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तिल की उन्नत खेती कैसे करें ?

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भारत विश्व में तिल का सबसे बड़ा उत्पादक देश है। कम समय की फसल होने के कारण इसे पूरे वर्ष उगाया जा सकता है। इसके बीजों से निकाला गया तेल खाने के लिए प्रयोग किया जाता है। बीज दो रंगो में उपलब्ध होते हैं- काले और सफेद। भारत विश्व में तिल का सबसे बड़ा उत्पादक है। भारत में गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, तामिलनाडू और महाराष्ट्र मुख्य तिल उत्पादक राज्य हैं।

उत्तर प्रदेश में बुंदेलखंड, मिर्ज़ापुर, सोनभादरा, कानपुर, अलाहाबाद, आगरा, मैनपुरी और फतेहपुर मुख्य तिल उगाने वाले क्षेत्र हैं। इस फसल का अकेले भी या ज्वार, बाजरा आदि के साथ मिश्रित फसल के रूप में भी उगाया जा सकता है। 

प्रदेश में तिल की खेती प्रमुखतया बुन्देलखण्ड की मुख्य रूप से रांकड़, पडुवा एवं अच्छे जल निकास वाली कांवर, मार भूमि में तथा मिर्जापुर, फतेहपुर, इलाहाबाद, आगरा, मैनपुरी आदि जनपद में शुद्ध एवं मिलवां खेती के रूप में की जाती है। मैदानी क्षेत्रों में इसे ज्वार बाजरा तथा अरहर के साथ बोते हैं। निम्न सघन पद्धतियां अपनाकर इसका उत्पादन बढ़ाया जा सकता है।

1. खेत की तैयारी

अच्छती पैदावार के लिए उत्तम जल निकास वाली भुमि की आवश्यकता होती है। एक जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से व 2-3 जुताईयां कल्टीवेटर अथवा देशी हल से करना चाहिए। जुताई के समय 5 टन गोबर की सड़ी हुई खाद प्रति हेक्टेयर खेत में मिलाना चाहिए।

2. उन्नतिशील प्रजातियाँ

प्रजातियांविशेषतापकने की अवधि (दिनो में)तेल प्रतिशतउपज (कु./हे.)उपयुक्त क्षेत्र
टा-4फलियाँ एकल, सन्मुखी बीज सफेद90-10040-426-7मैदानी क्षेत्र
टा-12फलियाँ एकल, सन्मुखी बीज सफेद85-9040-455-6मध्य एवं पश्चिमी क्षेत्र
टा-13फलियाँ एकल, सन्मुखी बीज सफेद90-9540-456-7बुन्देलखण्ड क्षेत्र
टा-78फलियाँ एकल, सन्मुखी80-8545-486-8सम्पूर्ण उत्तर प्रदेश
शेखरफलियाँ एकल, सन्मुखी80-8545-486-8सम्पूर्ण उत्तर प्रदेश
प्रगतिफलियाँ एकल, सन्मुखी80-8545-487-9सम्पूर्ण उत्तर प्रदेश
तरूणफलियाँ एकल, सन्मुखी80-8550-528-9सम्पूर्ण उत्तर प्रदेश
आर.टी.. 351बहुफलीय एवं सन्मुखी80-8550-529-10सम्पूर्ण उत्तर प्रदेश
3. बीज दर एवं शोधन
एक हैक्टेयर क्षेत्र के लिये 3-4 किग्रा. स्वच्छ एवं स्वस्थ बीज का प्रयोग करें। बीज जनित रोगों से बचाव हेतु 2 ग्राम धीरम एवं 1 ग्राम कार्बेन्डाजिम प्रति किग्रा. बीज की दर से शोधन हेतु प्रयोग करें।

4. बुआई का समय एवं विधि

बुआई का उचित समय जून के अन्तिम सप्ताह से जुलाई का दूसरा पखवारा है। पश्चिमी उ0प्र0 में इससे पूर्व बुआई करने से फाइलोडी रोग लगने का भय रहता है। बुआई हल के पीछे लाइनों में 30 से 45 से.मी. की दूरी पर करें। बीज को कम गहराई पर बोयें। बीज का आकार छोटा होने के कारण बीज को रेत,राख या सूखी हल्की बलुई मिट्टी में मिलाकर बोयें।

5. संतुलित उर्वरकों का प्रयोग
उर्वरकों का प्रयोग भूमि परीक्षण के आधार पर करें। यदि परीक्षण न कराया गया हो तो 30 किग्रा. नत्रजन 20 किग्रा. फास्फोरस तथा 20 किग्रा. गन्धक प्रति हे. की दर से प्रयोग करें। राकड़ तथा भूड़ भूमि में 20 किग्रा. पोटाश प्रति हे. का भी प्रयोग करें। नत्रजन की आधी मात्रा एवं फास्फोरस व पोटाश तथा गंधक की पूरी मात्रा, बुवाई के समय बेसल ड्रेसिंग के रूप में तथा नत्रजन की शेष मात्रा निरार्इ गुड़ाई के समय प्रयोग करें। फसल में पुष्पावस्था तथा फली बनते समय 2 प्रतिशत यूरिया का घोल बनाकर छिड़काव करने से पैदावार में आशातीत वृद्धि होगी।

