहीं रहा है, एक अपरिचित, अस्पष्ट-सा अभिमान उसके भीतर भर रहा है कि इन अनेक छोटे-बड़े अफ़सरों के बीच वह एक बच्चे की तरह नहीं, उनके परामर्शों का केन्द्र बनकर खड़ा है... तभी तो, जब जेल का सुपरिंटेंडेंट उसे बाहर भेजने की कार्रवाई समाप्त करके चलने को हुआ, ड्योढ़ी से निकलकर फाटक तक आया, कई सांकलों और कुंडों की खड़खड़ झनझन के साथ फाटक खुला, तब सुपरिंटेंडेंट को पहुँचाने आये हुए छोटे अफ़सरों के साथ वह भी आगे बढ़ता आया। उस समय कोई विशेष आह्लाद उसके मन में नहीं था, केवल वह कुछ-कुछ चेतता हुआ अभिमान-बढ़कर साहब के बराबर को हो लिया, किसी ने उसे रोका नहीं (क्या इसलिए नहीं कि वह बच्चा है? नहीं, उससे नये अभिमान ने कहा, नहीं इसलिए कि वह पुरुष है!), वह और आगे बढ़ा-
चौदह सीढ़ियाँ और फिर रास्ता और उसके ऊपर आकाश - आकाश को चीरता हुआ एक आरक्त-कंठ तोता - आह, यहाँ नहीं हैं सींखचे, नहीं हैं फाटक - है एक आकुल निमन्त्रण-
स्वातन्त्र्य-पुरुष का भाग्य...
उसका पैर फिसल गया। जैसे अनन्त का फाटक खुला और बन्द हो गया। दृश्य को घेरनेवाली आँखें फिर अपनी ज्योति में घिर गयी।

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चक्कर काटती हुई प्रतिमा क्षण-भर रुक गयी, न जाने क्यों। फिर वह घेरा छोड़कर पहले की तरह चलने लगी क्या आगे और पीछे ही जीवन-क्रम है वह विद्रोह करना चाहती है। पुरुष को पाना और पुरुष को खोना, आगे और पीछे, पीछे और आगे-काले सींखचों से अन्धी दीवार तक, अँधी दीवार से काले सींखचों तक, जिसके आगे दूसरी दीवार के सींखचे, जिसके आगे - क्या है, क्या है, मेरे पुत्र का भवितव्य, मेरे वरे हुए नहीं, जने हुए पुरुष का भाग्य!
क्रमशः वह जान जाएगी।
काली के मन्दिर के पास की पटरी पर वह औरत लड़खड़ा कर फिर सँभल गयी है और आगे चल पड़ी है। कोई फाटक खुला नहीं है, आगे सींखचे हैं।

(कलकत्ता, जनवरी 1940)

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