कटाई अंत दिसंबर से जनवरी के पहले सप्ताह में की जाती है। पत्तों के गिरने और फलियों के पीले रंग के होने पर कटाई की जाती है। इसकी औसतन पैदावार 4-6 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।कुसुम को आम-तौर पर कुसुम्भ के नाम से भी जाना जाता हैं| यह सबसे पुरानी तेल वाली फसल है, जिस में 24-36% तेल होता है| इसका प्रयोग खाना पकाने के लिए ज्यादा किया जाता है| इससे तैयार खल को पशुओं के चारे के लिए प्रयोग किया जाता है| महाराष्ट्र और कर्नाटक कुसुम उगाने वाले मुख्य राज्य हैं। उत्तर प्रदेश में इसे मुख्यत बुंदेलखंड के क्षेत्रों में उगाया जाता है। सिंचित हालातों में कुसुम की खेती ज्यादा लाभदायक है।
कुसुम की खेती मुख्य रूप से तिलहन फसल के रूप में की जाती है. इसके दानों में पाया जाने वाला तेल बहुत ही उपयोगी होता है. इस तेल का इस्तेमाल खाने में और व्यापारिक रूप से किया जाता है. व्यापारिक रूप में इसके तेल का इस्तेमाल साबुन, वार्निस, पेंट और निलोनियम को बनाने में किया जाता है. इसके तेल के इस्तेमाल से हृदय संबंधित बीमारी और खून में कोलेस्ट्रोल की मात्रा को नियंत्रित किया जा सकता है.
कुसुम के पौधे को ज्यादा सिंचाई की जरूरत नही होती. क्योंकि इसकी जड़ें गहराई में जाकर खुद के लिए पानी की पूर्ति कर लेती है. इसके पौधे की संरचना कुछ हद तक सूरजमुखी के पौधे की तरह ही होती है. जिस पर लगने वाले फूलों की पंखुडियां पीले रंग की होती है. भारत में इसकी खेती उत्तर और मध्य प्रदेश में ज्यादा की जाती है. इसकी खेती के लिए शुष्क जलवायु उपयुक्त होती है.
अगर आप भी कुसुम की खेती कर अच्छी कमाई करना चाहते है तो आज हम आपको इसकी खेती के बारें में सम्पूर्ण जानकारी देने वाले हैं.
उपयुक्त मिट्टी
कुसुम की खेती के लिए उचित जल निकासी वाली उपजाऊ भूमि की जरूरत होती है. लेकिन अच्छी और ज्यादा पैदावार लेने के लिए इसे गहरी काली मिट्टी में उगाना चाहिए. इसकी खेती के लिए भूमि का पी.एच. मान 5 से 8 के बीच होना चाहिए.
जलवायु और तापमान
कुसुम की खेती के लिए शुष्क और आद्र जलवायु उपयुक्त होती है. भारत में इसकी खेती रबी की फसलों के साथ में की जाती है. इसके पौधे को अधिक बारिश या सिंचाई की जरूरत नही होती. इस कारण इसे कम बारिश वाली जगहों पर आसानी से उगाया जा सकता है. इसकी खेती के लिए सर्दी का मौसम उपयुक्त होता है. जबकि फसल को पकने के लिए गर्म मौसम की जरूरत होती है.
प्रसिद्ध किस्में और पैदावार
कुसुम की कई उन्नत किस्में मौजूद हैं. इन सभी किस्मों को उनकी पैदावार और बीज में तेल की मात्रा के आधार पर तैयार किया गया है.
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कुसुम की इस किस्म के दाने सफ़ेद रंग के होते हैं. जिनमें तेल की मात्रा 30 प्रतिशत तक पाई जाती है. इस किस्म के पौधे कांटेदार होते हैं. जिन पर खिलने वाले फूल सफ़ेद रंग के पाए जाते हैं. इस किस्म का प्रति हेक्टेयर उत्पादन 16 किवंटल के आसपास पाया जाता है.
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कुसुम की इस किस्म के पौधों पर काटें नही पाए जाते और इसके पौधे पर खिलने वाले फूलों का रंग पीला होता है. लेकिन सूखने के बाद इन फूलों का रंग नारंगी दिखाई देता हैं. इस किस्म के दाने छोटे और सफ़ेद रंग के होते है. जिनका छिलका पतला होता है. इस किस्म का प्रति हेक्टेयर उत्पादन 14 किवंटल के आसपास पाया जाता है.
मालवीय कुसुम 305
कुसुम की ये एक जल्दी पकने वाली किस्म है. जिसके पौधे बीज रोपाई के लगभग 150 दिन बाद कटाई के लिए तैयार हो जाते हैं. इस किस्म का प्रति हेक्टेयर उत्पादन 15 किवंटल के आसपास पाया जाता है. इसके बीजों में तेल की मात्रा सबसे ज्यादा 36 प्रतिशत पाई जाती है.
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कुसुम की इस किस्म के पौधे अधिक तेल उत्पादन के लिए जाने जाते है. इस किस्म के बीजों में 30 से 35 प्रतिशत तक तेल की मात्रा पाई जाती है. इस किस्म के पौधे बीज रोपाई के लगभग 180 से 190 दिन बाद कटाई के लिए तैयार हो जाते हैं. जिनका प्रति हेक्टेयर उत्पादन 14 से 15 किवंटल तक पाया जाता है.