6. निराई–गुड़ाई
प्रथम निराई गुड़ाई, बुवाई के 15-20 दिनों बाद दूसरी निराई 30-35 दिन बाद करें। निराई-गुड़ाई करते समय पौधें की थिनिंग (विरलीकरण) करके उनकी आपस की दूरी 10 से 12 सेमी. कर लें। एलाक्लोर 50 ई.सी. 1.25 लीटर प्रति हे0 बुआई के 3 दिन के अन्दर प्रयोग करने से खरपतवारों का नियन्त्रण हो जाता है।

7. सिचाई
जब पौधों में 50-60 प्रतिशत फली लग जाय और उस समय नमी की कमी हो तो एक सिंचाई करना आवश्यक है।

8. कटाई–मड़ाई
फसल की कटाई उचित अवस्था पर करके बण्डल बनाकर खलिहान ऊर्द्धाकार रखें। बण्डल सूख जाने पर पक्के फर्श या तिरपाल पर ही तिल की मड़ाई करें। गोबर के लेप खलिहान में मड़ाई न करे इससे निर्यात की गुणवत्ता में कमी आ जाती है।

हानिकारक कीट और रोकथाम
बिहारी बालों वाली सुंडी :
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यह कीट तने को छोड़कर पत्तों और पौधे के पूरे भाग को अपना भोजन बनाती है। यदि इसका हमला दिखे तो डाइमैथोएट 20 मि.ली. को 10 लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें।

फूल की मक्खी : 
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यह पौधे के फूल वाले भाग से भोजन लेती है। प्रभावित पौधे पर फल विकसित नहीं होते। शुरूआती समय में नीम का घोल 3 ग्राम को 10 लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें। यदि हमला ज्यादा हो तो कार्बरिल 50 डब्लयु पी 900 ग्राम को 200 लीटर पानी या डाइमैथोएट 20 मि.ली. को 10 लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें।

फल छेदक : 
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नए कीट पत्तों को मोड़ देते हैं और उनको अपना भोजन बनाते हैं। जिससे पौधा शाखाओं का उत्पादन नहीं करता। फूल निकलने की अवस्था में ये फूल से भोजन लेते हैं जिससे पैदावार पर प्रभाव पड़ता है। शुरूआती समय में नीम का घोल 3 ग्राम को 10 लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें। यदि हमला ज्यादा हो तो कार्बरिल 50 डब्लयु पी 900 ग्राम को 200 लीटर पानी या डाइमैथोएट 20 मि.ली. को 10 लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें।

बाज के सिर वाला पतंगा : 
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ये कीट पत्तों पर हमला करते हैं और उन्हें अपना भोजन बनाते हैं। प्रभावित पौधा किसी भी टहनी का उत्पादन नहीं करता। यदि इसका हमला दिखे तो कीटों को इक्ट्ठा करें और खेत से दूर ले जाकर नष्ट करे दें। यदि इसका हमला दिखे तो कार्बरील 800 ग्राम की प्रति एकड़ में स्प्रे करें।

बीमारियां और रोकथाम
फाइलोडी : 
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पौधा फूल उत्पादन नहीं करता जिससे फूल वाला भाग पत्ते के आकार जैसे हो जाता है। प्रभावित पौधे को हटा दें और खेत से दूर ले जाकर नष्ट कर दें। फोरेट 4 किलो प्रति एकड़ में डालें या डाइमैथोएट 20 मि.ली. को 10 लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें।

पत्तों के ऊपरी धब्बा रोग : 
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नए पत्तों के ऊपर सफेद रंग के धब्बे हो जाते हैं। कई हालातों में फल पकने से पहले ही गिर जाते हैं। यदि खेत में इनका हमला दिखे तो  घुलनशील सलफर 25 ग्राम या डिनोकैप 5 मि.ली. को 10 लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें। यदि जरूरत पड़े तो 10 दिनों के अंतराल पर दूसरी स्प्रे करें।

सरकोस्पोरा पत्ता धब्बा रोग :  पत्तों पर छोटे भूरे रंग के धब्बे दिखाई देते हैं। ज्यादा हमले के कारण पत्ते गिर भी जाते हैं। इस बीमारी का खेत में हमला दिखने पर मैनकोजेब 2 ग्राम या कप्तान 2 ग्राम या कार्बेनडाज़िम 2 ग्राम को प्रति लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें।

जड़ गलन : 
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प्रभावित जड़ें गहरे भूरे रंग की हो जाती हैं और ज्यादा हमला होने पर पौधा मर भी जाता है। एक ही खेत में एक ही फसल ना बोयें और अंतरफसली अपनायें। बिजाई से पहले कार्बेनडाज़िम 2.5 ग्राम से प्रति किलो बीजों का उपचार करें। कार्बेनडाज़िम 2 ग्राम को प्रति लीटर पानी में मिलाकर मिट्टी में छिड़कें।

मुख्य बिन्दु
बुवाई 10-20 जुलाई तक अवश्यक करें।पानी के निकास की समुचित व्यवस्था करें।बुआई के 15-20 दिन बाद विरलीकरण अवश्य करें।20 किग्रा. गन्धक या 200 किग्रा0 जिप्सम का प्रयोग करें।


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