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न्याय का दरवाज़ा (व्यंग्य)- हरिशंकर परसाई

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उसका मुँह देखता हूँ । होंठ ज़्यादा फटे हुए हैं । दाँत बाहर निकलने को हमेशा तत्पर रहते हैं । झूठे और बक्की आदमी का मुँह ऐसा हो जाता है । झूठे दो तरह के होते हैं - चुप्पा और भड़भड़या । चुप्पा परिपक्व झूठा होता है । वह एक-दो वाक्यों में झूठ जमा देता है । भड़भड़या सोचता है, अभी झूठ जमा नहीं । इसलिए वह उसके समर्थन में आठ-दस वाक्य भड़भाड़ाकर बोल जाता है । इस धक्के से जबड़े फैलते जाते हैं । इसके जबड़े इसी तरह फैल गये हैं । इसका मुँह पके फोड़े की तरह है जिसमें झूठ का मवाद भरा है । ज़रा छेड़ने से मवाद बह निकलेगा ।

वह खाँसकर गला साफ करता है । रुमाल मुँह पर फेरता है । लगता है, गवाही देने नहीं आया, न्याय की बेटी को ब्याहने दूल्हा बनकर आया है ।
सरकारी वकील साधे-सधाए सवाल पूछता है और वह साधे-सधाए जवाब देता है । उसने अमुक आदमी को मृतक को लाठी मारते देखा था ।
उसे लाठी दिखाई गई, जिसे उसने किसी पुराने दोस्त की तरह पहचान लिया ।
उसे एक पत्थर का टुकड़ा दिखाया गया । उसने पत्थर भी पहचान लिया- यही वह पत्थर है, जो वहाँ पड़ा था ।
मैंने बगल में खड़े वकील दोस्त से कहा - यार यह क्या अंधेर है । यह किसी पत्थर के टुकड़े को कैसे पहचान लेगा ?
उसने कहा - चुप रहो, एविड्न्स एक्ट के मुताबीक ठीक है ।
गवाह को खून लगी मिट्टी दिखाई गई । उसने मिट्टी को भी पहचान लिया ।
मैंने वकील दोस्त से कहा - यह तो बड़ा अचरज है, इसने मिट्टी को भी पहचान लिया । उसने कहा - चुप्प, एविडेन्स एक्ट !

मैंने सोचा - अब वकील इसे शीशी में बंद एक मक्खी दिखाएगा । पूछेगा - इस मक्खी को पहचानते हो ? गवाह कहेगा - यह वही मक्खी है, जो मारपीट के वक़्त वहाँ भनभना रही थी । मैंने पहचान लिया । इसकी शक्ल मेरी माँ से मिलती है ।
एविडेन्स एक्ट ! इसका कमाल है ।

हरीशचंद्र ने जिस ब्राह्मण को सपने में दान दिया था, उसे अगर जायदाद पर कब्ज़े के लिए अदालत जाना पड़ता, तो वह भी दो-चार चश्मदीद गवाह खड़े कर देता । वे कहते - हमारे सामने इस विप्र को राजा हरीशचंद्र ने दान दिया था । वकील पूछता - उस वक़्त तुम कहाँ थे? वे कहते - हम भी राजा साहब के सपने में ही थे ।

बचाव पक्ष का वकील 'क्रॉस एग्ज़ॅमिनेशन' के लिए ख़ड़ा हुआ । यह भयंकर चीज़ है । एक बार मेरे भी पलस्तर उखड़ चुके हैं । मैं सच बोल रहा था, पर वकील ने दो मिनट में मेरे सत्य को पसीना ला दिया था ।

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