एन. ए .आर. आई-6
इस किस्म के पौधे जल्द पैदावार देने के लिए जाने जाते हैं. इस किस्म के पौधे बीज रोपाई के लगभग 130 दिन बाद पककर तैयार हो जाते हैं. जिनका प्रति हेक्टेयर उत्पादन 10 किवंटल के आसपास पाया जाता है. इस किस्म के पौधे पर काटें नही पाए जाते.
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कुसुम की ये भी एक बिना कांटों वाली किस्म है. जिसके पौधे पर पीले रंग के फूल पाए जाते हैं. जो सूखने के बाद नारंगी रंग में परिवर्तित हो जाते हैं. इस किस्म के पौधे बीज रोपाई के लगभग 135 से 140 दिन बाद पककर तैयार हो जाते हैं. इसके बीजों में तेल की मात्रा 30 प्रतिशत तक पाई जाती है. इस किस्म का प्रति हेक्टेयर उत्पादन 15 से 16 किवंटल तक पाया जाता है.
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कुसुम की इस किस्म के पौधों पर हलके काटें पाए जाते हैं. इसके पौधों की लम्बाई कम और पौधे पर बनने वाले पुष्प चक्र का आकार बड़ा होता है. जिन पर नारंगी रंग के फूल खिलते हैं. इसके पुष्प चक्र में पाए जाने वाले दानो का आकार बड़ा होता है. जिनमें तेल की मात्रा 29 प्रतिशत तक पाई जाती है. इस किस्म का प्रति हेक्टेयर उत्पादन 12 किवंटल के आसपास पाया जाता है.
ज़मीन की तैयारी
मिट्टी को भुरभुरा बनाने के लिए ज़मीन की कई बार जोताई करें, सारे नदीनों को निकालें और खेत को नदीन रहित बनाएं। निचले क्षेत्रों में इसकी खेती ना करें, क्योंकि यह फसल जल जमाव वाली स्थिति में खड़ी नहीं रह सकती। बिजाई से पहले निश्चित करें कि मिट्टी में पर्याप्त नमी मौजूद हो, यह उचित और जल्दी अंकुरण में मदद करेगा।
फसली-चक्र: कुसुम की खेती के बाद खरीफ की फसलें जैसे कि उड़द, चारा, मूंग, मक्की आदि उगाई जा सकती है|
खाद
खादें (किलोग्राम प्रति एकड़)
| UREA | SSP | MOP |
| 35 | 50 | On soil test results |
तत्व (किलोग्राम प्रति एकड़)
| NITROGEN | PHOSPHORUS | POTASH |
| 16 | 8 | - |
नाइट्रोजन 16 किलो(यूरिया 35 किलो) और फासफोरस 8 किलो (एस एस पी 50 किलो) प्रति एकड़ में डालें| अगर ज़मीन में पौष्टिक तत्वों की कमी हो तो, फासफोरस और बाकी की सारी खादें बिजाई से पहले ड्रिल मशीन के साथ डालें|
बिजाई
बिजाई का समय
इसकी बिजाई का उचित समय मध्य अक्तूबर से मध्य नवंबर तक का है।
फासला
पौधे से पौधे में 15 सैं.मी. और कतार से कतार में 45 सैं.मी. फासले का प्रयोग करें।
बीज की गहराई
बीज को 4-5 सैं.मी. की गहराई पर बोयें।
बिजाई का ढंग
इसकी बिजाई ड्रिल मशीन के द्वारा की जाती है|
बीज
बीज की मात्रा
बिजाई के लिए 7-8 किलो बीजों का प्रयोग प्रति एकड़ में करें|
बीज का उपचार
बिजाई से पहले कप्तान थीरम या कार्बेनडाज़िम 3 ग्राम से प्रति किलो बीज का उपचार करें। बढ़िया अंकुरण के लिए सेहतमंद और निरोग बीजों को रात भर पानी में भिगोएं|
खरपतवार नियंत्रण
कुसुम की फसल फूल बनने के समय नदीनों से ज्यादा प्रभावित होती है| फूल बनने के समय डैकनी क्षेत्रों में 25-30 दिन और ज्यादा सर्दी पड़ने वाले क्षेत्रों में 2 महीने या इससे ज्यादा होता है| इस नाज़ुक समय खेत को नदीं मुक्त रखने के लिए बिजाई से 45-50 दिन की बजाए 25-30 दिन बाद नियमित 1-2 बार गोड़ाई करें| रोपाई से पहले ट्रिफ्लुरालिन 400 मि.ली. या नदीनों के अंकुरण से पहले एट्राज़िन 0.3 किलो या एलाक्लोर 0.6 किलो प्रति एकड़ में डालें। बिजाई के 15-20 दिन बाद कमज़ोर और बीमार पौधों को निकाल दें।
सिंचाई
जहां पर सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती, यह फसल उन क्षेत्रों में भी उगाई जा सकती हैं और मौसम के अनुसार मिट्टी में नमी मौजूद होती है| फूल निकलने के समय पानी की बहुत जरूरत होती है और बढ़िया पैदावार के लिए 30 दिन के बाद एक बार सिंचाई करें| जहां पर मिटी में नमी कम हो तो, बिजाई से पहले एक भारी सिंचाई करें| यह फसल के विकास के लिए लाभदायक होती है|
पौधों में लगने वाले रोग और उनकी रोकथाम
कुसुम के पौधों में कई तरह के रोग देखने को मिलते हैं. जिनके प्रकोप की वजह से पौधे प्राप्त होने वाली पैदावार में काफी फर्क देखने को मिलता हैं.
