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इंस्पेक्टर मातादीन चांद पर (व्यंग्य)- हरिशंकर परसाई

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अब मातादीन जी ने इनवेस्टिगेशन का सिद्धांत समझाया-
‘देखो आदमी मारा गया है, तो यह पक्का है कि किसी ने उसे जरूर मारा। कोई कातिल है। किसी को सजा होनी है। सवाल है- किसको सजा होनी है? पुलिस के लिए यह सवाल इतना महत्व नहीं रखता जितना यह सवाल कि जुर्म किस पर साबित हो सकता है या किस पर साबित होना चाहिए। कत्ल हुआ है, तो किसी व्यक्ति को सजा होगी ही। मारने वाले को होती है या बेकसूर को, यह अपने सोचने की बात नहीं है। मनुष्य-मनुष्य सब बराबर हैं। सबमें उसी परमात्मा का अंश है। हम भेदभाव नहीं करते। यह पुलिस का मानवतावाद है।’
‘दूसरा सवाल है, किस पर जुर्म साबित होना चाहिए। इसका निर्णय इन बातों से होगा- (1) क्या वह आदमी पुलिस के रास्ते में आता है? (2) क्या उसे सजा दिलाने से ऊपर के लोग खुश होंगे?’
मातादीन को बताया गया कि वह आदमी भला है, पर पुलिस अन्याय करे तो विरोध करता है। जहां तक ऊपर के लोगों का सवाल है- वह वर्तमान सरकार की विरोधी राजनीति करने वाला है।

मातादीन ने टेबल ठोंककर कहा, ‘फर्स्ट क्लास केस! एविडेंस। और ऊपर का सपोर्ट।’
एक इंस्पेक्टर ने कहा, ‘पर हमारे गले यह बात नहीं उतरती कि एक निरपराध भले आदमी को सजा दी जाए।’
मातदीन ने समझाया, ‘देखो, मैं समझा चुका हूं कि सबमें उसी ईश्वर का अंश है। सजा इसे हो या कातिल को, फांसी पर तो ईश्वर ही चढ़ेगा न! फिर तुम्हें कपड़ों पर खून मिल रहा है। इसे छोड़कर तुम कहां खून ढूंढ़ते फिरोगे? तुम तो भरो एफआईआर।’

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