गेरुई रोग
कुसुम के पौधों पर इस रोग का असर उनके विकास के दौरान देखने को मिलता है. इस रोग के लगने पर पौधे की पत्तियों पर पीले और भूरे रंग के चित्ते बन जाते हैं. जिनकी वजह से पौधे का विकास रुक जाता है. इस रोग की रोकथाम के लिए पौधों पर मैंकोजेब या जिनेब का उचित मात्रा में छिडकाव करना चाहिए.
झुलसा रोग
पौधों पर झुलसा रोग मौसम परिवर्तन और वायरस की वजह से देखने को मिलता है. इसके लगने पर पौधों की पत्तियों के किनारे सूखने लगते हैं. और कुछ दिन बाद पूरी पत्ती पीली पड़कर सुख जाती है. जिसकी वजह से पौधा विकास करना बंद कर देता है. इस रोग की रोकथाम के लिए पौधों पर बाविस्टिन या हिनोसान की उचित मात्रा का छिडकाव करना चाहिए.
माहू रोग
कुसुम के पौधों पर लगने वाला ये एक कीट रोग है. जो पौधे के कोमल भागों का रस चूसकर पौधे के विकास को प्रभावित करता है. इसके कीट पौधे के कोमल भागों पर समूह में पाए जाते हैं. इन कीटों का रंग लाल, पीला या काला दिखाई देता है. इस रोग के लगने पर पौधों की पैदावार काफी ज्यादा प्रभावित होती है. इस रोग की रोकथाम के लिए पौधों पर मोनोक्रोटोफॉस या मैलाथियान की उचित मात्रा का छिडकाव 10 से 15 दिन के अंतराल में दो बार करना चाहिए.
फल छेदक
कुसुम के पौधों पर फल छेदक का प्रकोप पौधों पर फूलों के बनने के बाद दिखाई देता है. इस रोग के कीट का लार्वा कलियों के अंदर जाकर फूल में मुख्य भागों की नष्ट कर देती हैं. जिसका सबसे ज्यादा असर पौधे की पैदावार पर देखने को मिलता है. पौधों पर लगने वाले इस रोग की रोकथाम के लिए डेल्टामेथ्रिन या इंडोसल्फान की उचित मात्रा का छिडकाव करना चाहिए.
भभूतिया रोग
कुसुम के पौधों पर इस रोग के लगने पर उनका विकास रुक जाता है. इस रोग का असर पौधे की पत्तियों पर देखने को मिलता है. इस रोग के लगने पर पौधे की पत्तियों पर सफ़ेद रंग का चूर्ण पाउडर दिखाई देता है. जिसकी वजह से पौधा प्रकाश संश्लेषण की क्रिया करना बंद कर देता है. इस रोग की रोकथाम के लिए पौधों पर घुलनशील गंधक की उचित मात्रा का छिडकाव करना चाहिए.
पौधों की कटाई और मढ़ाई
कुसुम की अलग अलग किस्मों के पौधे 140 से 160 दिन के आसपास पककर तैयार हो जाते हैं. जब इसके पौधे की पत्तियां पीली पड़कर गिरने लग जाए तब इनकी कटाई कर लेनी चाहिए. इसके पौधों की कटाई में काफी सावधानी रखनी होती है. क्योंकि इसकी कुछ किस्मों के पौधों में कांटे पाए जाते हैं. काटें वाली किस्मों के पौधों को सावधानीपूर्वक हाथों में दस्ताने पहनकर या कपड़ा बांधकर काटना चाहिए. जबकि बिना काँटों वाली किस्मों को काटने में कोई परेशानी नही होती.
कुसुम के पौधों की कटाई के लिए कम्बाइन हार्वेस्टर मशीन का भी इस्तेमाल किया जा सकता है. जिससे फसल को काटने में आसानी रहती है. फसलों की कटाई के बाद उन्हें सुखाकर उनकी मड़ाई की जाती है. इसकी मड़ाई मशीनों की सहायता से की जाती है. जिससे बीज को कलियों से अलग कर लिया जाता है.
पैदावार और लाभ
कुसुम की प्रति हेक्टेयर औसतन पैदावार 15 किवंटल के आसपास पाई जाती है. इसके अलावा इसके फूलों की पंखुड़ियों का भी बहुत ज्यादा इस्तेमाल किया जाता है. जिनको किसान भाई एकत्रित कर बाज़ार में बेच सकता है. जिससे किसान भाई को इसकी खेती से अच्छा लाभ प्राप्त होता है.

